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कारगिल विजय दिवस : कारगिल युद्ध में मुजफ्फरनगर के पांच जवान हुए थे शहीद

Sun, 25 Jul 2021 11:51 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sun, 25 Jul 2021 11:51 PM IST
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Kargil Vijay Diwas: Five soldiers of Muzaffarnagar were martyred in the war
शहीद सतीश की पत्नी एवं बच्चे। - फोटो : MUZAFFARNAGAR
कारगिल विजय दिवस : कारगिल युद्ध में मुजफ्फरनगर के पांच जवान हुए थे शहीद
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मुजफ्फरनगर। आन-बान और शान की खातिर कारगिल लड़ाई में शहीद हुए नौजवानों की यादें अमिट है। कारगिल शहीदों के शौर्य और पराक्रम पर जनमानस को नाज है। दो दशक पहले शुकतीर्थ में बने कारगिल शहीद स्मारक नवपीढ़ी को प्रेरणा देने का काम करती है। 22 साल पहले कारगिल की लड़ाई में जिले के पांच जवानों ने भारत माता की रक्षा करते हुए वीरगति पाई थी। पचेंडा कलां के लांस नायक बचन सिंह, इटावा के नरेंद्र राठी, बेलड़ा के अमरेश पाल, विज्ञाना के रिजवान और फुलत गांव के सतीश कुमार की शहादत पर जिले को नाज है।
पचेंडा कलां निवासी लांसनायक बचन सिंह ने 12 जून 1999 को कारगिल लड़ाई में बेटले ऑफ तोलोलिंग चोटी पर देश के लिए प्राणों की आहुति दी थी। शहीद की पत्नी कामेश बाला ने बेटे हितेश को कैप्टन बना कर कारगिल शहीद पति को सच्ची श्रद्धांजलि दी है। शहीद बचन सिंह की शहादत के वक्त उसके जुड़वा बेटों हितेश और हेमंत की उम्र साढ़े पांच साल थी। बेटा हितेश आज उसी राजपूताना राइफल्स में कैप्टन है, जिस बटालियन में उनके पिता लांसनायक थे। हितेश आठ जून 2018 को आईएमए देहरादून की पासिंग आउट परेड पास कर लेफ्टिनेंट बने थे। गत वर्ष उनका पदोन्नति कैप्टन के पद पर हुई। कामेश बाला ने दूसरे बेटे हेमंत को भी ग्रेजुएट के बाद सेना में भर्ती करने का मन बना रखा है।
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पिता की शहादत पर चार साल की थी हिना
बुढ़ाना। कारगिल लड़ाई में विज्ञाना गांव के जाबांज सपूत रिजवान त्यागी शहादत के दौरान उनकी इकलौती बेटी हिना सिर्फ चार साल की थी। रिजवान सरहद पर तीन जुलाई को शहीद हो गए थे। मगर, शहीद बानो ने बेटी हिना की परवरिश में पूरी ताकत लगा दी। हिना ने कस्बे के ही एक स्कूल से 12बीं पास की। मेरठ कॉलेज, मेरठ से बीएससी तथा एमएससी उत्तीर्ण कर ली है। हिना रिजवान कहती है कि शहीद पिता का सपना था कि वह उच्च ग्रहण करें।
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इटावा के जाबांज नरेंद्र की रगों में बसी थी देशभक्ति
बुढ़ाना के इटावा निवासी अनीता कारगिल लड़ाई का नाम सुनते ही सिहर उठती हैँ। नरेंद्र राठी कारगिल लड़ाई में ऑपरेशन विजय के दौरान काक्षर हिल पर दुश्मन के छक्के छुड़ाए थे। किसान तालसिंह का बेटा नरेंद्र राठी अप्रैल 1999 में एक माह की छुट्टी घर पर काटने के बाद अपनी ड्यूटी पर वापस चला गया था। उसकी पोस्टिंग कारगिल की पहाड़ियों पर हो गई। सरहद पर लड़ते हुए उन्होंने वीरगति पाई। परिवार में उनकी पत्नी अनीता देवी और पुत्र सुमित राठी तथा पुत्री सुरचना है। बेटा सुमित राठी बीटेक करने के बाद नोएडा की एक कंपनी में इंजीनियर है। उनकी शादी गांव जमालपुर निवासी निधि चौधरी के साथ हुई है। बेटी सुरचना दिल्ली से बीए करने के बाद अब मेरठ से बीएड कर रही है।
सतीश की शहादत पर ग्रामीणों को है गर्व
रतनपुरी। कारगिल लड़ाई में बेटे सतीश की शहादत पर आज भी पिता धर्मपाल नाज महसूस करते हैं। 26 जुलाई 1999 को कारगिल की लड़ाई में रेजिमेंट के जांबाज सिपाही फौजी सतीश कुमार अपने प्राणों की आहुति दे दी। शहीद सैनिक के पिता का कहना है कि बेटे की शहादत के समय फुलत गांव का नाम शहीद फौजी सतीश कुमार के नाम पर रखने आदि कई घोषणा 21 वर्ष बाद भी क्रियान्वित नहीं हो पाई है। सतीश कुमार के बड़े भाई श्याम कुमार ने बताया कि कंकरखेड़ा मेरठ में रामनगर चौक का नाम शहीद फौजी सतीश कुमार के नाम पर घोषित की गई थी। इस चौक का नामकरण नगर निगम के अभिलेखों में नहीं हो सका है। शहीद की पत्नी विमलेश देवी अपनी दो बेटियों रुपाली और झलक तथा बेटे अतुल के साथ कंकरखेड़ा मेरठ स्थित मकान में रहती हैं।
शहीद अमरेश का बेटा और बेटी सेना में भर्ती होने को आतुर
भोपा। कारगिल लड़ाई में सैनिक बेलड़ा निवासी अमरेश पाल के बेटा और बेटी को पिता के साहस और राष्ट्र भक्ति पर गर्व है। पिता की शहादत का बदला लेने के लिए वह सेना में भर्ती होने के लिए तैयार है। अमरेश पाल 28 जून 1999 को कारगिल लड़ाई में दुश्मनों के छक्के छुड़ाते हुए सदा के लिए सो गया। उनके दो बच्चों में एक बेटा निखिल उर्फ बंटी, जो बीएससी कर चुका है, वर्तमान में वह दिल्ली में रहकर कोचिंग कर रहा है। बेटी पूजा उर्फ गोल्डी आजकल मुंबई में रहकर निफ्ट का कोर्स कर रही है। शहीद के बेटे निखिल व बेटी पूजा का कहना है कि वह पिता की शहादत का बदला लेने को सेना में भर्ती होने को तैयार है। पत्नी उमाकांत, पिता फूल सिंह, माता अतरकली आज भी अमरेश की शहादत पर गर्व महसूस करते हैं।

शहीद के नाम पर स्मारक और मुख्य द्वार नहीं बन पाए
भोपा। पैतृक गांव बेलड़ा में शहीद अमरेश पाल उच्च प्राथमिक विद्यालय बना हुआ है। उनकी शहादत पर आंसू बहाने वाले अधिकारी और नेता अपने वादे भूल गए। भोपा गंग नहर पुल पर उनके नाम का मुख्य द्वार आज तक नहीं बना। वहीं, गांव में भव्य शहीद स्मारक बनाने का वादा अभी भी अधूरा होने से ग्रामीण मायूस है।
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