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Muzaffarnagar News: - दुल्हैंडी पर सबको लुभाती हैं सिसौली की झांकियां, चार सौ साल पुरानी धीराहेड़ी के कढ़ाह की परंपरा
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मुजफ्फरनगर। दुल्हैंडी पर रंगों के साथ बरसती हैं खुशियां। बुजुर्ग इतिहास के अनूठे पन्ने खोलकर भविष्य की पीढ़ी को सौंपते हैं अपने संस्कार। कहीं ढोल की थाप, कहीं स्वांग तो कहीं राग-रागनियां। मोबाइल की रील के दौर में भी दुल्हैंडी पर सिसौली की झांकियों का दौर फीका नहीं पड़ा। भौराखुर्द गांव में तिल्हैंडा और टंडेढ़ा में कुएं की परिक्रमा लोगों में जोश और उल्लास भर देती है।
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इनसेट
एक होली और दुल्हैंडी पर झांकियों का संगम
फोटो
सदियों से सिसौली की होली लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र रही है। पूरे कसबा आज भी एक ही जगह होलिका दहन करता है। दुल्हैंड़ी के दिन दोपहर तक ही रंग खेले जाते हैं। इसके बाद कसबे और क्षेत्र के लोग होली चौक पर झांकियां देखने के लिए इकट्ठे होते हैं। धार्मिक, ऐतिहासिक पात्रों पर सर्वसमाज के लोग इकट्ठे होकर बच्चों की झांकियां निकालते हैं। कस्बे के मुख्य मार्ग पर करीब चार घंटे के उत्सव को देखने के लिए दूर-दराज से लोग पहुंचते हैं। झांकी तैयारी में जुटे वेदपाल सिंह और जसवीर सिंह बताते हैं कि सामाजिक एकता की मिसाल है। धार्मिक झांकियां लोगों को प्रेरणा देती है। सर्वसमाज के सहयोग से ही झांकियां निकलती हैं।
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इनसेट
धीराहेड़ी में बांटा जा रहा कढ़ाह प्रसाद
भोपा के धीराहेड़ी गांव में होली पर कढ़ाह प्रसाद वितरण की चार सौ वर्ष पुरानी परंपरा जीवित है। ग्रामीण समूह में हलवा प्रसाद बनाकर पूरे गांव में बांटते हैं। बताते हैं कि बाबा बिद्दी अपने परिवार के साथ इस गांव आए थे। वह एक सुनसान स्थान पर रहते थे और पास के कुएं का पानी इस्तेमाल करते थे। यह कुआं आज भी गांव में मौजूद है। बाबा बिद्दी त्योहारों पर हलवा का प्रसाद बनाकर बांटते थे। धीरे-धीरे उनका परिवार बढ़ा और ग्रामीण स्वयं को बाबा का वंशज मानते हैं। ग्राम प्रधान ऋषिपाल सिंह सहित अन्य ग्रामीणों का कहना है कि यह परंपरा श्रद्धापूर्वक निभाई जा रही है।
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तीसरे दिन होली मनाने की 350 साल पुरानी परंपरा
गांव भौरा खुर्द में फाग के तीसरे दिन होली मनाने की 350 साल पुरानी परंपरा है। गांव में दुलहैंडी खेलने का रिवाज नहीं है। गांव निवासी मोहर सिंह, चंद्रवीर सिंह, प्रमोद कुमार, संजीव कुमार और प्रगतिशील किसान विकास बालियान ने इस परंपरा की पुष्टि की। उन्होंने बताया कि फाग के दिन ग्रामीण सुबह खेतों में काम करते हैं। दोपहर में वे परिवार की महिलाओं और बच्चों के साथ सिसौली में निकलने वाली धार्मिक झांकियां देखने जाते हैं। इसके बाद तीसरे दिन गांव में तिल्हैंडा मनाया जाता है।
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लोगों को याद है तिसंग की सामूहिक दुल्हैंडी
जानसठ। गांव तिसंग के खेड़े पर 30 साल पहले तक आसपाास के ग्रामीण सामूहिक परंपरा के साथ होली खेलते थे। खलवाड़ा के रहने वाले 68 वर्षीय रमेश चंद शर्मा एडवोकेट कहते हैं कि गांव के खेड़े पर दुल्हैंड़ी के दिन से एक सप्ताह तक होली खेली जाती थी। कई गांव के ग्रामीण टोली बनाकर होली गाते हुए तिसंग खेड़े पर जाते थे। खेड़े पर टोलियों का होली गीतों का मुकाबला भी होता था। ढोल, बीन और बाजे के साथ लोग नाचते थे। बुजुर्ग ग्रामीण दीपचंद, महिपाल, दयानंद, हरबीर का कहना है कि पुरानी परंपरा पर होली का त्योहार ही मनाया जाना चाहिए।
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होली आते ही कानों में गूंजती है ढोल की थाप
खतौली। गांव शेखपुरा के समय सिंह सैनी का कहना है कि होली पर 10 दिन पहले से गांव में सामूहिक रूप से ढोल-नगाड़े बजाए जाते थे। लोकगीतों को सुनकर ढ़ोल की थाप पर लोग झूम उठते थे। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते थे, जहां हास्य-व्यंग्य और पारंपरिक गीतों का आयोजन होता था। ढोल की थाप पर घोड़ा भी नचाया जाता था। हरिचंद का कहना है कि मोबाइल ने लोगों को एक दूसरे से दूर कर दिया है। अब होली का रंग पारंपरिक ढोल-नगाड़ों की जगह डीजे की तेज धुनों ने ले लिया है।
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एक होली और दुल्हैंडी पर झांकियों का संगम
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सदियों से सिसौली की होली लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र रही है। पूरे कसबा आज भी एक ही जगह होलिका दहन करता है। दुल्हैंड़ी के दिन दोपहर तक ही रंग खेले जाते हैं। इसके बाद कसबे और क्षेत्र के लोग होली चौक पर झांकियां देखने के लिए इकट्ठे होते हैं। धार्मिक, ऐतिहासिक पात्रों पर सर्वसमाज के लोग इकट्ठे होकर बच्चों की झांकियां निकालते हैं। कस्बे के मुख्य मार्ग पर करीब चार घंटे के उत्सव को देखने के लिए दूर-दराज से लोग पहुंचते हैं। झांकी तैयारी में जुटे वेदपाल सिंह और जसवीर सिंह बताते हैं कि सामाजिक एकता की मिसाल है। धार्मिक झांकियां लोगों को प्रेरणा देती है। सर्वसमाज के सहयोग से ही झांकियां निकलती हैं।
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धीराहेड़ी में बांटा जा रहा कढ़ाह प्रसाद
भोपा के धीराहेड़ी गांव में होली पर कढ़ाह प्रसाद वितरण की चार सौ वर्ष पुरानी परंपरा जीवित है। ग्रामीण समूह में हलवा प्रसाद बनाकर पूरे गांव में बांटते हैं। बताते हैं कि बाबा बिद्दी अपने परिवार के साथ इस गांव आए थे। वह एक सुनसान स्थान पर रहते थे और पास के कुएं का पानी इस्तेमाल करते थे। यह कुआं आज भी गांव में मौजूद है। बाबा बिद्दी त्योहारों पर हलवा का प्रसाद बनाकर बांटते थे। धीरे-धीरे उनका परिवार बढ़ा और ग्रामीण स्वयं को बाबा का वंशज मानते हैं। ग्राम प्रधान ऋषिपाल सिंह सहित अन्य ग्रामीणों का कहना है कि यह परंपरा श्रद्धापूर्वक निभाई जा रही है।
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तीसरे दिन होली मनाने की 350 साल पुरानी परंपरा
गांव भौरा खुर्द में फाग के तीसरे दिन होली मनाने की 350 साल पुरानी परंपरा है। गांव में दुलहैंडी खेलने का रिवाज नहीं है। गांव निवासी मोहर सिंह, चंद्रवीर सिंह, प्रमोद कुमार, संजीव कुमार और प्रगतिशील किसान विकास बालियान ने इस परंपरा की पुष्टि की। उन्होंने बताया कि फाग के दिन ग्रामीण सुबह खेतों में काम करते हैं। दोपहर में वे परिवार की महिलाओं और बच्चों के साथ सिसौली में निकलने वाली धार्मिक झांकियां देखने जाते हैं। इसके बाद तीसरे दिन गांव में तिल्हैंडा मनाया जाता है।
लोगों को याद है तिसंग की सामूहिक दुल्हैंडी
जानसठ। गांव तिसंग के खेड़े पर 30 साल पहले तक आसपाास के ग्रामीण सामूहिक परंपरा के साथ होली खेलते थे। खलवाड़ा के रहने वाले 68 वर्षीय रमेश चंद शर्मा एडवोकेट कहते हैं कि गांव के खेड़े पर दुल्हैंड़ी के दिन से एक सप्ताह तक होली खेली जाती थी। कई गांव के ग्रामीण टोली बनाकर होली गाते हुए तिसंग खेड़े पर जाते थे। खेड़े पर टोलियों का होली गीतों का मुकाबला भी होता था। ढोल, बीन और बाजे के साथ लोग नाचते थे। बुजुर्ग ग्रामीण दीपचंद, महिपाल, दयानंद, हरबीर का कहना है कि पुरानी परंपरा पर होली का त्योहार ही मनाया जाना चाहिए।
होली आते ही कानों में गूंजती है ढोल की थाप
खतौली। गांव शेखपुरा के समय सिंह सैनी का कहना है कि होली पर 10 दिन पहले से गांव में सामूहिक रूप से ढोल-नगाड़े बजाए जाते थे। लोकगीतों को सुनकर ढ़ोल की थाप पर लोग झूम उठते थे। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते थे, जहां हास्य-व्यंग्य और पारंपरिक गीतों का आयोजन होता था। ढोल की थाप पर घोड़ा भी नचाया जाता था। हरिचंद का कहना है कि मोबाइल ने लोगों को एक दूसरे से दूर कर दिया है। अब होली का रंग पारंपरिक ढोल-नगाड़ों की जगह डीजे की तेज धुनों ने ले लिया है।