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प्रथम राष्ट्रपति ने रखी थी अस्पताल की नींव, आज तक नहीं मिले डॉक्टर
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देवबंद। जिस बलिदानी छात्र स्मारक चिकित्सालय रणखंडी का शिलान्यास सन 1955 में देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किया था। उसको देश और उप्र की सरकारें चिकित्सक और दवाईयों तक नहीं दे पाई। अस्पताल को पीएचसी से सीएचसी का दर्जा तो दे दिया गया लेकिन सुविधा न होने से बदहाल है। कोरोना संक्रमण काल में जहां सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं न मिलने से जनता मर रही है। ऐसी स्थिति में भी सरकार ने इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया है। ये सीएचसी सरकार की कार्यप्रणाली की पोल खोलने के लिए काफी है। सीएचसी पर चिकित्सकों की तैनाती होने से जहां कोरोना संक्रमण काल में अनेकों लोगों की जान बचाई जा सकती है वहीं भविष्य के लिए भी क्षेत्र की जनता को सरकारी चकित्सा सुविधा मिलनी शुरू हो जाएंगी।
इस संबंध में ग्रामवासी ओमपाल सिंह बनी सिंह रामपाल सिंह का कहना है कि सीएचसी रणखंडी कहने मात्र की है, क्योंकि 30 बेड के इस अस्पताल में न तो पिछले चार साल से कोई डॉक्टर है और न दवाएं। इस तरफ सरकार ही नहीं बल्कि किसी जनप्रतिनिधि का भी कोई ध्यान नहीं है। कोरोना संक्रमण काल में ग्रामीणों को इलाज के लिए नौ किमी दूर देवबंद या फिर भी 14 किमी दूर मुजफ्फरनगर जाना पड़ता है।
दिनेश फौजी ने बताया कि करोड़ों रुपये खर्च कर पीएचसी से सीएचसी का दर्जा हासिल कर चुके इस अस्पताल पर ताला लटका हुआ है। देवबंद सीएचसी से ही कभी कोई डॉक्टर आता है। 20 हजार की घनी आबादी रणखंडी के अलावा घलौली, थामना, गुनारसा, गुनारसी, डेहरा, जखवाला, इमलिया आदि गांवों के लोग सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं। चिकित्सक स्टाफ की तैनाती के संबंध में कई बार सीएम को पत्र लिखे गए लेकिन कोई कदम नहीं उठाया गया। चिकित्सा सुविधा न मिलने के कारण गांव में कोरोना समेत अन्य बीमारियों से 25 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है।
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कोविड ड्यूटी में लगा है स्टाफ, चिकित्सकों की प्रदेश में भारी कमी
चिकित्सकों की पूरे प्रदेश में कमी है। देवबंद सीएचसी से ही एक चिकित्सक को रणखंडी सीएचसी पर भेजा जाता है। आजकल कोविड चल रहा है इसलिए उक्त चिकित्सक को देवबंद में ही तैनात किया हुआ है। क्योंकि स्टाफ कम होने के कारण ऐसा किया जा रहा है। फिर भी शासन को इस संबंध में पत्र लिखा गया है। -डॉ. बीएस सोढ़ी, सीएमओ।
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इस संबंध में ग्रामवासी ओमपाल सिंह बनी सिंह रामपाल सिंह का कहना है कि सीएचसी रणखंडी कहने मात्र की है, क्योंकि 30 बेड के इस अस्पताल में न तो पिछले चार साल से कोई डॉक्टर है और न दवाएं। इस तरफ सरकार ही नहीं बल्कि किसी जनप्रतिनिधि का भी कोई ध्यान नहीं है। कोरोना संक्रमण काल में ग्रामीणों को इलाज के लिए नौ किमी दूर देवबंद या फिर भी 14 किमी दूर मुजफ्फरनगर जाना पड़ता है।
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दिनेश फौजी ने बताया कि करोड़ों रुपये खर्च कर पीएचसी से सीएचसी का दर्जा हासिल कर चुके इस अस्पताल पर ताला लटका हुआ है। देवबंद सीएचसी से ही कभी कोई डॉक्टर आता है। 20 हजार की घनी आबादी रणखंडी के अलावा घलौली, थामना, गुनारसा, गुनारसी, डेहरा, जखवाला, इमलिया आदि गांवों के लोग सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं। चिकित्सक स्टाफ की तैनाती के संबंध में कई बार सीएम को पत्र लिखे गए लेकिन कोई कदम नहीं उठाया गया। चिकित्सा सुविधा न मिलने के कारण गांव में कोरोना समेत अन्य बीमारियों से 25 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है।
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कोविड ड्यूटी में लगा है स्टाफ, चिकित्सकों की प्रदेश में भारी कमी
चिकित्सकों की पूरे प्रदेश में कमी है। देवबंद सीएचसी से ही एक चिकित्सक को रणखंडी सीएचसी पर भेजा जाता है। आजकल कोविड चल रहा है इसलिए उक्त चिकित्सक को देवबंद में ही तैनात किया हुआ है। क्योंकि स्टाफ कम होने के कारण ऐसा किया जा रहा है। फिर भी शासन को इस संबंध में पत्र लिखा गया है। -डॉ. बीएस सोढ़ी, सीएमओ।