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उम्र कैद से नहीं बचा पाई एसआईसी की ‘क्लीन चिट’
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उम्रकैद से नहीं बचा पाई एसआईसी की ‘क्लीन चिट’
मुजफ्फरनगर। कवाल कांड के केस में उम्रकैद की सजा पाए अफजाल और इकबाल को एसआईसी की जांच में क्लीन चिट दे दी गई थी। सचिन और गौरव हत्याकांड में कोर्ट में दाखिल की गई चार्जशीट में दोनों का नाम नहीं था। तहरीर में गलत वल्दियत लिखी गई थी, जो विवेचना में पकड़ में नहीं आई। कोर्ट में ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष ने अपने साक्ष्यों के आधार पर साबित किया कि जिन्हें आरोपी नहीं बनाया गया है, वे अलग-अलग शख्स हैं और सगे भाई हैं।
मलिकपुरा के ममेरे भाइयों सचिन और गौरव मर्डर केस की विवेचना में झोल रहा। जानसठ कोतवाली में कवाल की घटना के बाद केस के वादी मृतक गौरव के पिता रविंद्र सिंह ने मुकदमा संख्या 403/2013 पंजीकृत कराया था। तहरीर में अन्य आरोपियों के साथ कवाल निवासी अफजाल पुत्र इकबाल लिखा गया था। एसआईसी (स्पेशल इन्वेस्टिगेशन सेल) के विवेचक संपूर्णानंद तिवारी ने केस की विवेचना की। पूरे कवाल गांव में इस नाम और वल्दियत का एक ही शख्स मिला, जिसका दोहरे हत्याकांड से दूर तक भी ताल्लुक नहीं था। जांच में अफजाल पुत्र इकबाल को आरोपी नहीं बनाया गया। अदालत में केवल पांच आरोपियों मुजम्मिल, मुजस्सिम, फुरकान, जहांगीर और नदीम के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी। कोर्ट में मुकदमे की सुनवाई के तीन साल बीत चुके थे। इसी बीच वादी पक्ष के अधिवक्ता अनिल जिंदल ने अफजाल और इकबाल का नाम चार्जशीट में नहीं रखे जाने पर आपत्ति दर्ज की। मामले में वादी रविंद्र और गवाह जगदीश ने अपने बयानों में बताया कि अफजाल और इकबाल पिता-पुत्र नहीं, बल्कि आपस में सगे भाई है, उनके पिता का नाम बुंदू है। दोनों हत्याकांड में शामिल थे। तहरीर लिखते समय त्रुटि हुई थी। अदालत ने 17 नवंबर 2016 को सीआरपीसी की धारा 319 के अंतर्गत अफजाल और इकबाल पुत्रगण बुंदू को समन जारी कर तलब किया। वर्ष 2017 में 27 मार्च को दोनों भाई न्यायालय में पेश हुए। वारदात में उन्हें आरोपी मानते हुए कोर्ट ने जेल भेज दिया। 26 अप्रैल 2017 को सेशन कोर्ट ने उनकी जमानत खारिज कर दी, जिसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट प्रयागराज में अपील की। उच्च न्यायालय ने दोनों को जून 2017 में जमानत दी। पांच साल चले केस में अफजाल और इकबाल ढाई माह जेल में रहे, जबकि अन्य पांच मुजरिम सितंबर 2013 से ही सलाखों के पीछे थे। छह फरवरी को एडीजे कोर्ट संख्या-7 ने अफजाल और इकबाल को भी कवाल के दोहरे हत्याकांड का दोषी करार देकर उन्हें भी न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया। एसआईसी की चार्जशीट में आरोपी नहीं बनाए जाने के बावजूद दोनों मुजरिम कानून से नहीं बच पाए। केस के अधिवक्ता अनिल जिंदल ने बताया कि एडीजे हिमांशु भटनागर की कोर्ट ने अफजाल और इकबाल को भी अन्य पांच अभियुक्तों के साथ उम्रकैद और अर्थदंड की सजा सुनाई है।
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मुजफ्फरनगर। कवाल कांड के केस में उम्रकैद की सजा पाए अफजाल और इकबाल को एसआईसी की जांच में क्लीन चिट दे दी गई थी। सचिन और गौरव हत्याकांड में कोर्ट में दाखिल की गई चार्जशीट में दोनों का नाम नहीं था। तहरीर में गलत वल्दियत लिखी गई थी, जो विवेचना में पकड़ में नहीं आई। कोर्ट में ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष ने अपने साक्ष्यों के आधार पर साबित किया कि जिन्हें आरोपी नहीं बनाया गया है, वे अलग-अलग शख्स हैं और सगे भाई हैं।
मलिकपुरा के ममेरे भाइयों सचिन और गौरव मर्डर केस की विवेचना में झोल रहा। जानसठ कोतवाली में कवाल की घटना के बाद केस के वादी मृतक गौरव के पिता रविंद्र सिंह ने मुकदमा संख्या 403/2013 पंजीकृत कराया था। तहरीर में अन्य आरोपियों के साथ कवाल निवासी अफजाल पुत्र इकबाल लिखा गया था। एसआईसी (स्पेशल इन्वेस्टिगेशन सेल) के विवेचक संपूर्णानंद तिवारी ने केस की विवेचना की। पूरे कवाल गांव में इस नाम और वल्दियत का एक ही शख्स मिला, जिसका दोहरे हत्याकांड से दूर तक भी ताल्लुक नहीं था। जांच में अफजाल पुत्र इकबाल को आरोपी नहीं बनाया गया। अदालत में केवल पांच आरोपियों मुजम्मिल, मुजस्सिम, फुरकान, जहांगीर और नदीम के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी। कोर्ट में मुकदमे की सुनवाई के तीन साल बीत चुके थे। इसी बीच वादी पक्ष के अधिवक्ता अनिल जिंदल ने अफजाल और इकबाल का नाम चार्जशीट में नहीं रखे जाने पर आपत्ति दर्ज की। मामले में वादी रविंद्र और गवाह जगदीश ने अपने बयानों में बताया कि अफजाल और इकबाल पिता-पुत्र नहीं, बल्कि आपस में सगे भाई है, उनके पिता का नाम बुंदू है। दोनों हत्याकांड में शामिल थे। तहरीर लिखते समय त्रुटि हुई थी। अदालत ने 17 नवंबर 2016 को सीआरपीसी की धारा 319 के अंतर्गत अफजाल और इकबाल पुत्रगण बुंदू को समन जारी कर तलब किया। वर्ष 2017 में 27 मार्च को दोनों भाई न्यायालय में पेश हुए। वारदात में उन्हें आरोपी मानते हुए कोर्ट ने जेल भेज दिया। 26 अप्रैल 2017 को सेशन कोर्ट ने उनकी जमानत खारिज कर दी, जिसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट प्रयागराज में अपील की। उच्च न्यायालय ने दोनों को जून 2017 में जमानत दी। पांच साल चले केस में अफजाल और इकबाल ढाई माह जेल में रहे, जबकि अन्य पांच मुजरिम सितंबर 2013 से ही सलाखों के पीछे थे। छह फरवरी को एडीजे कोर्ट संख्या-7 ने अफजाल और इकबाल को भी कवाल के दोहरे हत्याकांड का दोषी करार देकर उन्हें भी न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया। एसआईसी की चार्जशीट में आरोपी नहीं बनाए जाने के बावजूद दोनों मुजरिम कानून से नहीं बच पाए। केस के अधिवक्ता अनिल जिंदल ने बताया कि एडीजे हिमांशु भटनागर की कोर्ट ने अफजाल और इकबाल को भी अन्य पांच अभियुक्तों के साथ उम्रकैद और अर्थदंड की सजा सुनाई है।
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