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बगैर ट्रेनिंग लेखपाल बना शिवकुमार
Muzaffar nagar
Updated Sun, 16 Nov 2014 05:30 AM IST
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मुजफ्फरनगर। लेखपाल रहे शिवकुमार को ‘कारस्तानी’ विरासत में मिली थी। पिता की मौत के बाद मृतक आश्रित कोटे में भर्ती हुआ शिवकुमार एकमात्र ऐसा लेखपाल रहा, जिसने जीवन में कभी प्रशिक्षण प्राप्त नहीं किया। नियुक्ति के बाद सभी लेखपालों को ट्रेनिंग देने का प्रावधान है।
भूमि घोटाला उजागर होने के बाद प्रशासन की टीमें लेखपाल रहे शिवकुमार और उसके साथी जयभगवान की कुंडली खंगालने में जुटी हैं। वर्ष 2013 में नौकरी से रिटायर्ड होने वाले लेखपाल के कारनामे चौंकाने वाले हैं। एडीएम प्रशासन इंद्रमणि त्रिपाठी ने बताया कि वर्ष 1975 में शिवकुमार को पिता ईश्वरदयाल के स्थान पर मृतक आश्रित कोटे में नौकरी मिली थी। नौकरी डायरेक्ट हो या मृतक आश्रित कोटे से ट्रेनिंग करना सभी के लिए अनिवार्य होती है। लेखपाल का पद टेक्निकल होता है, इसलिए ट्रेनिंग के दौरान सारी बारीकियां समझाई जाती हैं। राजस्व परिषद से जब शिवकुमार की ट्रेनिंग के लिए भूलेख विभाग का निर्देश आया तो उसने एक प्रार्थना पत्र दाखिल किया, जिसमें उसने लिखा कि उसके पिता लेखपाल रहे हैं, लेखपाल के कार्यों के बारे में वह पहले से जानता है। उसे ट्रेनिंग की आवश्यकता नहीं है। मजेदार बात ये है कि राजस्व परिषद ने भी उसके प्रार्थना पत्र पर ट्रेनिंग नहीं करने की छूट दे दी। शिवकुमार ने विभाग में वर्ष 2013 तक नौकरी की और उसने इस कार्यकाल में कोई ट्रेनिंग नहीं ली।
कभी प्रमोशन नहीं लिया
मुजफ्फरनगर। लेखपाल की नौकरी करने के दौरान शिवकुमार का कानूनगो के पद पर प्रमोशन भी हुआ। शिवकुमार ने कभी प्रमोशन नहीं लिया। शिवकुमार को यह खतरा था कि प्रमोशन पाते ही उसका ट्रांसफर हो जाएगा और फिर खादर का साम्राज्य बिखर जाएगा।
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ट्रेनिंग नहीं होना गलत
एडीएम प्रशासन इंद्रमणि त्रिपाठी ने बताया कि लेखपाल का पद टेक्निकल होता है, इसलिए उसे ट्रेनिंग दिया जाना जरूरी होता है। यह आश्चर्यजनक है कि शिवकुमार ने बिना ट्रेनिंग के ही नौकरी पूरी कर ली। भूलेख रिकार्ड की छानबीन में यह सामने आया कि शिवकुमार ने लेखपाल पद के लिए कभी ट्रेनिंग ही नहीं ली।
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भूमि घोटाला उजागर होने के बाद प्रशासन की टीमें लेखपाल रहे शिवकुमार और उसके साथी जयभगवान की कुंडली खंगालने में जुटी हैं। वर्ष 2013 में नौकरी से रिटायर्ड होने वाले लेखपाल के कारनामे चौंकाने वाले हैं। एडीएम प्रशासन इंद्रमणि त्रिपाठी ने बताया कि वर्ष 1975 में शिवकुमार को पिता ईश्वरदयाल के स्थान पर मृतक आश्रित कोटे में नौकरी मिली थी। नौकरी डायरेक्ट हो या मृतक आश्रित कोटे से ट्रेनिंग करना सभी के लिए अनिवार्य होती है। लेखपाल का पद टेक्निकल होता है, इसलिए ट्रेनिंग के दौरान सारी बारीकियां समझाई जाती हैं। राजस्व परिषद से जब शिवकुमार की ट्रेनिंग के लिए भूलेख विभाग का निर्देश आया तो उसने एक प्रार्थना पत्र दाखिल किया, जिसमें उसने लिखा कि उसके पिता लेखपाल रहे हैं, लेखपाल के कार्यों के बारे में वह पहले से जानता है। उसे ट्रेनिंग की आवश्यकता नहीं है। मजेदार बात ये है कि राजस्व परिषद ने भी उसके प्रार्थना पत्र पर ट्रेनिंग नहीं करने की छूट दे दी। शिवकुमार ने विभाग में वर्ष 2013 तक नौकरी की और उसने इस कार्यकाल में कोई ट्रेनिंग नहीं ली।
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कभी प्रमोशन नहीं लिया
मुजफ्फरनगर। लेखपाल की नौकरी करने के दौरान शिवकुमार का कानूनगो के पद पर प्रमोशन भी हुआ। शिवकुमार ने कभी प्रमोशन नहीं लिया। शिवकुमार को यह खतरा था कि प्रमोशन पाते ही उसका ट्रांसफर हो जाएगा और फिर खादर का साम्राज्य बिखर जाएगा।
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ट्रेनिंग नहीं होना गलत
एडीएम प्रशासन इंद्रमणि त्रिपाठी ने बताया कि लेखपाल का पद टेक्निकल होता है, इसलिए उसे ट्रेनिंग दिया जाना जरूरी होता है। यह आश्चर्यजनक है कि शिवकुमार ने बिना ट्रेनिंग के ही नौकरी पूरी कर ली। भूलेख रिकार्ड की छानबीन में यह सामने आया कि शिवकुमार ने लेखपाल पद के लिए कभी ट्रेनिंग ही नहीं ली।