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पहले जैसे अखाड़े अब कहां, सिमट गए दंगल

Thu, 30 Aug 2018 12:40 AM IST
Updated Thu, 30 Aug 2018 12:40 AM IST
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पहले जैसे अखाड़े अब कहां, सिमट गए दंगल
पहले जैसे अखाड़े अब कहां, सिमट गए दंगल
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मुजफ्फरनगर। अखाड़े और दंगल की परंपरा भारतीय संस्कृति से जुड़ी है। मिट्टी में कुश्ती के दांवपेंच सीख पहलवानों ने एशियाड से ओलंपिक तक में देश को पदक दिलाए हैं। अब न पहले जैसे अखाड़े रहे और दंगल भी सिमट गए हैं। जकार्ता के 18 वें एशियाई खेलों में पुरबालियान की दिव्या काकरान ने ब्रांज मेडल जीता, उसने यह कामयाबी दंगलों में पसीना बहा कर ही पाई है। जिले में पहलवानी के माहौल को पुनर्जीवित करने के लिए अखाड़ों को बचाने की जरूरत है।
अखाड़ों की रौनक अब दिखाई नहीं देती। दंगल भी मेलों में ही सजते है। मिट्टी की उड़ती धूल, एक-दूसरे को चित करते पहलवानों को देख मचता शोरगुल जैसे नजारे कहां खो गए है। कभी मुजफ्फरनगर के अखाड़ों में वेस्ट यूपी के बड़े खलीफा और मल्ल जोर आजमाइश करते थेे। जिले में पचेंडा कलां, सोरम, मुकंदपुर और लडवा गांव में फिलहाल अखाड़े कुश्ती की परंपरा को जीवित रखे है। पचेंडा कलां के अखाड़े में ही ओलंपियन एवं अर्जुन अवार्डी बढे़ड़ी के अनुज चौधरी ने कुश्ती के हुनर निखारे थे। वहां अभी भी युवाओं को पहलवानी की दीक्षा मिलती है। खलीफा चौधरी मांगेराम और युधिष्ठिर पहलवान के निर्देशन में बच्चे कुश्ती में भविष्य तलाश रहे हैं। बघरा भी दंगलों का केंद्र रहा है। बरवाला के अंतरराष्ट्रीय पहलवान जुगमेंद्र सिंह ने बघरा और शाहपुर आदि में दंगल लड़े। वर्तमान में जुगमेंद्र भारतीय महिला कुश्ती टीम के कोच है। हालांकि बघरा का अखाड़ा अब बंद हो गया है। बघरा ब्लाक के गांव लडवा और मुकंदपुर में दो अखाड़े चल रहे हैं। बीते छह साल से संचालित लडवा के जय हनुमान मंदिर व्यायामशाला के खलीफा संजय पहलवान बताते है कि अखाडे़ में सुबह और शाम प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रशिक्षु गौरव नेशनल खेल चुका है, जबकि कई पहलवान मंडल और स्टेट में पदक जीत चुके हैं। मुकंदपुर में कालू खलीफा की देखरेख में युवा कुश्ती के गुर सीख रहे हैं। दिव्या काकरान के दादा राजेंद्र और पिता सूरजवीर पहलवान खुद दंगलों में कुश्ती लड़ते थे। उन्हीं की प्रेरणा से पुरबालियान की दिव्या दंगलों की धाकड़ छोरी बनी। सूरजवीर बताते हैं कि 80 के दशक तक जिले में अनगिनत अखाड़े थे, मगर अब इनकी संख्या सीमित हो गई है। अखाड़ों को पुनर्जीवित कर ही कुश्ती का माहौल तैयार हो सकता है।
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सोरम एकेडमी में तरासे जा रहे पहलवान
शाहपुर। सोरम के टारगेट ओलंपिक कुश्ती एकेडमी में नई खिलाड़िय़ों को कुश्ती का प्रशिक्षण दिया जाता है। यहां इंडोर स्टेडियम भी बनाया गया है, जिसमें जिम की सुविधा भी है। मैट पर मल्ल दांव-पेंच सिखते है। महारथ पाने को मिट्टी पर भी पहलवान अभ्यास करते हैं। सोरम के गौरव बालियान ने जून माह में क्रोशिया में हुई वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल जीता था। कोच निर्दोष कुमार और महिपाल सिंह ने बताया कि कई प्रांतों के 90 पहलवान प्रशिक्षु हैं। उधर, गांव दुल्हेरा में लीला पहलवान का अखाड़ा चल रहा है। ग्रामीण विजय चौधरी बताते हैं कि बीते तीन दशक से इस अखाड़े में आसपास के पहलवान कुश्ती के दांव सीखते है।
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अखाड़ों में अभ्यास से मिला मुकाम: दिव्या
मुजफ्फरनगर। एशियाई खेलों के इतिहास में दिव्या काकरान जिले की पहली पहलवान है, जिसने कांस्य पदक जीता है। ओलंपियन जुगमेंद्र और अनुज चौधरी भी एशियन गेम्स में कोई पदक नहीं जीत पाए थे। बीस वर्ष की दिव्या का सीनियर वर्ग में आगाज शानदार रहा है। पहले उसने आस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स में कांस्य पदक हासिल किया। जकार्ता एशियाड में भी वह ब्रांज मेडल पाने में कामयाब रही। भारत केसरी दिव्या कहती है कि दिल्ली के प्रेमनाथ अखाड़े में प्रशिक्षण से ही उसे यह मुकाम मिला है। आर्थिक तंगी में अधिक दंगल खेले, जिसका फायदा मिला। ओलंपिक में पदक जीतना उसका एक मात्र लक्ष्य है।

अखाड़ों से आएगी दिव्या जैसी प्रतिभाएं: जुगमेंद्र
मुजफ्फरनगर। कुश्ती में बरवाला गांव के जुगमेंद्र पहलवान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिले का गौरव बने। वर्ष 1980 में मास्को ओलंपिक खेलों में वह 68 किलोग्राम भार वर्ग में पदक जीतने से चूक गए थे, उन्हें चौथा स्थान मिला था। आस्ट्रेलिया और कनाडा कॉमनवेल्थ गेम्स में उन्होंने गोल्ड और सिल्वर मेडल जीता था। उत्कृष्ट प्रदर्शन पर उन्हें वर्ष 1980 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 2008 में उन्हें गुरु द्रोणाचार्य अवार्ड मिला। भारतीय महिला कुश्ती टीम के कोच जुगमेंद्र सिंह कहते है कि ग्रामीण अंचल में कुश्ती की अकूत सम्पदा है। अखाड़े और दंगलों में समाज की रुचि बढ़ेगी, तभी दिव्या काकरान जैसी प्रतिभाएं आगे आएगी।

बाबा पहली बार ले गए थे दंगल: अनुज
मुजफ्फरनगर। सदर ब्लाक के गांव बढेड़ी के अनुज चौधरी राष्ट्रीय कुश्ती में 84 किलोग्राम भार वर्ग में दस वर्ष तक चैंपियन रहे है। मेनचेस्टर और दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स में उन्होंने सिल्वर मेडल जीते। बुल्गारिया में आयोजित ओलंपिक क्वालीफाइंग कुश्ती में अनुज ने कांस्य पदक जीता था। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कुश्ती में ढेरों पदक पा चुके इस ओलंपियन वर्ष 2002 में प्रदेश का लक्ष्मण अवार्ड मिला था। बाद में उन्हें अर्जुन पुरस्कार और यश भारती से भी सम्मानित किया गया। यूपी पुलिस में डिप्टी एसपी अनुज चौधरी कहते है कि बाबा बलजीत सिंह उन्हें पहली बार पचेंडा के दंगल में ले गए थे। जिले में पुन: अखाड़ों और दंगलों का वातावरण बनाना होगा।


स्पोर्ट्र्स स्टेडियम में कुश्ती के 50 प्रशिक्षु
मुजफ्फरनगर। चौधरी चरणसिंह जिला स्पोर्ट्स स्टेडियम में करीब 50 बालक और बालिकाएं कुश्ती का प्रशिक्षण ले रही है। यहां पर दो कोच जितेंद्र कुमार और सुनीता के निर्देशन में मैट पर युवा खिलाड़िय़ों को पहलवानी सिखाई जाती है। क्षेत्रीय प्रभारी क्रीड़ा अधिकारी प्रेम कुमार कहते हैं कि एशियाड में दिव्या की उपलब्धि से खिलाड़ी प्रेरित है। स्टेडियम में उन्हें आमंत्रित किया जाएगा। अखाड़े कम होने से प्रतिभाओं को आगे आने के कम अवसर मिलते हैं।
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