{"_id":"5a57b6cf4f1c1b2c198b472d","slug":"21515697871-muzaffarnagar-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"नयन सागर का मंसूरपुर में मंगल विहार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
नयन सागर का मंसूरपुर में मंगल विहार
Updated Fri, 12 Jan 2018 12:41 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
धर्म का हर जीव पर बड़ा उपकार
खतौली। पीसनोपाड़ा जैन मंदिर में मंसूरपुर के लिए पद मंगल विहार करने से पूर्व आयोजित धर्मसभा में नयन सागर महाराज ने कहा कि धर्म का हर जीव पर बड़ा उपकार है। धर्म एक निश्छल तत्व है, जो व्यक्ति की सहायता करता है और उसकी रक्षा व सुरक्षा करता है। आत्मा धर्म की साधना करके देवगति को प्राप्त कर सकती है और अधर्म की साधना करके देव भी पशुगति को प्राप्त कर सकता है। धर्म हमारे सभी सुखों का कारण है। सुख हमारे पुण्य कर्मों का फल है और दुख पाप कर्मों का। किसी तीर्थंकर ने धर्म की रचना नहीं की, बल्कि धर्म की साधना से एक निर्मल आत्मा तीर्थंकर बनी। रावण अपने सद्कर्मों के कारण अग्रणी तीर्थंकरों की श्रेणी में है, परंतु अपने दुष्कर्मों के कारण वह नरक में वास कर रहे हैं। रावण के पाप उसके पतन का कारण है। महाराज े निर्मलायतन में फरवरी माह में आयोजित होने वाले पंचकल्याणक में धार्मिक क्रियाओं हेतु बड़ी संख्या में उपस्थित होने का आह्वान किया। इसके बाद महाराज ने मंसूरपुर के लिए पद विहार किया। धर्मसभा में अतुल, विनीत, अरविंद, अन्नू, शीलचंद, क्षितिज, विपिन, आलोक, अशोक, बंटी, शशांक, सुधीर आढ़ती, दिनेश, श्रीपाल, नीरज प्रवक्ता आदि उपस्थित रहे।
विज्ञापन
खतौली। पीसनोपाड़ा जैन मंदिर में मंसूरपुर के लिए पद मंगल विहार करने से पूर्व आयोजित धर्मसभा में नयन सागर महाराज ने कहा कि धर्म का हर जीव पर बड़ा उपकार है। धर्म एक निश्छल तत्व है, जो व्यक्ति की सहायता करता है और उसकी रक्षा व सुरक्षा करता है। आत्मा धर्म की साधना करके देवगति को प्राप्त कर सकती है और अधर्म की साधना करके देव भी पशुगति को प्राप्त कर सकता है। धर्म हमारे सभी सुखों का कारण है। सुख हमारे पुण्य कर्मों का फल है और दुख पाप कर्मों का। किसी तीर्थंकर ने धर्म की रचना नहीं की, बल्कि धर्म की साधना से एक निर्मल आत्मा तीर्थंकर बनी। रावण अपने सद्कर्मों के कारण अग्रणी तीर्थंकरों की श्रेणी में है, परंतु अपने दुष्कर्मों के कारण वह नरक में वास कर रहे हैं। रावण के पाप उसके पतन का कारण है। महाराज े निर्मलायतन में फरवरी माह में आयोजित होने वाले पंचकल्याणक में धार्मिक क्रियाओं हेतु बड़ी संख्या में उपस्थित होने का आह्वान किया। इसके बाद महाराज ने मंसूरपुर के लिए पद विहार किया। धर्मसभा में अतुल, विनीत, अरविंद, अन्नू, शीलचंद, क्षितिज, विपिन, आलोक, अशोक, बंटी, शशांक, सुधीर आढ़ती, दिनेश, श्रीपाल, नीरज प्रवक्ता आदि उपस्थित रहे।