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गांव देहात में गुम हुई होली गीतों की गूंज
Updated Wed, 28 Feb 2018 12:29 AM IST
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चरथावल। सोशल नेटवर्किंग की चकाचौंध में होली का रंग फीका पड़ गया है। कस्बों एवं देहात के गलियारों में होली का चंदा मांगने वाली टोलियां लुप्त हो गई हैं। बाजार में रंग-पिचकारी दुकानें सजी जरूर हैं, लेकिन होली की मस्ती का उल्लास गुम है। होली के लोकगीत आज ब्रज में होली रे रसिया, कहीं घनी कहीं थोड़ी से रसिया की गूंज सुनाई नहीं देती।
फागुन में होली की मस्ती अब अदृश्य होती जा रही है। बच्चों और यूथ की टोलियां पहले गली-मोहल्लों में होलिका दहन के लिए लकड़ियां और चंदा एकत्र करने में 15 दिन पहले जुट जाते थे। महिलाएं घर-घर में होलिका दहन पर गोबर के बड़कुले सिर्फ रस्म निभाने के लिए मनाने लगी हैं। दो दशक पहले बड़ी संख्या में बनाने की परंपरा थी। जात-पात से दूर सद्भाव के साथ सौहार्द पूर्वक होली खेली जाती थी। महिलाएं कई दिन पहले से होली के लोकगीतों में खो जाती थीं, मगर सोशल साइटों पर रंगोत्सव पर एक हफ्ते पहले ही शुभकामनाएं देकर इतिश्री की जा रही है। वहीं, हंसी टिटौली के चुटकलों से लुत्फ उठाने का रिवाज चल पड़ा है। कस्बे के वयोवृद्ध देवदत्त त्यागी कहते हैं होली दहन से पहले कुश्ती, लाठी-डंडों के खेल अब अतीत का हिस्सा बन चुके हैं। कसौली के सेवानिवृत्त सूबेदार ध्यान सिंह जीवन की आपाधापी के बीच नवपीढ़ी स्मार्ट फोन की आंधी में तमाम संस्कृति व पर्वों की सिर्फ रस्म अदायगी ही रह गई है। पहले महिलाएं होलिका दहन के लिए बड़कुलों से पूरी मकान की छत छप जाती थी। किड्स हैवन पब्लिक स्कूल की संचालिका सुनीता धीमान कहती हैं आस्था और लोक परंपरा को जीवंत रखने के लिए आधुनिकता की चकाचौंध का असर पड़ गया है। एक दशक पहले गिले-शिकवे और भेदभाव भुलाकर होली उत्सव में गली-मौहल्लों में विशेष उल्लास होता था। चेहरा देखकर होली खेलने से पुरातन परंपरा को ग्रहण लगता जा रहा है। सिकंदरपुर के बीटेक में पढ़ाई कर रहे छात्र नितिन पाल, अर्पित त्यागी, जाह्नवी, अनमोल कहते हैं कि हर साल यह त्यौहार परीक्षाओं के बीच में पड़ता है। परीक्षाओं में भारी भरकम कोर्स की तैयारी होली के जश्न में बाधक बन रही है।
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फागुन में होली की मस्ती अब अदृश्य होती जा रही है। बच्चों और यूथ की टोलियां पहले गली-मोहल्लों में होलिका दहन के लिए लकड़ियां और चंदा एकत्र करने में 15 दिन पहले जुट जाते थे। महिलाएं घर-घर में होलिका दहन पर गोबर के बड़कुले सिर्फ रस्म निभाने के लिए मनाने लगी हैं। दो दशक पहले बड़ी संख्या में बनाने की परंपरा थी। जात-पात से दूर सद्भाव के साथ सौहार्द पूर्वक होली खेली जाती थी। महिलाएं कई दिन पहले से होली के लोकगीतों में खो जाती थीं, मगर सोशल साइटों पर रंगोत्सव पर एक हफ्ते पहले ही शुभकामनाएं देकर इतिश्री की जा रही है। वहीं, हंसी टिटौली के चुटकलों से लुत्फ उठाने का रिवाज चल पड़ा है। कस्बे के वयोवृद्ध देवदत्त त्यागी कहते हैं होली दहन से पहले कुश्ती, लाठी-डंडों के खेल अब अतीत का हिस्सा बन चुके हैं। कसौली के सेवानिवृत्त सूबेदार ध्यान सिंह जीवन की आपाधापी के बीच नवपीढ़ी स्मार्ट फोन की आंधी में तमाम संस्कृति व पर्वों की सिर्फ रस्म अदायगी ही रह गई है। पहले महिलाएं होलिका दहन के लिए बड़कुलों से पूरी मकान की छत छप जाती थी। किड्स हैवन पब्लिक स्कूल की संचालिका सुनीता धीमान कहती हैं आस्था और लोक परंपरा को जीवंत रखने के लिए आधुनिकता की चकाचौंध का असर पड़ गया है। एक दशक पहले गिले-शिकवे और भेदभाव भुलाकर होली उत्सव में गली-मौहल्लों में विशेष उल्लास होता था। चेहरा देखकर होली खेलने से पुरातन परंपरा को ग्रहण लगता जा रहा है। सिकंदरपुर के बीटेक में पढ़ाई कर रहे छात्र नितिन पाल, अर्पित त्यागी, जाह्नवी, अनमोल कहते हैं कि हर साल यह त्यौहार परीक्षाओं के बीच में पड़ता है। परीक्षाओं में भारी भरकम कोर्स की तैयारी होली के जश्न में बाधक बन रही है।
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