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हर साल एक फीट नीचे गिर रहा भूजल
Updated Thu, 22 Mar 2018 12:18 AM IST
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उद्योगों में अधिक जल दोहन पर एनजीटी सख्त
मुजफ्फरनगर। यदि नहीं संभले तो भविष्य में बूंद-बूंद पानी का संकट खड़ा होगा। अत्यधिक जल दोहन से धरती की कोख सूख रही है। जिले में प्रतिवर्ष एक फीट तक भूजल नीचे पहुंच रहा है। यह समस्या औद्योगिक इकाईयों में अधिक जल दोहन के अलावा नदी, तालाबों के सूखने पर पैदा हो रही है। इस पर एनजीटी ने चिंता जताने के साथ जल दोहन की मात्रा को रोकने के निर्देश दिए हैं।
जनपद में 60 से अधिक पेपर मिलों के अलावा आठ शुगर मिल, डिस्टलरी संचालित है। इनमें उत्पाद तैयार करने में बड़ी मात्रा में जल का दोहन हो रहा है। इसके अलाव नदियों और तालाबों के सूखने से स्थिति अधिक बिगड़ रही है। जिले के कई ब्लॉक डॉर्क जोन में शामिल है। इनमें शाहपुर, चरथावल, बघरा आदि शामिल है। यहां ट्यूबवैल लगाने की अनुमति नहीं है। नीर फाउंडेशन के अध्यक्ष रमन त्यागी ने बताया कि उनकी संस्था और ग्राउंड वाटर विभाग ने संयुक्त रूप से मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर के अलावा कई क्षेत्रों में भूजल को लेकर कार्य किया गया, जिसमें मुजफ्फरनगर क्षेत्र में प्रतिवर्ष एक से डेढ़ फीट भूजल नीचे पहुंच रहा रहा है। यानि धरती के नीचे पानी की मात्रा घट रही है। बोरवैल, ट्यूबवैल लगाने में अधिक गहराई तक बोरवेल हो रहा है। सबसे बड़ी समस्या औद्योगिक ईकाइयों में जल खपत को लेकर है। इस पर एनजीटी ने भी चिंता जताई है।
इस तरह से हो रहा जल दोहन
मुजफ्फरनगर। पेपर मिल को एक टन माल तैयार करने में चार से पांच हजार किलोमीटर पानी की जरूरत होती है, जबकि पेपर मिल में रोजाना करीब 100 टन तक माल तैयार होता है। ऐसे में बड़ी मात्रा में जल का दोहन होता है। इसी तरह से शुगर मिल और डिस्टिलरी में पानी अधिक इस्तेमाल होता है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, जिले की औद्योगिक इकाईयों में रोजाना लाखों किलोलीटर पानी इस्तेमाल होता है।
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एनजीटी तक पहुंचा मामला
मुजफ्फरनगर। गिरते भूजल का मामला एनजीटी तक पहुंच गया है। इस पर चिंता जताते हुए एनजीटी ने प्रदूषण बोर्ड को जांच के लिए कहा है। बोर्ड के अवर अभियंता विपुल कुमार बताते हैं कि फैक्ट्रियों, शुगर मिल में सैडिसल लगा है। इसमें पानी के इस्तेमाल होने के बाद उसे री-साइकिलिंग करना होता है, उसके बाद पानी को भूगर्भ में डाला जाता है। इससे जिले में काफी स्तर भूजल की स्थिति काबू में आई है।
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मुजफ्फरनगर। यदि नहीं संभले तो भविष्य में बूंद-बूंद पानी का संकट खड़ा होगा। अत्यधिक जल दोहन से धरती की कोख सूख रही है। जिले में प्रतिवर्ष एक फीट तक भूजल नीचे पहुंच रहा है। यह समस्या औद्योगिक इकाईयों में अधिक जल दोहन के अलावा नदी, तालाबों के सूखने पर पैदा हो रही है। इस पर एनजीटी ने चिंता जताने के साथ जल दोहन की मात्रा को रोकने के निर्देश दिए हैं।
जनपद में 60 से अधिक पेपर मिलों के अलावा आठ शुगर मिल, डिस्टलरी संचालित है। इनमें उत्पाद तैयार करने में बड़ी मात्रा में जल का दोहन हो रहा है। इसके अलाव नदियों और तालाबों के सूखने से स्थिति अधिक बिगड़ रही है। जिले के कई ब्लॉक डॉर्क जोन में शामिल है। इनमें शाहपुर, चरथावल, बघरा आदि शामिल है। यहां ट्यूबवैल लगाने की अनुमति नहीं है। नीर फाउंडेशन के अध्यक्ष रमन त्यागी ने बताया कि उनकी संस्था और ग्राउंड वाटर विभाग ने संयुक्त रूप से मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर के अलावा कई क्षेत्रों में भूजल को लेकर कार्य किया गया, जिसमें मुजफ्फरनगर क्षेत्र में प्रतिवर्ष एक से डेढ़ फीट भूजल नीचे पहुंच रहा रहा है। यानि धरती के नीचे पानी की मात्रा घट रही है। बोरवैल, ट्यूबवैल लगाने में अधिक गहराई तक बोरवेल हो रहा है। सबसे बड़ी समस्या औद्योगिक ईकाइयों में जल खपत को लेकर है। इस पर एनजीटी ने भी चिंता जताई है।
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इस तरह से हो रहा जल दोहन
मुजफ्फरनगर। पेपर मिल को एक टन माल तैयार करने में चार से पांच हजार किलोमीटर पानी की जरूरत होती है, जबकि पेपर मिल में रोजाना करीब 100 टन तक माल तैयार होता है। ऐसे में बड़ी मात्रा में जल का दोहन होता है। इसी तरह से शुगर मिल और डिस्टिलरी में पानी अधिक इस्तेमाल होता है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, जिले की औद्योगिक इकाईयों में रोजाना लाखों किलोलीटर पानी इस्तेमाल होता है।
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एनजीटी तक पहुंचा मामला
मुजफ्फरनगर। गिरते भूजल का मामला एनजीटी तक पहुंच गया है। इस पर चिंता जताते हुए एनजीटी ने प्रदूषण बोर्ड को जांच के लिए कहा है। बोर्ड के अवर अभियंता विपुल कुमार बताते हैं कि फैक्ट्रियों, शुगर मिल में सैडिसल लगा है। इसमें पानी के इस्तेमाल होने के बाद उसे री-साइकिलिंग करना होता है, उसके बाद पानी को भूगर्भ में डाला जाता है। इससे जिले में काफी स्तर भूजल की स्थिति काबू में आई है।