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आजादी के सिपाही ज्योति प्रसाद का निधन
Updated Thu, 09 Nov 2017 12:59 AM IST
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आजादी के सिपाही ज्योति प्रसाद का निधन
रोहाना (मुजफ्फरनगर)।
फिरंगी हुुकूमत के खिलाफ स्वाधीनता की लड़ाई लड़ने वाले 96 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी ज्योति प्रसाद त्यागी ने सदा के लिए अपनी मातृभूमि को अलविदा कह दिया। वर्ष 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने कई साल बरेली और मेरठ की जेल में सजा काटी थी। बृहस्पतिवार को सुबह नौ बजे उनके पैतृक गांव बड़कली में आजादी के सिपाही का राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया जाएगा।
सदर तहसील के गांव बड़कली में किसान रामचंद्र त्यागी के घर वर्ष 1922 को जन्मे ज्योति प्रसाद त्यागी छात्र जीवन से ही स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में कूद गए थे। शहर के डीएवी हाईस्कूल में पढ़ाई के दौरान उन्हें महात्मा गांधी से प्रेरणा मिली। बाद में उन्होंने मेरठ से इंटरमीडिएट उत्तीर्ण की और लगातार क्रांतिकारियों के संपर्क में रहे। वर्ष 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में त्यागी ने युवाओं के साथ सड़कों पर उतरकर अंग्रेजी हुकूमत का विरोध किया। अपनी देशभक्ति और उग्र विचारों से ज्योति प्रसाद ब्रिटिश अफसरों की आंखों की किरकिरी बन गए थे। गिरफ्तारी के बाद उन्हें 11 माह की सजा सुनाई गई। त्यागी को बरेली और मेरठ की जेलों में कैद रखा गया। पढ़ऩे-लिखने के शौकीन रहे त्यागी की कई भाषा उर्दू, फारसी, अंग्रेजी पर अच्छी पकड़ थी। स्वाधीनता आंदोलन पर उन्होंने अपने साथियों के देश प्रेम और त्याग पर किताब भी लिखी। स्वतंत्रता सेनानी ज्योति प्रसाद त्यागी वृद्धा अवस्था के कारण कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। बुधवार शाम को उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर मिलते ही रोहाना क्षेत्र के राजनीतिज्ञों, समाजसेवी, शिक्षाविद आदि ने उनके आवास पर पहुंचकर श्रद्धासुमन अर्पित किए। उनके परिवार में तीन पुत्र ब्रिजेश, दिनेश और उमेश त्यागी तथा दो बेटियां मिथलेश, बिमलेश हैं। राजकीय सम्मान के साथ बृहस्पतिवार यानि आज सुबह नौ बजे पैतृक गांव बड़कली में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।
बड़कली मिलने आए थे एनडी तिवारी
रोहाना। आजादी के आंदोलन में बरेली जेल में सजा काटने के दौरान ज्योति प्रसाद त्यागी की नारायण दत्त तिवारी से गहरी मित्रता हो गई थी। त्यागी ने आजादी के बाद खेती किसानी में जीवन अर्पित कर दिया, लेकिन तिवारी अपने मित्र को नहीं भूले। उत्तराखंड के सीएम का दायित्व निभाते वक्त एनडी तिवारी जब दो अक्तूबर को रामपुर तिराहा पर उत्तराखंड के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करने आए, तब वह हेलीकॉप्टर से बड़कली गांव पहुंचे। तिवारी ने उन्हें गांव में स्थित जूनियर हाईस्कूल में स्वतंत्रता अमर ज्योति प्रतीक निर्माण के लिए पांच लाख रुपये का चेक भेंट किया था। देश के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह, पूर्व राज्यपाल वीरेंद्र वर्मा, महावीर त्यागी आदि से भी उनके मित्रवत संबंध रहे।
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लालकिले पर तिरंगा फहराने के साक्षी रहे
रोहाना। देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत ज्योति प्रसाद त्यागी ने अपने समर्पण और व्यवहार से देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का मन भी जीत लिया था। 15 अगस्त 1947 को दिल्ली के लालकिले पर जब राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराया गया, उन ऐतिहासिक क्षणों में त्यागी भी साक्षी रहे। ग्राम प्रधान मुनेश त्यागी ने बताया कि उनका जीवन सादगी और समाजसेवा के लिए समर्पित रहा। उन्होंने आजादी आंदोलन में आहुति देकर बड़कली गांव का नाम देशभर में रोशन किया।
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रोहाना (मुजफ्फरनगर)।
फिरंगी हुुकूमत के खिलाफ स्वाधीनता की लड़ाई लड़ने वाले 96 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी ज्योति प्रसाद त्यागी ने सदा के लिए अपनी मातृभूमि को अलविदा कह दिया। वर्ष 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने कई साल बरेली और मेरठ की जेल में सजा काटी थी। बृहस्पतिवार को सुबह नौ बजे उनके पैतृक गांव बड़कली में आजादी के सिपाही का राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया जाएगा।
सदर तहसील के गांव बड़कली में किसान रामचंद्र त्यागी के घर वर्ष 1922 को जन्मे ज्योति प्रसाद त्यागी छात्र जीवन से ही स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में कूद गए थे। शहर के डीएवी हाईस्कूल में पढ़ाई के दौरान उन्हें महात्मा गांधी से प्रेरणा मिली। बाद में उन्होंने मेरठ से इंटरमीडिएट उत्तीर्ण की और लगातार क्रांतिकारियों के संपर्क में रहे। वर्ष 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में त्यागी ने युवाओं के साथ सड़कों पर उतरकर अंग्रेजी हुकूमत का विरोध किया। अपनी देशभक्ति और उग्र विचारों से ज्योति प्रसाद ब्रिटिश अफसरों की आंखों की किरकिरी बन गए थे। गिरफ्तारी के बाद उन्हें 11 माह की सजा सुनाई गई। त्यागी को बरेली और मेरठ की जेलों में कैद रखा गया। पढ़ऩे-लिखने के शौकीन रहे त्यागी की कई भाषा उर्दू, फारसी, अंग्रेजी पर अच्छी पकड़ थी। स्वाधीनता आंदोलन पर उन्होंने अपने साथियों के देश प्रेम और त्याग पर किताब भी लिखी। स्वतंत्रता सेनानी ज्योति प्रसाद त्यागी वृद्धा अवस्था के कारण कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। बुधवार शाम को उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर मिलते ही रोहाना क्षेत्र के राजनीतिज्ञों, समाजसेवी, शिक्षाविद आदि ने उनके आवास पर पहुंचकर श्रद्धासुमन अर्पित किए। उनके परिवार में तीन पुत्र ब्रिजेश, दिनेश और उमेश त्यागी तथा दो बेटियां मिथलेश, बिमलेश हैं। राजकीय सम्मान के साथ बृहस्पतिवार यानि आज सुबह नौ बजे पैतृक गांव बड़कली में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।
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बड़कली मिलने आए थे एनडी तिवारी
रोहाना। आजादी के आंदोलन में बरेली जेल में सजा काटने के दौरान ज्योति प्रसाद त्यागी की नारायण दत्त तिवारी से गहरी मित्रता हो गई थी। त्यागी ने आजादी के बाद खेती किसानी में जीवन अर्पित कर दिया, लेकिन तिवारी अपने मित्र को नहीं भूले। उत्तराखंड के सीएम का दायित्व निभाते वक्त एनडी तिवारी जब दो अक्तूबर को रामपुर तिराहा पर उत्तराखंड के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करने आए, तब वह हेलीकॉप्टर से बड़कली गांव पहुंचे। तिवारी ने उन्हें गांव में स्थित जूनियर हाईस्कूल में स्वतंत्रता अमर ज्योति प्रतीक निर्माण के लिए पांच लाख रुपये का चेक भेंट किया था। देश के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह, पूर्व राज्यपाल वीरेंद्र वर्मा, महावीर त्यागी आदि से भी उनके मित्रवत संबंध रहे।
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लालकिले पर तिरंगा फहराने के साक्षी रहे
रोहाना। देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत ज्योति प्रसाद त्यागी ने अपने समर्पण और व्यवहार से देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का मन भी जीत लिया था। 15 अगस्त 1947 को दिल्ली के लालकिले पर जब राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराया गया, उन ऐतिहासिक क्षणों में त्यागी भी साक्षी रहे। ग्राम प्रधान मुनेश त्यागी ने बताया कि उनका जीवन सादगी और समाजसेवा के लिए समर्पित रहा। उन्होंने आजादी आंदोलन में आहुति देकर बड़कली गांव का नाम देशभर में रोशन किया।