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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष:
Updated Tue, 06 Mar 2018 11:28 PM IST
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कुश्ती में देश की नई उम्मीद बनी दिव्या सेन
मुजफ्फरनगर।
अंतरराष्ट्रीय कुश्ती में गांव की बेटी देश की गरिमा को अपने स्वर्ण पदकों से सजा रही है। पुरबालियान की दिव्या सेन को बचपन में ही अखाड़े की मिट्टी सुहाने लगी थी। अपनी मेहनत और लगन के दम पर देश की शीर्ष महिला पहलवानों में आज उनकी गिनती है। यूपी की वह एक मात्र मल्ल है, जो आस्ट्रेलिया कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए राष्ट्रीय टीम में चुनी गई है।
आगामी कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए चुनी गई भारतीय महिला कुश्ती टीम में हरियाणा की पांच पहलवानों के साथ यूपी की अकेली मल्ल दिव्या सेन है। 68 किलोग्राम भार वर्ग की खिलाड़ी दिव्या ने कुश्ती में यह मुकाम खुद की जिद से हासिल किया है। अखाड़े में बड़े भाई देव सेन को देखकर कब उसे कुश्ती का शौक लग गया, अहसास भी नहीं हुआ। दंगल में वो लड़कों को पटखनी देने लगी। दिल्ली के गोकुलपुर अखाड़े में लड़कों के बीच प्रशिक्षण लेने का विरोध भी हुआ, मगर उसके इरादे कमजोर नहीं पड़े। कोच अशोक गोस्वामी ने हौसला बढ़ाए रखा। पिता सूरज पहलवान भी दिव्या को आगे बढ़ाने को जुट गए। आर्थिक तंगी में उनकी मां संयोगिता ने कपड़ों की सिलाई की, जिसे पिता वेस्ट यूपी के दंगलों और अखाड़ों में बेचने लगे। बेटी ने पिता के अरमानों को ऊंचाईयां दी। बीते पांच साल में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कुश्ती में उसने ढेरों पदक जीते हैं। वर्ष 2017 में दक्षिणी अफ्रीका में हुई कॉमनवेल्थ कुश्ती चैंपियनशिप में दिव्या ने भारत को स्वर्ण पदक दिलाया। इससे पूर्व 2015 में उसने दिल्ली में आयोजित एशियाई कुश्ती चैंपियनशिप में 70 किग्रा भार वर्ग में जापान, कीर्गिस्तान और मंगोलिया की पहलवानों को पटखनी देकर गोल्ड जीता। वर्ष 2014 में कश्मीर और 2013 में कन्याकुमारी में नेशनल जूनियर कुश्ती में दिव्या ने सोने का दांव खेला। मंगोलिया में एशियन कुश्ती चैंपियनशिप में उन्होंने रजत पदक जीता। केरल में 2015 में हुए नेशनल गेम्स में सीनियर वर्ग में खेली दिव्या को ब्रांज पदक मिला। आस्ट्रेलिया में चार से 14 अप्रैल तक होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स में दिव्या भारत के लिए गोल्ड मेडल जीतना चाहती है। मुश्किल परिस्थितियों में अंतरराष्ट्रीय फलक तक पहुंची दिव्या का गांव पुरबालियान मंसूरपुर से पांच किलोमीटर दूर है। बकौल दिव्या, दादा राजेंद्र और पिता सूरज पहलवान गांव के दंगल में कुश्ती करते थे। घर में कुश्ती पर चर्चा ने ही जिज्ञासा जगाई। कुश्ती को सिर्फ लड़कों का खेल समझा जाता था, मगर अब बेटियां कुश्ती में मुल्क का नाम रोशन कर रही है।
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पदक मिले, नौकरी नहीं
मुजफ्फरनगर। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कुश्ती में ढेरों पदक जीतने के बावजूद दिव्या सेन नौकरी की तलाश में है। दो जुलाई 1998 को पुरबालियान में जन्मी दिव्या सेन के परिवार में दो भाई देव और दीपक सेन हैं। पिता सूरज पहलवान ने बताया कि दिव्या पहले दिल्ली राज्य से खेलती थी। तीन बार रेलवे ने नौकरी के लिए फाइल मंगवाई, मगर आश्वासन कोरा ही रहा। फिर दिल्ली को छोड़ उसने यूपी से खेलने का फैसला लिया। फिलहाल में वह चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी में बीपीईएस तृतीय वर्ष की छात्रा है।
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संस्कृत की संपदा को बढ़ा रही विजय लक्ष्मी
नेट,जेआरएफ में सफल हो रहे विद्यार्थी
(फोटो समाचार)
अमर उजाला ब्यूरो
मुजफ्फरनगर। वेदों की भाषा संस्कृत ने उनकी जिंदगी को महकाया है। जितनी निर्मलता और आत्म अनुभूति संस्कृत के उच्चारण में महसूस होती है, उतनी ही कर्तव्य निष्ठा से डॉ विजय लक्ष्मी अपने विद्यार्थियों और शोधार्थियों को संस्कृत में पारंगत बना रही है। मुजफ्फरनगर के एसडी डिग्री कॉलेज में संस्कृत की विभागाध्यक्ष ने संस्कृत की सेवा को मूल धर्म बनाया है।
खेती बाड़ी से जुड़े किसान के घर में जन्मी डॉ विजय लक्ष्मी ने उच्च शिक्षा हासिल कर बेटियों को प्रेेरित किया। उनकी उपलब्धि अहम इसलिए है कि पिता स्व. यादराम सिंह और हरपालो देवी निरक्षर थे। उन्होंने बेटी को लक्ष्मी माना और अमरोहा से नरेला गुरुकुल दिल्ली में पढ़ने के लिए भेजा। छोटी उम्र में ही संस्कृत अध्ययन में रुचि बढ़ गई। दिल्ली विश्वविद्यालय साउथ कैंपस से उन्होंने एमए संस्कृत में टॉप किया। वेद एवं व्याकरण में पीएचडी डॉ विजय लक्ष्मी के निर्देशन में पांच विद्यार्थी नेट तथा दो जेआरएफ उत्तीर्ण कर चुके हैं। संस्कृत के छात्र-छात्राओं को वह नि:शुल्क शोध निर्देशन देती हैं। डॉ विजय लक्ष्मी बताती हैं कि संस्कृत भारत भूमि की आत्मा है। शिक्षा में संस्कृत भाषा की अनिवार्यता की जाएगी, तो निश्चित ही भावी पीढ़ी संस्कारित बनेगी।
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मुजफ्फरनगर।
अंतरराष्ट्रीय कुश्ती में गांव की बेटी देश की गरिमा को अपने स्वर्ण पदकों से सजा रही है। पुरबालियान की दिव्या सेन को बचपन में ही अखाड़े की मिट्टी सुहाने लगी थी। अपनी मेहनत और लगन के दम पर देश की शीर्ष महिला पहलवानों में आज उनकी गिनती है। यूपी की वह एक मात्र मल्ल है, जो आस्ट्रेलिया कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए राष्ट्रीय टीम में चुनी गई है।
आगामी कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए चुनी गई भारतीय महिला कुश्ती टीम में हरियाणा की पांच पहलवानों के साथ यूपी की अकेली मल्ल दिव्या सेन है। 68 किलोग्राम भार वर्ग की खिलाड़ी दिव्या ने कुश्ती में यह मुकाम खुद की जिद से हासिल किया है। अखाड़े में बड़े भाई देव सेन को देखकर कब उसे कुश्ती का शौक लग गया, अहसास भी नहीं हुआ। दंगल में वो लड़कों को पटखनी देने लगी। दिल्ली के गोकुलपुर अखाड़े में लड़कों के बीच प्रशिक्षण लेने का विरोध भी हुआ, मगर उसके इरादे कमजोर नहीं पड़े। कोच अशोक गोस्वामी ने हौसला बढ़ाए रखा। पिता सूरज पहलवान भी दिव्या को आगे बढ़ाने को जुट गए। आर्थिक तंगी में उनकी मां संयोगिता ने कपड़ों की सिलाई की, जिसे पिता वेस्ट यूपी के दंगलों और अखाड़ों में बेचने लगे। बेटी ने पिता के अरमानों को ऊंचाईयां दी। बीते पांच साल में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कुश्ती में उसने ढेरों पदक जीते हैं। वर्ष 2017 में दक्षिणी अफ्रीका में हुई कॉमनवेल्थ कुश्ती चैंपियनशिप में दिव्या ने भारत को स्वर्ण पदक दिलाया। इससे पूर्व 2015 में उसने दिल्ली में आयोजित एशियाई कुश्ती चैंपियनशिप में 70 किग्रा भार वर्ग में जापान, कीर्गिस्तान और मंगोलिया की पहलवानों को पटखनी देकर गोल्ड जीता। वर्ष 2014 में कश्मीर और 2013 में कन्याकुमारी में नेशनल जूनियर कुश्ती में दिव्या ने सोने का दांव खेला। मंगोलिया में एशियन कुश्ती चैंपियनशिप में उन्होंने रजत पदक जीता। केरल में 2015 में हुए नेशनल गेम्स में सीनियर वर्ग में खेली दिव्या को ब्रांज पदक मिला। आस्ट्रेलिया में चार से 14 अप्रैल तक होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स में दिव्या भारत के लिए गोल्ड मेडल जीतना चाहती है। मुश्किल परिस्थितियों में अंतरराष्ट्रीय फलक तक पहुंची दिव्या का गांव पुरबालियान मंसूरपुर से पांच किलोमीटर दूर है। बकौल दिव्या, दादा राजेंद्र और पिता सूरज पहलवान गांव के दंगल में कुश्ती करते थे। घर में कुश्ती पर चर्चा ने ही जिज्ञासा जगाई। कुश्ती को सिर्फ लड़कों का खेल समझा जाता था, मगर अब बेटियां कुश्ती में मुल्क का नाम रोशन कर रही है।
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पदक मिले, नौकरी नहीं
मुजफ्फरनगर। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कुश्ती में ढेरों पदक जीतने के बावजूद दिव्या सेन नौकरी की तलाश में है। दो जुलाई 1998 को पुरबालियान में जन्मी दिव्या सेन के परिवार में दो भाई देव और दीपक सेन हैं। पिता सूरज पहलवान ने बताया कि दिव्या पहले दिल्ली राज्य से खेलती थी। तीन बार रेलवे ने नौकरी के लिए फाइल मंगवाई, मगर आश्वासन कोरा ही रहा। फिर दिल्ली को छोड़ उसने यूपी से खेलने का फैसला लिया। फिलहाल में वह चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी में बीपीईएस तृतीय वर्ष की छात्रा है।
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संस्कृत की संपदा को बढ़ा रही विजय लक्ष्मी
नेट,जेआरएफ में सफल हो रहे विद्यार्थी
(फोटो समाचार)
अमर उजाला ब्यूरो
मुजफ्फरनगर। वेदों की भाषा संस्कृत ने उनकी जिंदगी को महकाया है। जितनी निर्मलता और आत्म अनुभूति संस्कृत के उच्चारण में महसूस होती है, उतनी ही कर्तव्य निष्ठा से डॉ विजय लक्ष्मी अपने विद्यार्थियों और शोधार्थियों को संस्कृत में पारंगत बना रही है। मुजफ्फरनगर के एसडी डिग्री कॉलेज में संस्कृत की विभागाध्यक्ष ने संस्कृत की सेवा को मूल धर्म बनाया है।
खेती बाड़ी से जुड़े किसान के घर में जन्मी डॉ विजय लक्ष्मी ने उच्च शिक्षा हासिल कर बेटियों को प्रेेरित किया। उनकी उपलब्धि अहम इसलिए है कि पिता स्व. यादराम सिंह और हरपालो देवी निरक्षर थे। उन्होंने बेटी को लक्ष्मी माना और अमरोहा से नरेला गुरुकुल दिल्ली में पढ़ने के लिए भेजा। छोटी उम्र में ही संस्कृत अध्ययन में रुचि बढ़ गई। दिल्ली विश्वविद्यालय साउथ कैंपस से उन्होंने एमए संस्कृत में टॉप किया। वेद एवं व्याकरण में पीएचडी डॉ विजय लक्ष्मी के निर्देशन में पांच विद्यार्थी नेट तथा दो जेआरएफ उत्तीर्ण कर चुके हैं। संस्कृत के छात्र-छात्राओं को वह नि:शुल्क शोध निर्देशन देती हैं। डॉ विजय लक्ष्मी बताती हैं कि संस्कृत भारत भूमि की आत्मा है। शिक्षा में संस्कृत भाषा की अनिवार्यता की जाएगी, तो निश्चित ही भावी पीढ़ी संस्कारित बनेगी।