उम्मीद 2024: मेहनत व समर्पण से तय किया मुकाम, अब दूसरों के लिए प्रेरणा, मुरादाबाद के युवाओं की सक्सेस स्टोरी
मुरादाबाद के युवाओं ने अपने दम पर नए मुकाम तय किए हैं। इसमें शामिल हैं जटपुरा निवासी चालक के बेटे मोईन। जिन्होंने आईएएस बनकर तमाम मिथक तोड़े। इसके अलावा अन्य युवाओं ने भी अपने-अपने क्षेत्र में नाम रोशन किया। पढ़िए शहर के युवाओं की सक्सेस स्टोरी।
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विस्तार
नए साल पर लिए अपने संकल्पों के पथ पर यदि कभी हार का डर सताए और लगे कि पीछे हटना पड़ेगा, तब याद करें इन युवाओं की कहानी, जिन्होंने 2023 में अपनी मेहनत, समर्पण व त्याग से अपने संकल्पों को सच बनाया। छोटे से गांव जटपुरा निवासी बस ड्राइवर के बेटे मोईन का त्याग, जिसने आईएएस बनने के लिए तमाम ईदें किताबों के बीच रहकर गुजार दीं।
डिप्टी एसपी बनने के लिए आयुषी का समर्पण, क्रिकेटर मोहसिन की जिद जिसने पूरी उम्र की विकलांगता देने वाली चोट को मात दी और सर्जरी के बाद मैदान पर उतरे। मुश्किल हालात में दोहराएं मूर्धन्य कवि रामधारी सिंह दिनकर की ये पंक्तियां खम ठोक ठेलता है जब नर, पर्वत के जाते पांव उखड़...।
आईएएस बनने के लिए ईद भी किताबों में गुजारी : मोईन
मेरे पिता वली हसन रोडवेज में संविदा ड्राइवर हैं। डिलारी में हमारा छोटा सा गांव जटपुरा है। मैंने यूपीएससी में 296वीं रैंक हासिल की। यह सफलता चौथे प्रयास में मिली है। अभी मसूरी में प्रशिक्षण ले रहा हूं। परिवार के पालन-पोषण का पूरा दायित्व पिता पर ही है। हम चार भाई और एक बहन हैं। पापा ने मेरे सपने को पूरा करने के लिए बहुत परेशानियां झेली हैं। पापा के पास जमीन नहीं है।
दादा के नाम जो जमीन है, उससे मिलने वाली धनराशि परिवार की जिम्मेदारियों को पूरा करने में खर्च हो जाती है। परिवार में तमाम आर्थिक समस्याएं थीं लेकिन मुझे कभी परिस्थितियों से डर नहीं लगा। जब मैं बीएससी कर रहा था तो सिविल सर्विस में जाने का विचार आया, लेकिन जब कोचिंग के बारे में सोचा तो आर्थिक समस्याएं सामने आ गईं।
रुपये एकत्र करने के लिए मैंने 2016 में साइबर कैफे शुरू किया। वर्ष 2018 तक साइबर कैफे से एकत्र किए रुपयों को कोचिंग के लिए खर्च करने का फैसला किया। 2019 में दिल्ली चला गया। वहां रहने के दौरान बचत के रुपये खर्च हो गए थे। तैयारी पूरी करने के लिए पास में कुछ नहीं बचा तो मैं चिंता में आ गया।
पढ़ाई पूरी करने के लिए ढाई लाख रुपये का लोन लेना पड़ा। पापा ने भी दोस्तों, रिश्तेदारों से मदद ली लेकिन मुझे वापस नहीं लौटने दिया। पहले तीन प्रयासों में मुझे सफलता नहीं मिली। कर्ज की चिंता था लेकिन जानता था कि यदि आईएएस बन गया तो सारा ऋण उतार दूंगा। मैंने हार नहीं मानी और चौथे प्रयास में सफलता मिली।
चौथे प्रयास में हुआ चयन
मैंने परास्नातक राजनीति विज्ञान से किया और फिर नेट जेआरएफ भी राजनीति विज्ञान से किया। सिविल सर्विस की परीक्षा के समय मुख्य विषय राजनीति विज्ञान को चुना। पहला प्रयास तैयारी शुरू करने के तीन महीने के अंदर किया था। दूसरा प्रयास भी असफल रहा। 2021 में तीसरे प्रयास में पेपर में पैटर्न बेसिक रहा था, वह भी पास नहीं हो पाया। चौथे प्रयास में मैंने अपनी कमियों को दूर करते हुए चरणबद्ध तरीके से पढ़ाई की और सफल रहा।
कड़ी मेहनत करें युवा, बदल जाता है सभी का जीवन
युवा साथी अपनी मेहनत हर हाल में जारी रखें, जो सबसे ज्यादा जरूरी है। इस सर्विस में आने के बाद व्यक्तिगत जीवन, सामाजिक प्रतिष्ठा, दोस्त, रिश्तेदार सभी के जीवन में बदलाव आता है। नए-नए लोग मिलते हैं तो देश की विविधता के बारे में गहराई से जानने का मौका मिलता है। इसी के तहत मैं 40 दिन के भारत दर्शन पर जा रहा हूं। इसमें देश के अलग-अलग हिस्सों में घूमेंगे। वहां के लोगों से मुलाकात करेंगे और संस्कृति को समझेंगे।
35 की उम्र में वापसी करना मेरे लिए चुनौती जैसा था : पीयूष चावला
साल 2023 क्रिकेट की दृष्टि से मेरे के लिए बहुत अहम रहा है। आईपीएल 2023 में मैं अपने बेटे के लिए खेला था। क्योंकि उसने मुझे लाइव खेलते हुए कभी नहीं देखा, प्रदर्शन अच्छा रहा उससे खुशी दोगुनी हो गई। मैंने मुंबई की ओर से खेलते हुए टूर्नामेंट में 22 विकेट लिए थे और तीसरे स्थान पर रहा था।
इस वर्ष भी आईपीएल टीम की प्लेइंग इलेवन में मौका मिला तो अपना शत प्रतिशत दूंगा। एक समय में ऐसा लगता था कि अब शायद मैं क्रिकेट से दूर हो रहा हूं। मेरे अंदर का क्रिकेटर यह बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। एक विचार मन में चलता रहता था कि मुझे मैदान पर लौटना है और आईपीएल से बेहतर मंच नहीं हो सकता।
पिछले साल जब मैं आईपीएल ऑक्शन में शामिल हुआ तो मेरे पास आत्मविश्वास और अनुभव के अलावा कुछ नहीं था। अभ्यास सत्र में पसीना बहाया तो नया विश्वास जागा। पिच पर नए प्रयोग करने की हिम्मत मिली जोकि सफल भी रहे। इस अभ्यास ने मेरा हौसला बढ़ा दिया और मैं एक बार फिर आईपीएल खेलने के लिए तैयार हूं।
भारतीय टीम में शामिल होना मेरा लक्ष्य : मोहसिन खान
वर्ष 2023 मेरे लिए बेहद अच्छा रहा। भयंकर इंजरी के कारण में रणजी नहीं खेल पाया था लेकिन इससे उबरने बाद आईपीएल में अपने प्रदर्शन से मैं बेहद खुश रहा। सर्जरी से पहले डॉक्टर ने मुझसे कहा था कि यदि इलाज में थोड़ी और देर करता तो शायद कभी क्रिकेट नहीं खेल पाता। सबकी दुआओं से बुरा वक्त गुजरा और मैं मैदान पर वापसी कर सका।वापसी के बाद दोबारा घंटों अभ्यास करना बड़ी चुनौती थी। इससे पार पाने के लिए मैंने नेट में अकेले गेंदबाजी की है। दर्द सहा है और थककर मैदान पर ही घंटों लेटा रहा हूं। 2023 आईपीएल में जब मैं खेल रहा था तो मेरे पिता आईसीयू में थे। एक तरफ दिमाग में मैच चलता और दूसरी तरफ उनकी चिंता रहती थी।
मुझे याद है हमारी टीम लखनऊ सुपरजायंट्स का जब मुंबई से मैच था तो अंतिम ओवर से पहले मैं टॉयलेट गया। मुझे लगा कि कुछ अलग करने की कोशिश में मैच हात से जा सकता है। मैंने सटीक लेंथ पर गेंदे फेंकने का निर्णय लिया और सफल रहा। आईपीएल खेलने का बड़ा लाभ यह मिला कि मुझे महान क्रिकेटर एमएस धोनी और गौतम गंभीर जैसे दिग्गजों से कई महत्वपूर्ण टिप्स मिले।
इनके अलावा शमी भाई, हार्दिक पांड्या और केएल राहुल से बहुत कुछ सीखने को मिला है। कोशिश रहेगी कि जिस तरह अब तक प्रदर्शन किया है आने वाले साल में उससे कई गुना बेहतर कर पाऊं। अब मेरा लक्ष्य है कि 2025 तक मुझे भारतीय क्रिकेट टीम में शामिल होना है। इस लक्ष्य को आंखों में लेकर मैं अपनी तैयारी कर रहा हूं।
चोट को चोट देकर यूपी की रणजी टीम के कप्तान बने आर्यन
आर्यन जुयाल ने बताया कि नए साल में यूपी की रणजी टीम की कप्तानी मिलना मेरे लिए गर्व का विषय है। साल 2023 की शुरुआत तो बेहद अच्छी रही। पहले इंग्लैंड में काउंटी क्रिकेट में मैंने तीन शतक लगाकर करीब 1200 रन बनाए। इसके बाद सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी में भी अच्छा प्रदर्शन रहा। जून 2023 में मेरे घुटने में गंभीर चोट लग गई, जिसके कारण मैं यूपी लीग भी नहीं खेल पाया।
तीन महीने मैदान से दूर बिस्तर पर काटने पड़े। वह दौर मेरे लिए बहुत मुश्किल भरा रहा। मुझे लगा कि चोट के कारण कई महत्वपूर्ण टूर्नामेंट मेरे हाथ से निकल जाएंगे। इसके बाद विजय हजारे ट्रॉफी में वापसी का मौका मिला। मैंने नेट पर कड़ा अभ्यास किया और लगातार तीन पारियों में 85-85 रन बनाए।
पिछले वर्ष भी मैं विजय हजारे ट्रॉफी में पांच सौ से ज्यादा रन बनाकर टॉप स्कोरर रहा था। अब मंगलवार को हमारी फ्लाइट है। पांच जनवरी से रणजी ट्रॉफी के मैच होने हैं। इस समय ठंड काफी है लेकिन मैंने अभ्यास का समय कम नहीं किया है। मैं नेट पर ज्यादा से ज्यादा समय बिताने में विश्वास रखता हूं, इससे मैच में प्रदर्शन निखरता है। रणजी ट्रॉफी के मैचों में हमारी टीम खिताब पर कब्जा करने के लिए दम लगाएगी।
मुझे टॉपर बनना था, इसलिए मामा की शादी में नहीं हुई शामिल : आफिया
मेरे पिता इकबाल अहमद की सिलाई के सामान की दुकान है। हम पांच भाई-बहनों को उन्होंने बहुत मेहनत व संघर्ष से पढ़ाया है। पिता की मेहनत ही मेरी प्रेरणा का आधार है। पढ़ाई व अपने लक्ष्य के अलावा मैंने कभी किसी और चीज को प्राथमिकता नहीं दी। शायद इसी वजह से 2023 में मैंने कक्षा 12 की बोर्ड परीक्षा में यूपी में पांचवां स्थान प्राप्त किया है।
प्री-बोर्ड से कुछ दिन पहले ही मेरे सगे मामा की शादी थी, मैं वहां नहीं गई। मेरे परिजनों ने भी पढ़ाई में पूरा सहयोग किया है। उन्होंने कभी पढ़ाई छोड़कर पार्टी में जाने का दबाव नहीं बनाया। हां ऐसा करने के बाद जिम्मेदारी और बढ़ जाती थी कि अब तो खुद को साबित करना ही होगा। यदि ऐसा नहीं कर पाई तो खुद का सामना करना भी मुश्किल होगा।
मैं छोटे-छोटे टारगेट बनाकर पढ़ाई कि। सेल्फ स्टडी लगातार करती थी इसलिए कभी ट्यूशन की जरूरत महसूस नहीं हुई। 2017 में मेरी बड़ी बहन मंतशा परवीन ने भी यूपी बोर्ड में टॉप किया था। उनसे मुझे प्रेरणा मिलती है। अब वह न्याय विभाग में स्टेनो हैं और मैं डॉक्टर बनने के लिए तैयारी कर रही हूं।
बोर्ड परीक्षा की तरह नीट की तैयारी में भी मैं स्वाध्याय को महत्व दे रही हूं। ऑनलाइन माध्यम से सिलेबस लेकर तैयारी करती हूं। हर विषय को समान समय देकर अध्ययन करती हूं। शादियों में न जाने का सिलसिला अब भी जारी है। मेरा संकल्प है कि डॉक्टर बनने के बाद ही किसी पार्टी में शिरकत करूंगी। मेरा मानना है कि पार्टियों के अलावा मोबाइल और सोशल मीडिया को ज्यादा समय देना भी लक्ष्य से भटकाव का कारण है।
बीमारी में छूटे प्री-बोर्ड, तो लगा सब खत्म : उन्नति
सर्दियों में अक्सर मेरी तबीयत खराब हो जाती है। बोर्ड परीक्षा से पहले प्री बोर्ड के समय मुझे टाइफायड, मलेरिया हुआ था। इसके कारण प्री-बोर्ड परीक्षा छोड़नी पड़ी। मुझे लगा कि अब सब खत्म हो गया है, 12वीं में 95 प्रतिशत से अधिक अंक लाने का जो सपना देखा था वो पूरा नहीं हो पाएगा। तबीयत ठीक होने के सात दिन बाद तक मैं डिप्रेशन में रही।
उसके बाद याद आया कि मेरे नोट्स कब काम आएंगे। मुझे कक्षा नौ से ही अपने नोट्स बनाने की आदत है। नोट्स का फायदा यह होता है कि अपने तरीके से लिखी गई चीजें बस रिवीजन करने से तैयार हो जाती हैं। मैंने करीब 20 दिन में नोट्स की मदद से सारा रीविजन कर लिया।
उसके बाद बोर्ड परीक्षा के लिए अखबार से मॉल पेपर हल करना, पिछले वर्षों के प्रश्न पत्र हल करना और अध्यापकों से लगातार सलाह लेना काम आया। आखिरकार मैंने बोर्ड परीक्षा में 96.2 प्रतिशत अंक प्राप्त किए। अब मैं डॉक्टर बनने के लिए नीट की तैयारी कर रही हूं।
खुद को साबित करना था चुनौती : आयुषी
मुरादाबाद के रहने वाली आयुषी के मुताबिक जब उनकी उम्र 17 वर्ष की थी। भरी कचहरी में पिता की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। समय बीता लेकिन उस घटना से बाहर आना मेरे लिए संभव नहीं था। मेरे पिता मुझे प्रशासनिक अधिकारी बनते देखना चाहते थे। उनकी इच्छा को मैंने अपना लक्ष्य बना लिया। 2021 में तैयारी शुरू की ही थी तो कोरोना का संक्रमण देश में फैलने लगा। मुझे दिल्ली से वापस मुरादाबाद आना पड़ा।
हर समय खुद को साबित करने व पापा के सपने को पूरा करने चिंता मुझे रहती थी। 2022 में मैंने फिर से तैयारी शुरू की। पहली बार ही प्री परीक्षा में ही फेल हो गई तो हिम्मत टूट गई थी। कोई समझाने वाला नहीं था, मेरे परिवार में भी किसी ने पहले सिविल सर्विस की तैयारी नहीं की थी, इसलिए परेशान रहती थी कि किससे सलाह लूं।
पापा की बातें मेरे दिमाग में घूमती रहती थीं, लिहाजा मैंने खुद को संभाला और मूल्यांकन किया कि गलती कहां हुई है। मैंने पाया कि कुल तीन अंक से मैं प्री परीक्षा में पास नहीं हो पाई। अगली बार मेंस को ध्यान में रखकर तैयारी शुरू की। लगातार लिखने की आदत डाली।
धीरे-धीरे आत्मविश्वास बढ़ता गया कि इस बार जीत होगी। परिणाम सार्थक रहा और मैंने सबसे पहले अपनी मां को कॉल कर कहा कि मैं डिप्टी एसपी बनूंगी। हम दोनों की आंखों में नमी थी।
मेरी सफलता ही मेरे पिता को श्रद्धांजलि
जब पापा चले गए, तब परिस्थितियां बहुत अलग थीं। इतनी बड़ी घटना के बाद हमारी समझने की शक्ति शून्य हो चुकी थी। मैं हमेशा से अपने पापा को श्रद्धांजलि देना चाहती थी, इसलिए उनके सपने को पूरा करने के लिए मेहनत की। यह सफलता ही मेरी ओर से पापा को श्रद्धांजलि है।
अब मैं इस पद के जरिये लोक सेवा में अच्छे काम करके अपने परिवार का नाम रोशन करना चाहती हूं। सिविल सर्विस की तैयारी के लिए परिवार का सहयोग बहुत जरूरी है, चूंकि पता नहीं होता कि सफल होने में कितना समय लग जाए।