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Moradabad News: कोई गा रहा गजल तो कोई बांसुरी पर छेड़ रहा तान
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मुरादाबाद। शाम का वक्त। ड्राइंग रूम में महफिल सजी है। हारमोनियम संभाले बैठा शख्स गुलाम अली की गाई मशहूर गजल का पहला मिसरा उठाता है... रफ्ता-रफ्ता वो मेरी हस्ती का सामां हो गए...। गजल जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, महफिल परवान चढ़ती जाती है... आप से फिर तुम हुए, फिर तू का उनवां हो गए'' तक पहुंचते-पहुंचते महफिल पर संगीत की खुमारी पूरी तरह छा चुकी है। ड्राइंग रूम में मौजूद लोगों का दाद देने का सिलसिला थम नहीं रहा। यह महफिल सजी है पीएसी में तैनात डिप्टी कमांडेंट अनूप सिंह के घर पर और गायक भी वही हैं।
अनूप सिंह अकेले नहीं हैं। जिले के कई बड़े अधिकारी काम के दबाव को कम करने के लिए इन दिनों संगीत का सहारा ले रहे हैं। दरअसल हम लोग दिन भर जिस तरह के दबाव से जूझते हैं, उससे मुक्ति के लिए संगीत से बेहतर कोई जरिया नहीं है। ज्यादातर अफसर सुनते हैं और मेरे जैसे कुछ ऐसे भी हैं जो मौसिकी में हाथ भी आजमाते हैं। यह कहते हुए एसपी सिटी कुमार रणविजय सिंह गुनगुनाने लगते हैं- दूर कहीं जब दिन ढल जाए...।
अनूप सिंह की तरह रणविजय सिंह भी संगीत का शौक रखते हैं। वह सिर्फ बाथरूम सिंगर नहीं हैं बल्कि कभी अकेले तो, कभी दोस्तों के साथ बाकायदा गीत- संगीत की महफिल जमाते हैं। नगर आयुक्त दिव्यांशु पटेल गाते तो नहीं है, मगर जब-तब पियानो पर हाथ जरूर आजमाते हैं। उन्हें न तो मशहूर जर्मन संगीतकार बीथोवन नवीं सिम्फनी से कोई लेना-देना है, न मोजार्ट के जादुई संगीत की दुनिया से। कहते हैं- मेरे लिए पियानो सिर्फ सुकून के पल हासिल करने का जरिया है।
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अपर आयुक्त (खाद्य) एके सिंह के लिए भी बांसुरी कुछ ऐसा ही काम करती है। उन्हें जब मौका मिलता है बांसुरी लेकर घर के किसी कोने में बैठ जाते हैं। बांसुरी पर पुराने फिल्मी गानों की धुन निकालने का उनका शौक पुराना है। ये रातें ये मौसम, नदी का किनारा, ये चंचल हवा... की तान बांसुरी पर छेड़ते हुए उनके मन के भीतर भी चंचल हवाएं हिलोरे लेने लगती हैं। रोजमर्रा के कामकाज का दबाव कुछ देर के लिए ही सही, बिसर जाता है। अवसाद को कम करता है।
पिछले कुछ वर्षों के भीतर हुए चिकित्सा संबंधी अध्ययनों में मानसिक रोगों के उपचार के लिए संगीत खासा उपयोगी बताया गया है। तंत्रिका विज्ञान से जुड़े विशेषज्ञ कहते हैं कि पसंदीदा संगीत सुनते समय मस्तिष्क डोपामाइन रिलीज करता है। यह ऐसा न्यूरोट्रांसमीटर है जो अवसाद के लक्षणों को कम करने में सहायक होता है। इसके अलावा संगीत हिप्पोकैंपस को सक्रिय करता है। यह मस्तिष्क का वह हिस्सा है जो स्मृतियों के निर्माण में अहम भूमिका निभाता है। संगीत सुनने से आपकी याददाश्त भी सुधरती है।
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अनूप सिंह अकेले नहीं हैं। जिले के कई बड़े अधिकारी काम के दबाव को कम करने के लिए इन दिनों संगीत का सहारा ले रहे हैं। दरअसल हम लोग दिन भर जिस तरह के दबाव से जूझते हैं, उससे मुक्ति के लिए संगीत से बेहतर कोई जरिया नहीं है। ज्यादातर अफसर सुनते हैं और मेरे जैसे कुछ ऐसे भी हैं जो मौसिकी में हाथ भी आजमाते हैं। यह कहते हुए एसपी सिटी कुमार रणविजय सिंह गुनगुनाने लगते हैं- दूर कहीं जब दिन ढल जाए...।
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अनूप सिंह की तरह रणविजय सिंह भी संगीत का शौक रखते हैं। वह सिर्फ बाथरूम सिंगर नहीं हैं बल्कि कभी अकेले तो, कभी दोस्तों के साथ बाकायदा गीत- संगीत की महफिल जमाते हैं। नगर आयुक्त दिव्यांशु पटेल गाते तो नहीं है, मगर जब-तब पियानो पर हाथ जरूर आजमाते हैं। उन्हें न तो मशहूर जर्मन संगीतकार बीथोवन नवीं सिम्फनी से कोई लेना-देना है, न मोजार्ट के जादुई संगीत की दुनिया से। कहते हैं- मेरे लिए पियानो सिर्फ सुकून के पल हासिल करने का जरिया है।
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अपर आयुक्त (खाद्य) एके सिंह के लिए भी बांसुरी कुछ ऐसा ही काम करती है। उन्हें जब मौका मिलता है बांसुरी लेकर घर के किसी कोने में बैठ जाते हैं। बांसुरी पर पुराने फिल्मी गानों की धुन निकालने का उनका शौक पुराना है। ये रातें ये मौसम, नदी का किनारा, ये चंचल हवा... की तान बांसुरी पर छेड़ते हुए उनके मन के भीतर भी चंचल हवाएं हिलोरे लेने लगती हैं। रोजमर्रा के कामकाज का दबाव कुछ देर के लिए ही सही, बिसर जाता है। अवसाद को कम करता है।
पिछले कुछ वर्षों के भीतर हुए चिकित्सा संबंधी अध्ययनों में मानसिक रोगों के उपचार के लिए संगीत खासा उपयोगी बताया गया है। तंत्रिका विज्ञान से जुड़े विशेषज्ञ कहते हैं कि पसंदीदा संगीत सुनते समय मस्तिष्क डोपामाइन रिलीज करता है। यह ऐसा न्यूरोट्रांसमीटर है जो अवसाद के लक्षणों को कम करने में सहायक होता है। इसके अलावा संगीत हिप्पोकैंपस को सक्रिय करता है। यह मस्तिष्क का वह हिस्सा है जो स्मृतियों के निर्माण में अहम भूमिका निभाता है। संगीत सुनने से आपकी याददाश्त भी सुधरती है।