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भाषाओं के आपसी संबंधों के लिए आवश्यक है अनुवाद
Sun, 14 Mar 2021 02:00 AM IST
मुरादाबाद ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो, मुरादाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, मुरादाबाद
Published by: मुरादाबाद ब्यूरो
Updated Sun, 14 Mar 2021 02:00 AM IST
सार
बदलती, निखरती और बढ़ती हिंदी के दूसरी भारतीय भाषाओं से संबंधों पर दो दिवसीय शोध संगोष्ठी का आयोजन शनिवार को हुआ। महाराजा हरिश्चंद्र महाविद्यालय के हिंदी अध्ययन एवं शोध विभाग की ओर से आयोजित संगोष्ठी में अन्तरराष्ट्रीय हिंदीसेवियों ने हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाएं : अंत:संबंध और वैशिष्ट्य विषय पर अपने विचार रखे। वक्ताओं ने माना की भाषाओं के आपसी संबंधों को मजबूत करने के लिए अनुवाद की परंपरा को बढ़ाना जरूरी है।
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शोध संगोष्ठी को संबोधित करते वरिष्ठ भाषा वैज्ञानिक प्रो. नरेश मिश्र
- फोटो : amar ujala
विस्तार
बदलती, निखरती और बढ़ती हिंदी के दूसरी भारतीय भाषाओं से संबंधों पर दो दिवसीय शोध संगोष्ठी का आयोजन शनिवार को हुआ। महाराजा हरिश्चंद्र महाविद्यालय के हिंदी अध्ययन एवं शोध विभाग की ओर से आयोजित संगोष्ठी में अन्तरराष्ट्रीय हिंदीसेवियों ने हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाएं : अंत:संबंध और वैशिष्ट्य विषय पर अपने विचार रखे। वक्ताओं ने माना की भाषाओं के आपसी संबंधों को मजबूत करने के लिए अनुवाद की परंपरा को बढ़ाना जरूरी है।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष डा. राजनारायण शुक्ल ने कहा कि हिंदी को तभी सम्मान मिलेगा जब हिंदी दूसरी भाषाओं को उतने ही अपनेपन से स्वीकार करेगी जैसा व्यवहार वह स्वयं के लिए चाहती है। अब हमे दक्षिण भारत की भाषाओं की ओर हाथ बढ़ाने होंगे जिससे अंत:संबंध स्थापित हों। मुख्य वक्ता बांदा से आए डा. अश्विनी शुक्ल ने कहा कि उच्चारण मानस पर अंकित होने के बाद उसमें बदलाव संभव नहीं है। ऐसे में जो मन पर अंकित हो गया उसी उच्चारण के अनुसार भाषा अपना स्वरूप बना लेती है। लिखते समय वही लिखा जाएगा जो बोला जाएगा। इसलिए हमें लेखन के साथ उच्चारण के भी मानक स्वरूप को विकसित करना होगा।
मुख्य अतिथि रोहतक विवि के पूर्व कार्यवाहक कुलपति और वरिष्ठ भाषा वैज्ञानिक प्रो. नरेश मिश्र ने संगोष्ठी में हिंदी की ध्वनि और भाषा बनने के क्रम को व्यवहारिक रूप से समझाया। उन्होंने हिंदी के लेखन के मानकीकरण पर बल दिया। उन्होंने कहा कि भाषा जितनी सरल होगी उतनी ज्यादा स्वीकार की जाएगी। हिंदी का सरलीकरण ही उसकी स्वीकार्यता है। संचालन संगोष्ठी के संयोजक डा. मुकेश चंद्र गुप्ता और आभार अभिव्यक्ति सह संयोजिका डा. प्रियंका गुप्ता ने किया।
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दूसरे तकनीकी सत्र में अन्य महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों से आए शोधार्थियों और प्रवक्ताओं ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। सत्र की अध्यक्षता पीलीभीत से आए डा. प्रणव शास्त्री ने की, मुख्य वक्ता डा. रंजन विशद रहे। मुख्य अतिथि ओज कवि और हिंदी विद्वान डा. राहुल अवस्थी रहे।
इसके बाद सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया। जिसका शुभारंभ मुख्य अतिथि एमएलसी डा. जयपाल सिंह व्यस्त ने दीप प्रज्ज्वलन करके किया। कवि मयंक शर्मा, राजीव प्रखर ने कविता पाठ किया। महाविद्याय की छात्रा नीशू, निर्भय गुप्ता आदि ने नृत्य प्रस्तुतियां दीं। इस मौके पर पूर्व प्रबंधक डॉ. विश्व अवतार जैमिनी, प्रबंधक डॉ. काव्य सौरभ रस्तोगी, प्राचार्य डॉ. मीना कौल, साहित्यभूषण से सम्मानित डा. महेश दिवाकर, हिंदी आचार्य डा. रामानंद शर्मा, पूर्व प्राचार्य डा. डीएन शर्मा, डॉ. सुधीर अरोरा, डॉ. मोहम्मद अय्यूब, डॉ. आसमा अजीज, डॉ. मनीष भट्ट, डा. शुभ्रा, डा. मोहन मुकेश आदि उपस्थित रहे।
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उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष डा. राजनारायण शुक्ल ने कहा कि हिंदी को तभी सम्मान मिलेगा जब हिंदी दूसरी भाषाओं को उतने ही अपनेपन से स्वीकार करेगी जैसा व्यवहार वह स्वयं के लिए चाहती है। अब हमे दक्षिण भारत की भाषाओं की ओर हाथ बढ़ाने होंगे जिससे अंत:संबंध स्थापित हों। मुख्य वक्ता बांदा से आए डा. अश्विनी शुक्ल ने कहा कि उच्चारण मानस पर अंकित होने के बाद उसमें बदलाव संभव नहीं है। ऐसे में जो मन पर अंकित हो गया उसी उच्चारण के अनुसार भाषा अपना स्वरूप बना लेती है। लिखते समय वही लिखा जाएगा जो बोला जाएगा। इसलिए हमें लेखन के साथ उच्चारण के भी मानक स्वरूप को विकसित करना होगा।
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मुख्य अतिथि रोहतक विवि के पूर्व कार्यवाहक कुलपति और वरिष्ठ भाषा वैज्ञानिक प्रो. नरेश मिश्र ने संगोष्ठी में हिंदी की ध्वनि और भाषा बनने के क्रम को व्यवहारिक रूप से समझाया। उन्होंने हिंदी के लेखन के मानकीकरण पर बल दिया। उन्होंने कहा कि भाषा जितनी सरल होगी उतनी ज्यादा स्वीकार की जाएगी। हिंदी का सरलीकरण ही उसकी स्वीकार्यता है। संचालन संगोष्ठी के संयोजक डा. मुकेश चंद्र गुप्ता और आभार अभिव्यक्ति सह संयोजिका डा. प्रियंका गुप्ता ने किया।
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दूसरे तकनीकी सत्र में अन्य महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों से आए शोधार्थियों और प्रवक्ताओं ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। सत्र की अध्यक्षता पीलीभीत से आए डा. प्रणव शास्त्री ने की, मुख्य वक्ता डा. रंजन विशद रहे। मुख्य अतिथि ओज कवि और हिंदी विद्वान डा. राहुल अवस्थी रहे।
इसके बाद सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया। जिसका शुभारंभ मुख्य अतिथि एमएलसी डा. जयपाल सिंह व्यस्त ने दीप प्रज्ज्वलन करके किया। कवि मयंक शर्मा, राजीव प्रखर ने कविता पाठ किया। महाविद्याय की छात्रा नीशू, निर्भय गुप्ता आदि ने नृत्य प्रस्तुतियां दीं। इस मौके पर पूर्व प्रबंधक डॉ. विश्व अवतार जैमिनी, प्रबंधक डॉ. काव्य सौरभ रस्तोगी, प्राचार्य डॉ. मीना कौल, साहित्यभूषण से सम्मानित डा. महेश दिवाकर, हिंदी आचार्य डा. रामानंद शर्मा, पूर्व प्राचार्य डा. डीएन शर्मा, डॉ. सुधीर अरोरा, डॉ. मोहम्मद अय्यूब, डॉ. आसमा अजीज, डॉ. मनीष भट्ट, डा. शुभ्रा, डा. मोहन मुकेश आदि उपस्थित रहे।
अन्य भाषाओं के विद्वानों के कार्यों को सामने ला रहा भाषा संस्थान : राजनारायण शुक्ल
उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. राजनारायण शुक्ल ने कहा कि कश्मीर को ज्यादातर लोग आतंकवाद की वजह से पहचानते हैं, जबकि साहित्य के क्षेत्र में स्थिति एकदम अलग है। देशभर में भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने वाले विद्वानों में 60 फीसदी विद्वान कश्मीर से हैं। साहित्य के क्षेत्र में किए जा रहे उनके प्रयासों को उप्र भाषा संस्थान किताब का रूप दे रहा है। करीब 25 विद्वानों का परिचय और उनके कार्यों पर एक किताब प्रकाशित की जा रही है। इसके अलावा उप्र सरकार ने महाराष्ट्र सरकार ने मराठी भाषा के हिंदी में अनुवाद के लिए एमओयू किया है। इसके अलावा संस्थान की ओर से एलोपैथिक चिकित्सा सर्जरी की किताब हिंदी में प्रकाशित की जा रही है, ताकि आम जनता भी एलोपैथिक चिकित्सा को समझ सके। डॉ. राजनारायण के अनुसार अरुणाचल प्रदेश की लोक कथाओं का हिंदी में प्रकाशन किया जा रहा है। संस्थान की ओर से अभी शहरों में केंद्र खोलने के बजाय जागरूकता पर काम किया जा रहा है, इसके लिए सेमिनार और कार्यशालाओं का आयोजन किया जा रहा है।