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Moradabad News: पीना तो छोड़ो नहाने लायक नहीं बचा रामगंगा का पानी

Moradabad  Bureau मुरादाबाद ब्यूरो
Updated Mon, 26 Jan 2026 01:36 AM IST
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Forget drinking, the water of Ramganga is no longer fit for bathing.
मुरादाबाद। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की क्षेत्रीय प्रयोगशाला मुरादाबाद की ताजा जांच रिपोर्ट ने रामगंगा नदी की सेहत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। छह जनवरी 2026 को कटघर स्थित मुरादाबाद-रामपुर रोड पुल के पास से लिए गए सतही जल के नमूने में पानी की गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतरी।
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रिपोर्ट के अनुसार नदी के पानी का पीएच 7.62 पाया गया, जो सामान्य सीमा में है लेकिन टर्बिडिटी 30.3 एनटीयू और कुल ठोस पदार्थ 370 मिग्रा/लीटर दर्ज किए गए। यह रिपोर्ट पानी की गंदगी की ओर इशारा करती है। कुल घुलित ठोस(टीडीएस) 340 मिग्रा/लीटर और कठोरता 262 मिग्रा/लीटर रही। इसकी वजह से पानी न तो पीने योग्य है और न ही सीधे घरेलू उपयोग में किया जा सकता है।
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रामगंगा नदी के पानी में सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा कोलीफॉर्म बैक्टीरिया का है। जांच में टोटल कोलीफॉर्म 21,000 एमपीएन/100 मिली और फीकल कोलीफॉर्म 12,000 एमपीएन/100 मिली पाया गया। जबकि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के मानकों के अनुसार, नहाने योग्य पानी (क्लास-बी) में टोटल कोलीफॉर्म की सीमा 500 एमपीएन/100 मिली तक होनी चाहिए।
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यह आंकड़ा तय सीमा से कई गुना अधिक है। हालांकि डिजॉल्व्ड ऑक्सीजन (डीओ) 6.5 मिग्रा/लीटर और बीओडी 3.6 मिग्रा/लीटर दर्ज की गई। यह जलीय जीवन के लिए आंशिक रूप से अनुकूल मानी जा सकती है, लेकिन अत्यधिक जीवाणु प्रदूषण ने स्थिति को गंभीर बना दिया है। जल गुणवत्ता मानकों की तुलना में रामगंगा का यह पानी पीने, नहाने और घरों में उपयोग के लिए अनुपयुक्त पाया गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बिना शोधन नदी का यह पानी मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकता है। यह रिपोर्ट एक बार फिर साफ करती है कि रामगंगा में बढ़ता सीवेज और अपशिष्ट जल प्रदूषण रोकने के लिए ठोस और तत्काल कदम उठाने की जरूरत है, वरना आने वाले समय में हालात और बिगड़ सकते हैं।



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इस तरह हो रही रामगंगा दूषित



शहर में ताजपुर पुल से लेकर रामगंगा पुल तक करीब 20 से अधिक स्थानों पर स्क्रैप को धुलने का काम बेधड़क किया जा रहा है। यही स्क्रैप के कण रामगंगा नदी में बहाए जा रहे हैं। जिससे नदी का पानी प्रदूषित हो रहा है। इससे निकलने वाले कार्बन से पानी का रंग काला हो गया है। इसके बावजूद स्क्रैप कारोबारियों के खिलाफ कोई खास कार्यवाही होती नहीं दिखाई दे रही है। ताजपुर पुल से लेकर रामगंगा पुल तक करीब 250 कर्मचारी प्रतिदिन स्क्रैप धुलने का काम करते हैं। यहां पर करीब पांच हजार कुंतल स्क्रैप रखा हुआ है। रामगंगा नदी के किनारे छोटे-बड़े गड्ढे बनाए गए हैं। इन गड्ढों में स्क्रैप को डाला जाता है। इसके बाद इन्हें पानी से धुला जाता है। स्क्रैप से निकलने वाले एल्युमिनियम, पीतल, लोहे के कण व केमिकल रामगंगा नदी में जाता है। स्क्रैप के कण व केमिकल रोकने के लिए किसी प्रकार का कोई इंतजाम नहीं है। रामगंगा नदी किनारे जगह-जगह स्क्रैप के कण फैला हुआ है। इसके साथ ही स्क्रैप से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थ को नदी के किनारे छोड़ दिया जाता है। इसकी वजह से रामगंगा नदी का पानी के साथ-साथ मिट्टी भी दूषित हो रही है।

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पांच कर्मचारी प्रतिदिन धुलते हैं 50 कुंतल स्क्रैप

स्क्रैप धुलने वाले कर्मचारियों ने बताया कि पांच कर्मचारी एक दिन में करीब 50 क्विंटल स्क्रैप धुलते हैं। एक कर्मचारी एक दिन में एक हजार रुपये से अधिक का काम करता है। बरवालान के गली नंबर सात के सामने स्क्रैप धुलने वाले कर्मचारी मोहम्मद मुनीर ने बताया कि वह दो रुपये प्रति किलो के हिसाब से स्क्रैप धुलते हैं। वह प्रतिदिन पांच से छह कुंतल स्क्रैप निकालते हैं। वह बताते हैं दिल्ली से स्क्रैप मंगाया जाता है। इसकी कीमत 10 रुपये प्रति किलो होती है। इसे स्क्रैप पाउडर कहते हैं। वहीं स्क्रैप धुलने वाले कर्मचारी मोहम्मद अजीज ने बताया कि वह प्रतिदिन तीन से चार कुंतल स्क्रैप धुलते हैं। स्क्रैप धुलने के बाद बचे पानी को रामगंगा नदी में छोड़ दिया जाता है।



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स्क्रैप से तैयार की जाती है सिल्ली



बरवालान, नवाबपुरा, पीरगैब, दौलतबाग, रहमतनगर, करूला, मुगलपुरा, दीवान का बाजार, लालबाग, ताजपुर माफी आदि जगहों पर हजारों भट्ठियां हैं। इन भट्ठियों में स्क्रैप से पीतल, एल्युमिनियम की सिल्ली तैयार की जाती है। इसके लिए स्क्रैप को कोयले के लौह में गलाया जाता है और सांचे से सिल्ली ढाली जाती है।


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रामगंगा नदी किनारे स्क्रैप धुलने वालों पर लगातार कार्यवाही की जा रही है। दो दिनों के भीतर कई स्क्रैप कारोबारियों पर कार्यवाही हुई है। आगे भी कार्यवाही जारी रहेगी।-डीके गुप्ता, क्षेत्रीय अधिकारी, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
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