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Moradabad News: 32 हजार लोगों को कैशलेस इलाज पर खतरे की घंटी
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मुरादाबाद। जिले में 32 हजार लोगों को जरूरत पड़ने पर कैशलेस इलाज मिलेगा या नहीं, इस पर सवालिया निशान लगने लगे हैं। कुछ अस्पतालों ने तीन प्रमुख हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों के पैनल से खुद को अलग कर लिया है। डॉक्टरों का आरोप है कि इलाज के खर्च की अनुमति देने के बाद यह कंपनियां पीछे हट जाती हैं।
आईएमए और नर्सिंग होम एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. रवि गंगल बताते हैं कि कुछ माह पहले उनके नर्सिंग होम में एक महिला की डिलीवरी हुई। हेल्थ कंपनी ने मरीज के प्रीमियम के मुताबिक पूरा इलाज कैशलेस करने का ई-मेल भेजा। प्रक्रिया शुरू हुई और मरीज स्वस्थ होकर घर लौट गई लेकिन भुगतान के समय कंपनी ने सिर्फ आधा पेमेंट किया। बार-बार ई-मेल भेजने पर सात हजार रुपये और भेजे। इसके बाद पैनल से हटने के लिए कह दिया। यह सिर्फ एक उदाहरण है। इसी तरह डॉक्टरों की एसोसिएशन एएचपीआई के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष डॉ. अनुराग मेहरोत्रा बताते हैं कि हम इन कंपनियों के कार्ड स्वीकार नहीं करेंगे। कंपनियां मरीज और अस्पताल दोनों के साथ धोखा कर रही हैं। एसोसिएशन ऑफ हेल्थ प्रोवाइडर्स इंडिया (एएचपीआई) ने दो हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों की कैशलेस सुविधा को सितंबर से खत्म करने का नोटिस दिया है। एक ओर स्वास्थ्य बीमा पर जीएसटी कम करने के बाद लोगों को राहत मिली है। दूसरी ओर इन तीन कंपनियों के 32 हजार बीमा धारकों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
इन इंश्योरेंस कंपनियों की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक हेल्थ इंश्योरेंस का क्लेम लगातार बढ़ रहा है जिससे उन पर काफी वित्तीय दबाव है। निजी अस्पताल इलाज का खर्च भी बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते हैं। हालांकि इस वित्तीय दबाव को कम करने के लिए हर साल हेल्थ इंश्योरेंस का प्रीमियम 10 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।
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अस्पताल कभी भी कैशलेस इलाज के लिए कर सकते हैं मना
एएचपीआई निजी अस्पतालों का एसोसिएशन है और अस्पताल संचालक इन कंपनियों की हेल्थ पॉलिसी स्वीकार न करने का मन बना चुके हैं। हालांकि अब इंश्योरेंस कंपनियों की तरफ से कहा जा रहा है कि एएचपीआई से बातचीत हो गई है और ग्राहकों को सूचीबद्ध या पैनल में शामिल अस्पतालों में कैशलेस इलाज की सुविधा जारी रहेगी लेकिन जानकारों का कहना है कि पिछले कई दिनों से अस्पताल और इंश्योरेंस कंपनियों के बीच जो झगड़ा चल रहा है उसे देखते हुए साफ है कि अस्पताल कभी भी कैशलेस इलाज के लिए मना कर सकते हैं।
डॉक्टरों के वर्जन (फोटो)
गुजरात और अन्य प्रदेशों में डॉक्टर इन कंपनियों को सही-गलत का अंतर बता चुके हैं। मुरादाबाद में भी इसकी तैयारी है। मैं खुद भी अपना बीमा स्टार हेल्थ से हटाकर न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी की पॉलिसी के तहत करा रहा हूं।
- डॉ. रवि गंगल, पूर्व अध्यक्ष, आईएमए
कंपनियों के प्रतिनिधियों से लगातार बातचीत चल रही है लेकिन नतीजा सिफर है। अगला कदम यही होगा कि सभी अस्पताल मिलकर इन कंपनियों का बायकॉट करेंगे। मरीजों के हितों को कंपनियों को समझना ही होगा।
- डॉ. सीपी सिंह, अध्यक्ष आईएमए
जब मरीज को महंगे इलाज की जरूरत पड़ती है को यह कंपनियां हाथ खड़े कर देती हैं। एएचपीआई ने इन कंपनियों को नोटिस दिया है। यदि कंपनियों ने अपना रवैया नहीं सुधरा तो इनकी कैशलेस सुविधा स्वीकार करने से अस्पताल इनकार कर सकते हैं।
- डॉ. अनुराग मेहरोत्रा, प्रभारी, एएचपीआई (वेस्ट यूपी)
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आईएमए और नर्सिंग होम एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. रवि गंगल बताते हैं कि कुछ माह पहले उनके नर्सिंग होम में एक महिला की डिलीवरी हुई। हेल्थ कंपनी ने मरीज के प्रीमियम के मुताबिक पूरा इलाज कैशलेस करने का ई-मेल भेजा। प्रक्रिया शुरू हुई और मरीज स्वस्थ होकर घर लौट गई लेकिन भुगतान के समय कंपनी ने सिर्फ आधा पेमेंट किया। बार-बार ई-मेल भेजने पर सात हजार रुपये और भेजे। इसके बाद पैनल से हटने के लिए कह दिया। यह सिर्फ एक उदाहरण है। इसी तरह डॉक्टरों की एसोसिएशन एएचपीआई के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष डॉ. अनुराग मेहरोत्रा बताते हैं कि हम इन कंपनियों के कार्ड स्वीकार नहीं करेंगे। कंपनियां मरीज और अस्पताल दोनों के साथ धोखा कर रही हैं। एसोसिएशन ऑफ हेल्थ प्रोवाइडर्स इंडिया (एएचपीआई) ने दो हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों की कैशलेस सुविधा को सितंबर से खत्म करने का नोटिस दिया है। एक ओर स्वास्थ्य बीमा पर जीएसटी कम करने के बाद लोगों को राहत मिली है। दूसरी ओर इन तीन कंपनियों के 32 हजार बीमा धारकों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
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इन इंश्योरेंस कंपनियों की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक हेल्थ इंश्योरेंस का क्लेम लगातार बढ़ रहा है जिससे उन पर काफी वित्तीय दबाव है। निजी अस्पताल इलाज का खर्च भी बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते हैं। हालांकि इस वित्तीय दबाव को कम करने के लिए हर साल हेल्थ इंश्योरेंस का प्रीमियम 10 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।
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अस्पताल कभी भी कैशलेस इलाज के लिए कर सकते हैं मना
एएचपीआई निजी अस्पतालों का एसोसिएशन है और अस्पताल संचालक इन कंपनियों की हेल्थ पॉलिसी स्वीकार न करने का मन बना चुके हैं। हालांकि अब इंश्योरेंस कंपनियों की तरफ से कहा जा रहा है कि एएचपीआई से बातचीत हो गई है और ग्राहकों को सूचीबद्ध या पैनल में शामिल अस्पतालों में कैशलेस इलाज की सुविधा जारी रहेगी लेकिन जानकारों का कहना है कि पिछले कई दिनों से अस्पताल और इंश्योरेंस कंपनियों के बीच जो झगड़ा चल रहा है उसे देखते हुए साफ है कि अस्पताल कभी भी कैशलेस इलाज के लिए मना कर सकते हैं।
डॉक्टरों के वर्जन (फोटो)
गुजरात और अन्य प्रदेशों में डॉक्टर इन कंपनियों को सही-गलत का अंतर बता चुके हैं। मुरादाबाद में भी इसकी तैयारी है। मैं खुद भी अपना बीमा स्टार हेल्थ से हटाकर न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी की पॉलिसी के तहत करा रहा हूं।
- डॉ. रवि गंगल, पूर्व अध्यक्ष, आईएमए
कंपनियों के प्रतिनिधियों से लगातार बातचीत चल रही है लेकिन नतीजा सिफर है। अगला कदम यही होगा कि सभी अस्पताल मिलकर इन कंपनियों का बायकॉट करेंगे। मरीजों के हितों को कंपनियों को समझना ही होगा।
- डॉ. सीपी सिंह, अध्यक्ष आईएमए
जब मरीज को महंगे इलाज की जरूरत पड़ती है को यह कंपनियां हाथ खड़े कर देती हैं। एएचपीआई ने इन कंपनियों को नोटिस दिया है। यदि कंपनियों ने अपना रवैया नहीं सुधरा तो इनकी कैशलेस सुविधा स्वीकार करने से अस्पताल इनकार कर सकते हैं।
- डॉ. अनुराग मेहरोत्रा, प्रभारी, एएचपीआई (वेस्ट यूपी)