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Moradabad News: मंडल में सालभर में 790 बच्चों की मौत, अस्पतालों के रिकार्ड में सिर्फ 150
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मुरादाबाद। मुरादाबाद मंडल में बच्चों की मौत के आंकड़ों ने स्वास्थ्य विभाग के दावों की चमक उतार दी है। एक अप्रैल 2025 से 31 मार्च 2026 तक के एमपीसीडीएसआर पोर्टल के आंकड़े बताते हैं कि मंडल के पांच जिलों में 790 बच्चों की मौत दर्ज हुईं, लेकिन इन मौतों की सबसे बड़ी गवाही अस्पतालों ने नहीं, समुदाय ने दी। चौंकाने वाली बात यह है कि 790 में से सिर्फ 150 मौतें स्वास्थ्य संस्थानों से दर्ज हुईं, जबकि 640 मौतों की सूचना समुदाय से आई।
यानी जिस तंत्र पर बच्चों की जिंदगी बचाने और मौतों की निगरानी की जिम्मेदारी है, वही सबसे ज्यादा लापरवाह दिख रहा है। सबसे खराब तस्वीर बिजनौर से सामने आई है। यहां 315 बच्चों की मौत दर्ज हुईं। लेकिन इनमें से 39 मौतें ही स्वास्थ्य संस्थानों ने रिपोर्ट कीं, जबकि 276 मौतें समुदाय के जरिये सामने आईं। यह अंतर सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि सरकारी रिपोर्टिंग सिस्टम की नाकामी का खुला दस्तावेज है। सवाल यह है कि जब इतनी संख्या में बच्चों की मौतें हुईं तो अस्पताल, सीएचसी, पीएचसी और स्वास्थ्य इकाइयां आखिर कर क्या रही थीं। अस्पतालों से रिपोर्टिंग न होने के कारण विभाग को मौत का कारण पता लगाने में भी मुश्किल होती है।
मुरादाबाद जिले में 203 बच्चों की मौत दर्ज हुईं। इनमें 35 मौतें स्वास्थ्य संस्थानों से और 168 समुदाय से रिपोर्ट हुईं। अमरोहा में 141 बच्चों की मौत दर्ज की गईं। इनमें 42 मौतें संस्थानों से और 99 समुदाय से रिपोर्ट हुईं। रामपुर में 87 बच्चों की मौत हुईं, जिनमें 34 संस्थानों और 53 समुदाय से रिपोर्ट सामने आई। दोनों जिलों में भी हालात यही रहे कि स्वास्थ्य संस्थान पीछे रहे और समुदाय आगे। वहीं संभल में 44 बच्चों की मौत दर्ज हुईं, लेकिन एक भी मौत स्वास्थ्य संस्थानों से रिपोर्ट नहीं हुई। सभी 44 मामले समुदाय से सामने आए।
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सही रिपोर्टिंग न होने से कारण भी रहे अस्पष्ट
कुल मिलाकर पांच जिलों में दर्ज 790 बाल मौतों में 81 फीसदी मामले समुदाय से रिपोर्ट हुए, जबकि संस्थानों की हिस्सेदारी सिर्फ 19 फीसदी रही। यानी मौतें अस्पतालों की चौखट पर भी पहुंचीं, लेकिन उनका रिकॉर्ड सरकारी फाइलों तक नहीं पहुंच सका। यह स्थिति इसलिए और गंभीर है, क्योंकि बाल मृत्यु समीक्षा का मकसद सिर्फ संख्या गिनना नहीं, बल्कि हर मौत के पीछे की वजह तलाशना होता है। क्या इलाज में देरी हुई, क्या नवजात को समय पर रेफर नहीं किया गया, क्या कुपोषण, संक्रमण या देखभाल की कमी जिम्मेदार रही। सही रिपोर्टिंग न होने से कारण भी सामने नहीं आ पा रहे हैं। यह आंकड़े बता रहे हैं कि बच्चों की मौत रोकना तो दूर, विभाग मौतों की समय पर रिपोर्टिंग तक नहीं कर पा रहा।
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कुल बाल मृत्यु की जिलेवार सूची
बिजनौर - 315
मुरादाबाद - 203
अमरोहा - 141
रामपुर - 87
संभल - 44
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मंडल की तस्वीर
कुल बाल मृत्यु : 790
स्वास्थ्य संस्थानों से रिपोर्ट : 150
समुदाय से रिपोर्ट : 640
वर्जन
कई मौतों की रिपोर्टिंग ही नहीं हो पाती। बच्चों की मौतों की रिपोर्टिंग बढ़ाने के लिए विभाग लगातार प्रयास कर रहा है। समुदाय से मिलने वाली सूचनाओं पर प्रोत्साहन राशि भी दी जाती है। हमारा प्रयास है कि सभी मामले रिपोर्ट हों और उनका कारण पता चल सके।
- डॉ. आशु अग्रवाल, एडी हेल्थ
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यानी जिस तंत्र पर बच्चों की जिंदगी बचाने और मौतों की निगरानी की जिम्मेदारी है, वही सबसे ज्यादा लापरवाह दिख रहा है। सबसे खराब तस्वीर बिजनौर से सामने आई है। यहां 315 बच्चों की मौत दर्ज हुईं। लेकिन इनमें से 39 मौतें ही स्वास्थ्य संस्थानों ने रिपोर्ट कीं, जबकि 276 मौतें समुदाय के जरिये सामने आईं। यह अंतर सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि सरकारी रिपोर्टिंग सिस्टम की नाकामी का खुला दस्तावेज है। सवाल यह है कि जब इतनी संख्या में बच्चों की मौतें हुईं तो अस्पताल, सीएचसी, पीएचसी और स्वास्थ्य इकाइयां आखिर कर क्या रही थीं। अस्पतालों से रिपोर्टिंग न होने के कारण विभाग को मौत का कारण पता लगाने में भी मुश्किल होती है।
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मुरादाबाद जिले में 203 बच्चों की मौत दर्ज हुईं। इनमें 35 मौतें स्वास्थ्य संस्थानों से और 168 समुदाय से रिपोर्ट हुईं। अमरोहा में 141 बच्चों की मौत दर्ज की गईं। इनमें 42 मौतें संस्थानों से और 99 समुदाय से रिपोर्ट हुईं। रामपुर में 87 बच्चों की मौत हुईं, जिनमें 34 संस्थानों और 53 समुदाय से रिपोर्ट सामने आई। दोनों जिलों में भी हालात यही रहे कि स्वास्थ्य संस्थान पीछे रहे और समुदाय आगे। वहीं संभल में 44 बच्चों की मौत दर्ज हुईं, लेकिन एक भी मौत स्वास्थ्य संस्थानों से रिपोर्ट नहीं हुई। सभी 44 मामले समुदाय से सामने आए।
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सही रिपोर्टिंग न होने से कारण भी रहे अस्पष्ट
कुल मिलाकर पांच जिलों में दर्ज 790 बाल मौतों में 81 फीसदी मामले समुदाय से रिपोर्ट हुए, जबकि संस्थानों की हिस्सेदारी सिर्फ 19 फीसदी रही। यानी मौतें अस्पतालों की चौखट पर भी पहुंचीं, लेकिन उनका रिकॉर्ड सरकारी फाइलों तक नहीं पहुंच सका। यह स्थिति इसलिए और गंभीर है, क्योंकि बाल मृत्यु समीक्षा का मकसद सिर्फ संख्या गिनना नहीं, बल्कि हर मौत के पीछे की वजह तलाशना होता है। क्या इलाज में देरी हुई, क्या नवजात को समय पर रेफर नहीं किया गया, क्या कुपोषण, संक्रमण या देखभाल की कमी जिम्मेदार रही। सही रिपोर्टिंग न होने से कारण भी सामने नहीं आ पा रहे हैं। यह आंकड़े बता रहे हैं कि बच्चों की मौत रोकना तो दूर, विभाग मौतों की समय पर रिपोर्टिंग तक नहीं कर पा रहा।
कुल बाल मृत्यु की जिलेवार सूची
बिजनौर - 315
मुरादाबाद - 203
अमरोहा - 141
रामपुर - 87
संभल - 44
मंडल की तस्वीर
कुल बाल मृत्यु : 790
स्वास्थ्य संस्थानों से रिपोर्ट : 150
समुदाय से रिपोर्ट : 640
वर्जन
कई मौतों की रिपोर्टिंग ही नहीं हो पाती। बच्चों की मौतों की रिपोर्टिंग बढ़ाने के लिए विभाग लगातार प्रयास कर रहा है। समुदाय से मिलने वाली सूचनाओं पर प्रोत्साहन राशि भी दी जाती है। हमारा प्रयास है कि सभी मामले रिपोर्ट हों और उनका कारण पता चल सके।
- डॉ. आशु अग्रवाल, एडी हेल्थ