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सरकारी से सियासी तक दस आने रह गया खर्च
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मुरादाबाद। जितने बड़े पंडाल और आयोजनों पर सरकारी महकमों ने एक से डेढ़ करोड़ रुपये तक खर्च दिखाया वैसे ही आयोजनों के इंतजामों का खर्च सियासी पार्टियां 10 से 15 लाख रुपये बता रही हैं। सच्चा कौन है यह तो सरकारी हाकिम या सियास्तदां ही बता सकते हैं लेकिन बड़े आयोजनों के कम खर्च पर सवाल उठना लाजिमी है। चुनाव आयोग ने एक प्रत्याशी के चुनाव लड़ने पर अधिकतम खर्च की सीमा 70 लाख रुपये निर्धारित कर रखी है। प्रत्याशी के समर्थन में किसी बड़े नेता की रैली या जनसभा होने पर बड़े स्तर पर इंतजाम होते हैं। ऐसे में प्रत्याशियों की कोशिश होती है कि कागजों मं खर्चे तय सीमा के भीतर ही रहें।
मंडल में कभी ओडीओपी तो कभी दूसरे बड़े सरकारी कार्र्यक्रमों में भी केंद्रीय मंत्रियों और बड़े नेताओं के आने - जाने का सिलसिला अक्सर चलता रहता है। ये आयोजन संबंधित विभागों द्वारा कराए गए। आयोजन में मंत्रियों और नेताओं के लिए वैसे ही भव्य मंच बनते रहे हैं जैसे कि रैलियों में बनते हैं। फर्क इतना है कि रैली में जनता भाषण सुनने आती है और पूर्व में हुए सरकारी आयोजनों में योजनाओं के लाभार्थी आते हैं। लेकिन जैसे रैलियों में जनता के लिए कुर्सियां होती हैं वैसे ही सरकारी आयोजनों में लाभार्थियों के लिए इंतजाम होते रहे हैं। आयोजन के स्वरूप की बात करें तो रैलियों का स्वरूप उन सरकारी आयोजनों से कहीं अधिक बड़ा है। बावजूद इसके रैलियों का खर्च सरकारी आयोजना के दसवें हिस्से जितना है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि या तो रैलियों का खर्च कम करके बताया जा रहा है या फिर सरकारी आयोजनों का खर्च बढ़ा चढ़ाकर दर्शाया गया।
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मंडल में कभी ओडीओपी तो कभी दूसरे बड़े सरकारी कार्र्यक्रमों में भी केंद्रीय मंत्रियों और बड़े नेताओं के आने - जाने का सिलसिला अक्सर चलता रहता है। ये आयोजन संबंधित विभागों द्वारा कराए गए। आयोजन में मंत्रियों और नेताओं के लिए वैसे ही भव्य मंच बनते रहे हैं जैसे कि रैलियों में बनते हैं। फर्क इतना है कि रैली में जनता भाषण सुनने आती है और पूर्व में हुए सरकारी आयोजनों में योजनाओं के लाभार्थी आते हैं। लेकिन जैसे रैलियों में जनता के लिए कुर्सियां होती हैं वैसे ही सरकारी आयोजनों में लाभार्थियों के लिए इंतजाम होते रहे हैं। आयोजन के स्वरूप की बात करें तो रैलियों का स्वरूप उन सरकारी आयोजनों से कहीं अधिक बड़ा है। बावजूद इसके रैलियों का खर्च सरकारी आयोजना के दसवें हिस्से जितना है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि या तो रैलियों का खर्च कम करके बताया जा रहा है या फिर सरकारी आयोजनों का खर्च बढ़ा चढ़ाकर दर्शाया गया।
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