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बकाया भुगतान दिए बिना गन्ना खरीद रहीं चीनी मिलें
Updated Sun, 25 Nov 2018 01:28 AM IST
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चंदौसी। चीनी मिलों ने पेराई सत्र-2018-19 शुरू कर दिया है। गन्ना खरीदा जाने लगा है, लेकिन किसान अभी तक पिछले साल की पर्चियां लेकर घूम रहे हैं, जिन्हें अभी तक भी बकाया गन्ना भुगतान नहीं मिल पा रहा है।
ऐसे में किसानों के मन में यह संशय पैदा हो गया है कि पता नहीं इस बार गन्ने का भुगतान मिल पाएगा या नहीं ? हालांकि चीनी मिल दावा कर रही हैं कि सप्ताहभर के अंदर पिछला भुगतान कर दिया जाएगा।
गन्ने की फसल को नकदी फसल कहा जाता है। क्योंकि तात्कालिक जरूरतों के लिए किसान खेत में खड़ा गन्ना चीनी मिलों को बेचते हैं, ताकि मिलों से मिले भुगतान से उनकी आर्थिक आवश्यकताएं पूरी हो सकें लेकिन पिछले साल चीनी के भावों में उतार चढ़ाव के कारण चीनी मिलें पिछले साल का भी बकाया भुगतान नहीं कर सकी हैं, अब एक बार मिलों ने गन्ना खरीदना शुरू कर दिया है।
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ऐसे में किसानों के मन में भुगतान को लेकर आशंका पैदा होना स्वाभाविक ही है लेकिन इसके बावजूद किसानों के पास और कोई रास्ता भी नहीं है, चीनी मिलें विलंब से चली तो काफी किसानों ने कोल्हू पर गन्ना बेचकर अपनी आर्थिक जरूरतों को किसी तरह पूरा किया।
जिला प्रशासन ने बैठके तो लगातार की लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया। चीनी मिल वाले अपनी मजबूरियां गिनाते रहे हैं, किसान सिर्फ पर्ची लेकर इंतजार करते रहे।
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ऐसे में किसानों के मन में यह संशय पैदा हो गया है कि पता नहीं इस बार गन्ने का भुगतान मिल पाएगा या नहीं ? हालांकि चीनी मिल दावा कर रही हैं कि सप्ताहभर के अंदर पिछला भुगतान कर दिया जाएगा।
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गन्ने की फसल को नकदी फसल कहा जाता है। क्योंकि तात्कालिक जरूरतों के लिए किसान खेत में खड़ा गन्ना चीनी मिलों को बेचते हैं, ताकि मिलों से मिले भुगतान से उनकी आर्थिक आवश्यकताएं पूरी हो सकें लेकिन पिछले साल चीनी के भावों में उतार चढ़ाव के कारण चीनी मिलें पिछले साल का भी बकाया भुगतान नहीं कर सकी हैं, अब एक बार मिलों ने गन्ना खरीदना शुरू कर दिया है।
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ऐसे में किसानों के मन में भुगतान को लेकर आशंका पैदा होना स्वाभाविक ही है लेकिन इसके बावजूद किसानों के पास और कोई रास्ता भी नहीं है, चीनी मिलें विलंब से चली तो काफी किसानों ने कोल्हू पर गन्ना बेचकर अपनी आर्थिक जरूरतों को किसी तरह पूरा किया।
जिला प्रशासन ने बैठके तो लगातार की लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया। चीनी मिल वाले अपनी मजबूरियां गिनाते रहे हैं, किसान सिर्फ पर्ची लेकर इंतजार करते रहे।