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विंध्याचल मार्ग पर दरक रही ओझला पुल की दीवारें

Wed, 09 Mar 2022 12:07 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Wed, 09 Mar 2022 12:07 AM IST
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The walls of the Ojla bridge cracking on the Vindhyachal road
विंध्याचल मार्ग के ओझला नदी पर नक्काशीदार पत्थरों से बना पुल रख-रखाव के अभाव में बदहाल है। कभी एक दिन की रूई की कमाई से बने पुल की तरफ आज कोई झांकने वाला तक नहीं। पुल सहित भवनों में जगह-जगह बड़ी-बड़ी दरार पड़ गई है, जो भविष्य में किसी बड़े खतरे की ओर संकेत कर रहा है।
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लोगों के मुताबिक पुल के नीचे पूर्वी और पश्चिमी किनारे पर बने अधिकांश भवनों की दिवारें फटकर आर-पार दिखाई दे रही हैं। दोनों किनारों पर बने गुंबद के पत्थर कई स्थानों पर टूटकर बिखर गए हैं। एक समय था कि यही पुल जहां मां विंध्यवासिनी धाम तक पहुंचने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था। वहीं मिर्जापुर व प्रयागराज को आपस में जोड़ने में सहायक रहा। आजादी के बाद से लेकर अब तक कितनी सरकारें आईं और गईं लेकिन किसी का भी ध्यान पुल की तरफ नहीं गया और न ही जनप्रतिनिधियों ने इस तरफ देखना मुनासिब समझा। रख-रखाव व मरम्मत के नाम पर यहां एक भी ईंट नहीं जोड़ा गया। जबकि पुल के नीचे कई बड़े तहखाने व एक दर्जन से ज्यादा बरामदे के साथ कमरे तक बने हुए हैं। काफी समय पहले यह दर्शनार्थियों, यात्रियों के लिए बनाए गए होंगे जो आज निष्प्रयोज्य साबित हो रहे हैं।
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डेढ़ सौ साल पुराना है पुल
मिर्जापुर। ओझला पुल का निर्माण आज से लगभग डेढ़ सौ वर्ष पहले जूना अखाड़ा के महंत नरेंद्रनाथ गिरी की ओर से एक दिन की रुई की कमाई से हुआ था। जनश्रुति के अनुसार महंत शिवाला स्थित गद्दी के सामने महंत सुबह दातून कर रहे थे कि उन्हें सड़क पर गिरी एक पर्ची मिली। पर्ची संभवत: किसी रुई व्यापारी की थी। जो रुई के व्यापार के लिए आने वाला था। महंत उस पर्ची के आधार पर आसपास के सभी जिले से रुई खरीदकर खुद स्टोर कर लिए और बाद में उस रुई को बेचकर जो मुुनाफा हुआ उसी पैसे से श्रद्धालुओं की सुविधाओं के लिए पुल का निर्माण कराया गया।
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करोड़ों रुपये खर्च के बावजूद नहीं बन सकता ऐसा पुल
मिर्जापुर। मामूली पुल और पुलियों के निर्माण में सरकार का लाखों रुपये बर्बाद हो जाता है। लेकिन आज के इस दौर में करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद ओझला पुल जैसा कोई दूसरा पुल बनवाना संभव नहीं। जबकि इस पुल के पास दो बड़े मेले में कजली निषाद मेला व बावन द्वादशी महापर्व पर मेले का आयोजन किया जाता है। ओझला नदी के संगम तट पर डुबकी लगाकर श्रद्धालु स्वर्ग प्राप्ति का अनुभव करते हैं। सबसे अहम यह कि इसी पुल के रास्ते विंध्याचल में दो नवरात्र व कंतित मेले का आयोजन किया जाता है। मेले में प्रति वर्ष लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं व जायरीनों का आना व जाना बना रहता है।
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