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रहस्यों को समेटे है मार्क जुकरबर्ग के गुरु का आश्रम
ब्यूरो / अमर उजाला, मिर्जापुर
Updated Sat, 03 Oct 2015 12:12 AM IST
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फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नीम करौली बाबा का जिक्र करते ही जगह-जगह स्थित उनके आश्रम सुर्खियों में आ गए हैं। नैनीताल के कैंची धाम मंदिर के अलावा विन्ध्याचल में अष्टभुजा पहाड़ी पर भी मार्क जुकरबर्ग के आध्यात्मिक गुरु का आश्रम है। यह अपने आप में रहस्यों को समेटे हुए है। इस भवन की वर्ष 1924 में स्थापना हुई थी। इसके मालिक भवन को किसी संस्था को देेेने के लिए प्रयासरत रहे, लेकिन कोई लेने को तैयार नहीं हो रहा था।
मिर्जापुर के प्रमुख व्यवसायी बसंत लाल अग्रहरि ने वर्ष 1924 में लाखों रुपये खर्च कर सिद्ध क्षेत्र अष्टभुजा पहाड़ी पर भवन का निर्माण कराया था। किवदंती है कि उनके भाई हीरालाल अग्रवाल ने वहां वैभव का प्रदर्शन शुरू कर दिया। इसके चलते यहां एक यज्ञ के दौरान अंतिम आहुति डालते ही उनके भाई कन्हैया लाल को लकवा मार गया और उनका निधन हो गया। उसके बाद से इस भवन की व्यवस्था परिवार के जिस व्यक्ति ने देखी, उसका व्यक्तिगत नुकसान ही हुआ। इससे परिवार के लोगों में दहशत फैल गई और भवन को किसी धार्मिक संस्था को देने पर विचार किया गया। इसके लिए पारिवारिक मित्र मिर्जापुर निवासी अरुण कुमार मिश्र की सहायता ली गई। उन्होंने इस्कान से बात की तो उसके सदस्यों ने लेने से इसलिए मना कर दिया कि यह शहर से दूर है।
अवधूत भगवान राम से भवन लेने का आग्रह किया गया तो वे तैयार हो गए, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद भवन का हस्तांतरण नहीं हो सका। वर्ष 1990 के दशक में सोवियत गणराज्य के विघटन के बाद विश्व की राजनीति में आए बदलाव को देखते हुए भवन को समाजवादी विचारधारा का केंद्र बनाने के लिए प्रमुख पत्रकार कुलदीप नैयर से बात की गई।
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वे अपने राज्यसभा सांसद कोष से भवन के जीर्णोद्धार के लिए राजी हो गए, लेकिन सरकारी नियम-कानून आड़े आ गए। वर्ष 2004 में मिर्जापुर के व्यापारी श्यामा प्रसाद ने नीम करौली बाबा का जिक्र किया और उनके बेटे माने जाने वाले रिटायर्ड डीएफओ बेटे जी महाराज से बातचीत कर एक ट्रस्ट बना कर भवन उसे सौंप दिया गया। इसके बाद यहां हनुमान जी की मूर्ति स्थापित करा कर यज्ञ और अखंड रामायण का आयोजन किया गया।
तब यहां पानी का अभाव था। बताया जाता है कि बेटे जी महाराज ने हनुमान जी का नाम लेकर एक पत्थर फेंका। पत्थर जहां गिरा वहां खुदाई की गई तो ऊंची पहाड़ी पर मात्र 230 फीट पर पानी निकल आया। यह भी माना जाता है कि नीम करौली बाबा पहले यहां आते रहे हैं।
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मिर्जापुर के प्रमुख व्यवसायी बसंत लाल अग्रहरि ने वर्ष 1924 में लाखों रुपये खर्च कर सिद्ध क्षेत्र अष्टभुजा पहाड़ी पर भवन का निर्माण कराया था। किवदंती है कि उनके भाई हीरालाल अग्रवाल ने वहां वैभव का प्रदर्शन शुरू कर दिया। इसके चलते यहां एक यज्ञ के दौरान अंतिम आहुति डालते ही उनके भाई कन्हैया लाल को लकवा मार गया और उनका निधन हो गया। उसके बाद से इस भवन की व्यवस्था परिवार के जिस व्यक्ति ने देखी, उसका व्यक्तिगत नुकसान ही हुआ। इससे परिवार के लोगों में दहशत फैल गई और भवन को किसी धार्मिक संस्था को देने पर विचार किया गया। इसके लिए पारिवारिक मित्र मिर्जापुर निवासी अरुण कुमार मिश्र की सहायता ली गई। उन्होंने इस्कान से बात की तो उसके सदस्यों ने लेने से इसलिए मना कर दिया कि यह शहर से दूर है।
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अवधूत भगवान राम से भवन लेने का आग्रह किया गया तो वे तैयार हो गए, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद भवन का हस्तांतरण नहीं हो सका। वर्ष 1990 के दशक में सोवियत गणराज्य के विघटन के बाद विश्व की राजनीति में आए बदलाव को देखते हुए भवन को समाजवादी विचारधारा का केंद्र बनाने के लिए प्रमुख पत्रकार कुलदीप नैयर से बात की गई।
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वे अपने राज्यसभा सांसद कोष से भवन के जीर्णोद्धार के लिए राजी हो गए, लेकिन सरकारी नियम-कानून आड़े आ गए। वर्ष 2004 में मिर्जापुर के व्यापारी श्यामा प्रसाद ने नीम करौली बाबा का जिक्र किया और उनके बेटे माने जाने वाले रिटायर्ड डीएफओ बेटे जी महाराज से बातचीत कर एक ट्रस्ट बना कर भवन उसे सौंप दिया गया। इसके बाद यहां हनुमान जी की मूर्ति स्थापित करा कर यज्ञ और अखंड रामायण का आयोजन किया गया।
तब यहां पानी का अभाव था। बताया जाता है कि बेटे जी महाराज ने हनुमान जी का नाम लेकर एक पत्थर फेंका। पत्थर जहां गिरा वहां खुदाई की गई तो ऊंची पहाड़ी पर मात्र 230 फीट पर पानी निकल आया। यह भी माना जाता है कि नीम करौली बाबा पहले यहां आते रहे हैं।