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खरना के बाद महिलाओं ने शुरू किया निर्जला व्रत
ब्यूरो/ अमर उजाला/ मिर्जापुर
Updated Sat, 05 Nov 2016 11:23 PM IST
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डाला छठ महापर्व के दूसरे दिन शनिवार की शाम को महिलाओं ने सूर्य पूजन के बाद रोटी-बखीर खाकर खरना किया। महिलाओं ने पुन: निर्जला व्रत को शुरू कर दिया। संतान प्राप्ति, उनकी दीर्घायु एवं सुख-समृद्धि की कामना के साथ व्रत रखने वाली महिलाओं में पर्व को लेकर काफी उत्साह दिखा। इसके पूर्व नगर के बाजारों में पहुंचकर महिलाओं ने पूजन से संबंधित सामानों की खरीदारी भी पूरी कर ली।
शुक्रवार को नहाय खाय के साथ व्रत रखते हुए शनिवार की शाम को महिलाएं सूर्य पूजन के बाद रोटी-बखीर ग्रहण करने के बाद फिर से निर्जला व्रत धारण कर लिया। सूर्योपासना के महापर्व डाला छठ के मद्देनजर शनिवार को घरों में साफ-सफाई सहित पकवान बनाने का कार्य किया गया। कार्तिक मास में होने वाले सूर्य की उपासना का प्रमुख पर्व डाला छठ का सर्वाधिक महत्व पुराणों में वर्णित है। चार दिनों तक मनाए जाने वाले इस महापर्व के चौथे दिन प्रात:काल उदयाचल सूर्य को अर्घ्य देने के बाद पारण किया जाएगा।
विंध्याचल के धर्मगुरु त्रियोगी नारायण मिश्र ने बताया कि यह संसार का पहला ऐसा पर्व है, जहां उगने सूर्य की बजाय डूबते सूर्य की पूजा अर्घ्य के साथ होती है। यह व्रत चतुर्थ तिथि को सांयकाल नहाकर चने की दाल व लौकी की सब्जी-चावल खाकर प्रारंभ किया जाता है और पुन: पंचमी तिथि को दिन भर उपवास रहकर सांयकाल भगवान को भोग लगाकर गुड़ की बखीर व रोटी ग्रहण किया जाता है।
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षष्ठी तिथि को निर्जला व्रत रहते हुए सांय अस्ताचल सूर्य को अर्घ्य देने के बाद सप्तमी को उगते सूर्य को अर्घ्य देकर हवन-पूजन के पश्चात् व्रती महिलाएं अपना व्रत तोड़ती हैं। बताया कि महापर्व का प्रभाव था द्रौपदी ने द्वापर युग में छठ व्रत को किया था, जिससे पांडवों को उनका खोया राजपाट पुन: मिल गया था उधर त्रेता युग में प्रभु श्रीराम व मां सतीा ने भी छठ व्रत रखा था।
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शुक्रवार को नहाय खाय के साथ व्रत रखते हुए शनिवार की शाम को महिलाएं सूर्य पूजन के बाद रोटी-बखीर ग्रहण करने के बाद फिर से निर्जला व्रत धारण कर लिया। सूर्योपासना के महापर्व डाला छठ के मद्देनजर शनिवार को घरों में साफ-सफाई सहित पकवान बनाने का कार्य किया गया। कार्तिक मास में होने वाले सूर्य की उपासना का प्रमुख पर्व डाला छठ का सर्वाधिक महत्व पुराणों में वर्णित है। चार दिनों तक मनाए जाने वाले इस महापर्व के चौथे दिन प्रात:काल उदयाचल सूर्य को अर्घ्य देने के बाद पारण किया जाएगा।
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विंध्याचल के धर्मगुरु त्रियोगी नारायण मिश्र ने बताया कि यह संसार का पहला ऐसा पर्व है, जहां उगने सूर्य की बजाय डूबते सूर्य की पूजा अर्घ्य के साथ होती है। यह व्रत चतुर्थ तिथि को सांयकाल नहाकर चने की दाल व लौकी की सब्जी-चावल खाकर प्रारंभ किया जाता है और पुन: पंचमी तिथि को दिन भर उपवास रहकर सांयकाल भगवान को भोग लगाकर गुड़ की बखीर व रोटी ग्रहण किया जाता है।
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षष्ठी तिथि को निर्जला व्रत रहते हुए सांय अस्ताचल सूर्य को अर्घ्य देने के बाद सप्तमी को उगते सूर्य को अर्घ्य देकर हवन-पूजन के पश्चात् व्रती महिलाएं अपना व्रत तोड़ती हैं। बताया कि महापर्व का प्रभाव था द्रौपदी ने द्वापर युग में छठ व्रत को किया था, जिससे पांडवों को उनका खोया राजपाट पुन: मिल गया था उधर त्रेता युग में प्रभु श्रीराम व मां सतीा ने भी छठ व्रत रखा था।