सजल आंखों से बाबा को किया विदा

Mirzapur Updated Sat, 24 Nov 2012 12:00 PM IST
अहरौरा। मनरी ने थाप लगाई, उसकी गूंज ने जनमानस की तंद्रा भंग की और महिला-पुरुष भक्तों के नयन सजल हो गए। बाबा बेचूबीर की चौरी पर टकटकी लगाए आंखों से अविरल अश्रूधारा बहने लगी। पुजारी की चिंघाड़ से निकल रही एक अजीब सी आवाज ने वातावरण को अपनी आगोश में समेट लिया। यह हाल रहा बेचूबीर बाबा के मेले की महानिशा की, जहां मध्य रात्रि में घड़ी की सूई ने एक दूसरे का छुआ तो तीन किलोमीटर क्षेत्र में फैले मेले का कोलाहल थम सा गया। लोग चौरी की तरफ बढ़ने लगे और हजारों भक्तों की आंखें बाबा की चौरी पर टिक गईं।
अंतरप्रांतीय स्तर पर जंगलों एवं पहाड़ों के गर्भ में बसे बरही नामक ग्राम स्थित बाबा बेचूबीर का तीन दिवसीय मेले का समापन मनरी बजने के साथ ही हो जाता है। बाबा की चौरी पर तीन दिनों तक संतान प्राप्ति, भूत-प्रेत बाधाओं के निवारण तथा असाध्य रोगों से ग्रसित दर्शनार्थियों ने मत्था टेका। मेला क्षेत्र में अंधविश्वास पर विश्वास का प्रकाश पुंज हावी रहा। एकादशी तिथि को मध्य रात्रि के बाद वातावरण में छाई खामोशी को मनरी नामक वाद्य यंत्र ने भंग किया। मनरी की थाप और पुजारी की चिंघाड़ ने बरबस ही हजारों लोगों को चौरी की तरफ आकर्षित कर दिया और कोलाहल का मंजर थम सा गया। जैसे लगा कि इस मेले में आए श्रद्धालुओं को अब कोई पीड़ा ही नहीं है। प्रसाद के रूप में पुजारी द्वारा चावल रूपी अक्षत को हवा में उड़ाते ही श्रद्धालुओं में उसे पा लेने की होड़ सी मच गई। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए भारी पुलिस बल लगाई गई थी, बावजूद इसके अफरातफरी का माहौल कायम रहा। आंखों में अभिलाषा तथा चेहरे पर सुख और पीड़ा भाव को लिए हुए दर्शनार्थी भावविभोर हो गए। इस विशाल मेले का आश्चर्यजनक पहलू यह रहा कि हजारों की संख्या में महिलाएं भूत-प्रेत बाधा से मुक्ति एवं संतान प्राप्ति के लिए बाबा बेचूबीर की चौरी के सामने जमीन पर दो अगरबत्ती जलाकर ध्यान-मग्न होती रहीं। देखते ही देखते उनके शरीर में कंपन होने लगता। खेलने और हबुआने तथा अपने बाल खोलकर लहराने के साथ ही क्रोधित और अनर्गल प्रलाप करना तथा उनके नृत्य से पूरा माहौल अद्भुत सा हो गया, लेकिन भक्तों की नजरें हमेशा बाबा की चौरी पर ही टिकी रहीं। मानों वक्त का यह मंजर ठहर सा गया। कहा जाता है कि जिसे ख्याति मिलनी होती है उसे किसी दायरे में नहीं बांधा जा सकता है। बाबा की चौरी पर पहुंचे हजारों दर्शनार्थियों में कोई भी यह मानने को तैयार नहीं कि इस वैज्ञानिक युग में यह अंधविश्वास है। विश्वास में यहां अपनी गहरी पैठ बना ली है और आस्था पूर्ण रूप से हावी है।

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