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पांच दशक में कितना बदल गया होली के त्योहार
Updated Thu, 01 Mar 2018 12:16 AM IST
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मिर्जापुर। होली का पर्व दिनों दिन बदलाव लेकर आ रहा है। दो दशक पहले की होली और अब की होली में जमीन आसमान का फर्क आ गया है। रंगीनियत का यह पर्व सदा गीतों से जुड़ा रहा है। फाग के राग सुने बिना होली का त्योहार पूरा नहीं होता था लेकिन समय के साथ इन गीतों में बदलाव आ गया है। पारंपरिक फाग गीतों का स्थान अब दोअर्थी गानों ने ले लिया है क्योंकि गांवों में अब फाग गाने वाले ढूंढे नहीं मिलते।
दो दशक पूर्व होली का एक अलग ही उमंग था। वसंत पंचमी के दिन से ही रंगों की फुहारें पड़ने लग जाती थीं। घर से बाहर रह रहे परिवार के सदस्य एक पखवारा पूर्व ही घर पहुंच जाया करते थे। नगर व ग्रामीणांचलों में रंग भरी एकादशी के दिन से ही चट्टी चौराहों पर फाग गीत व मंदिरों में भजन कीर्तन का दौर शुरू हो जाता था। नगर के वासलीगंज निवासी श्याम नारायण कहते हैं कि आज से 30 वर्ष पूर्व होली का उमंग कुछ अलग ही था। युवा व बुजुर्ग अपने अपने तरीके से अदब के साथ त्योहार मनाते थे। कहा कि अब तो छोटे व बड़ो का कोई अदब नहीं रह गया है। छोटी छोटी बात पर लोग झगड़े पर उतारू हो जाते हैं। अहरौरा के पूर्व पालिकाध्यक्ष 80 वर्षीय चंद्रशेखर प्रसाद ने बताया कि उनके जमाने में होली बसंत पंचमी से बुढ़वा मंगल तक मनाई जाती थी। होली फगुआ गीत के साथ एक दूसरे को अबीर लगा कर मनाई जाती थी, लेकिन अब होली के नाम पर फूहड़ता ही दिख रहा है। उस दौर में लोग एक दूसरे का बहुत ही अदब और सम्मान करते थे, जो अब देखने को नहीं मिलती है। अब तो सिर्फ एक ही दिन की होली रह गई है। कहा कि आज की युवा पीढ़ी का अधिकांश समय मोबाइल चलाने में ही निकल जा रहा है, जिस वजह से वह मौसमी त्योहारों का लुत्फ नहीं उठा पा रहे हैं। चुनार नगर के भरपुर निवासी 65 वर्षीय सत्यनारायण पुजारी ने बताया कि हमारे जमाने में होली का हुड़दंग आज के हिसाब से कहीं ज्यादा था लेकिन वह मर्यादा को ध्यान में रखते हुए किया जाता था। फागुन माह शुरू होते ही रंगभरी एकादशी के बाद होली के हिसाब से कपड़े पहन कर बाहर निकलते थे और रंग अबीर डालने पर बुरा नहीं मानते थे। कहा कि आज समय वैसा नही रह गया है, अब नशीले पदार्थों के सेवन के बढ़ते चलन के कारण लोग खुलकर होली खेलने से कतराते हैं। त्योहारों पर नशीला पदार्थ के सेवन क कारण अदब नहीं रह गया है। होली का पर्व अब होली के दिन ही दोपहर तक ही सीमित रह गया है। जिगना विजयपुर निवासी 75 वर्षीय मनमोहन सिंह का कहना है कि अब होली का त्यौहार पहले जैसा नहीं रह गया है। कहा कि पहले होलिका गड़ते ही गांवों मे ढोलक हार्मोनियम के साथ फगुआ चैता गाना शुरू हो जाता था और लोगों मेें एकता अपनत्व दिखाई पड़ता था। कहा कि वहीं अब फूहड़पन के गीत मोबाइल व कैसटों पर लोग सुन रहे हैं। अपने जमाने जैसा हसीं व खुशी का माहौल सपना हो गया है।
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दो दशक पूर्व होली का एक अलग ही उमंग था। वसंत पंचमी के दिन से ही रंगों की फुहारें पड़ने लग जाती थीं। घर से बाहर रह रहे परिवार के सदस्य एक पखवारा पूर्व ही घर पहुंच जाया करते थे। नगर व ग्रामीणांचलों में रंग भरी एकादशी के दिन से ही चट्टी चौराहों पर फाग गीत व मंदिरों में भजन कीर्तन का दौर शुरू हो जाता था। नगर के वासलीगंज निवासी श्याम नारायण कहते हैं कि आज से 30 वर्ष पूर्व होली का उमंग कुछ अलग ही था। युवा व बुजुर्ग अपने अपने तरीके से अदब के साथ त्योहार मनाते थे। कहा कि अब तो छोटे व बड़ो का कोई अदब नहीं रह गया है। छोटी छोटी बात पर लोग झगड़े पर उतारू हो जाते हैं। अहरौरा के पूर्व पालिकाध्यक्ष 80 वर्षीय चंद्रशेखर प्रसाद ने बताया कि उनके जमाने में होली बसंत पंचमी से बुढ़वा मंगल तक मनाई जाती थी। होली फगुआ गीत के साथ एक दूसरे को अबीर लगा कर मनाई जाती थी, लेकिन अब होली के नाम पर फूहड़ता ही दिख रहा है। उस दौर में लोग एक दूसरे का बहुत ही अदब और सम्मान करते थे, जो अब देखने को नहीं मिलती है। अब तो सिर्फ एक ही दिन की होली रह गई है। कहा कि आज की युवा पीढ़ी का अधिकांश समय मोबाइल चलाने में ही निकल जा रहा है, जिस वजह से वह मौसमी त्योहारों का लुत्फ नहीं उठा पा रहे हैं। चुनार नगर के भरपुर निवासी 65 वर्षीय सत्यनारायण पुजारी ने बताया कि हमारे जमाने में होली का हुड़दंग आज के हिसाब से कहीं ज्यादा था लेकिन वह मर्यादा को ध्यान में रखते हुए किया जाता था। फागुन माह शुरू होते ही रंगभरी एकादशी के बाद होली के हिसाब से कपड़े पहन कर बाहर निकलते थे और रंग अबीर डालने पर बुरा नहीं मानते थे। कहा कि आज समय वैसा नही रह गया है, अब नशीले पदार्थों के सेवन के बढ़ते चलन के कारण लोग खुलकर होली खेलने से कतराते हैं। त्योहारों पर नशीला पदार्थ के सेवन क कारण अदब नहीं रह गया है। होली का पर्व अब होली के दिन ही दोपहर तक ही सीमित रह गया है। जिगना विजयपुर निवासी 75 वर्षीय मनमोहन सिंह का कहना है कि अब होली का त्यौहार पहले जैसा नहीं रह गया है। कहा कि पहले होलिका गड़ते ही गांवों मे ढोलक हार्मोनियम के साथ फगुआ चैता गाना शुरू हो जाता था और लोगों मेें एकता अपनत्व दिखाई पड़ता था। कहा कि वहीं अब फूहड़पन के गीत मोबाइल व कैसटों पर लोग सुन रहे हैं। अपने जमाने जैसा हसीं व खुशी का माहौल सपना हो गया है।
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