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शास्त्रीय-विधान से ही करें होलिका दहन
Updated Thu, 01 Mar 2018 12:08 AM IST
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मिर्जापुर। होलिका जलाने के समय एवं विधि-विधान का शास्त्रों में उल्लेख किया गया है। इस वर्ष गुरूवार एक मार्च को सायं छह बजकर 45 मिनट से रात्रि के आठ बजकर 55 मिनट तक होलिका दहन का शुभ मुहूर्त है, क्योंकि अपराह्न तीन बज कर 54 मिनट से सायं छह बजकर 45 मिनट तक भद्रा है। जिसमें सायं चार बजकर 58 मिनट से छह बज कर 45 मिनट तक भद्रा का मुख है।
शास्त्रों में प्रदोषव्यापिनी ग्राह्या पौर्णिमा फाल्गुनी सदा, तस्यां भद्रामुखं त्यक्त्वा पूज्या होला निशामुखे% का उल्लेख किया गया है। जिसके अनुसार सदा फाल्गुन मास की पूर्णिमा को प्रदोषव्यापिनी ही लेना चाहिए। उसमें भद्रा के मुख को त्याग कर निशामुख में होलिका पूजन के पश्चात दहन करना चाहिए। शास्त्रों में कहा गया है कि भद्रा में होलिका जलाने पर संबंधित क्षेत्र पर संकट आते हैं। पं. रामलाल त्रिपाठी, नितिन अवस्थी व साहित्यकार सलिल पांडेय के अनुसार भद्रा के समाप्त होने के बाद से ही होलिका दहन करें। इसके अलावा होलिका पूजन पूर्वाभिमुख होकर करना चाहिए। होलिका में कूड़ा करकट नहीं डालना चाहिए। बल्कि गोबर की उपली ही डालें। इसके अलावा सरसों के उबटन का प्रयोग कर उसका अवशेष होलिका में डालना चाहिए। प्लास्टिक, पालीथिन, टायर-ट्यूब डालने से पर्यावरण प्रदूषित होता है। सरसों के उबटन के जलने से पर्यावरण शुद्ध होगा।
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शास्त्रों में प्रदोषव्यापिनी ग्राह्या पौर्णिमा फाल्गुनी सदा, तस्यां भद्रामुखं त्यक्त्वा पूज्या होला निशामुखे% का उल्लेख किया गया है। जिसके अनुसार सदा फाल्गुन मास की पूर्णिमा को प्रदोषव्यापिनी ही लेना चाहिए। उसमें भद्रा के मुख को त्याग कर निशामुख में होलिका पूजन के पश्चात दहन करना चाहिए। शास्त्रों में कहा गया है कि भद्रा में होलिका जलाने पर संबंधित क्षेत्र पर संकट आते हैं। पं. रामलाल त्रिपाठी, नितिन अवस्थी व साहित्यकार सलिल पांडेय के अनुसार भद्रा के समाप्त होने के बाद से ही होलिका दहन करें। इसके अलावा होलिका पूजन पूर्वाभिमुख होकर करना चाहिए। होलिका में कूड़ा करकट नहीं डालना चाहिए। बल्कि गोबर की उपली ही डालें। इसके अलावा सरसों के उबटन का प्रयोग कर उसका अवशेष होलिका में डालना चाहिए। प्लास्टिक, पालीथिन, टायर-ट्यूब डालने से पर्यावरण प्रदूषित होता है। सरसों के उबटन के जलने से पर्यावरण शुद्ध होगा।
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