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माघ माह में संगम स्नान गंगा सागर के समान फलदायी
Updated Mon, 01 Jan 2018 12:33 AM IST
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मिर्जापुर। तिवराने टोला स्थित डा. भवदेव पांडेय शोध संस्थान की ओर से रविवार को गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें वक्ताओं ने अपने-अपने विचार व्यक्त किए। अध्यक्षता करते हुए साहित्यकार सलिल पांडेय ने कहा कि आदि कवि वाल्मीकि ने रामायण की रचना के पूर्व ही जिन दो महीनों में प्रात: काल स्नान एवं श्रीहरि के पूजन की चर्चा की है, उसमें पहला माह माघ ही है। दूसरे पर उन्होंने चैत्र की महत्ता का उल्लेख किया है। गोस्वामी तुलसीदास ने भी चौपाई में माघ माह की महत्ता के बारे में वर्णन किया है।
वैज्ञानिक एवं खगोलीय दृष्टि से देखा जाए तो माघ महीने में प्रयाग के संगम पर सूर्य की किरणों का जल पर अद्भुत असर पड़ता है। जल में अमृत-तत्व की उत्पत्ति होती है। माघ महीने का कृष्ण पक्ष हेमंत तो शुक्ल पक्ष शिशिर ऋतु है। शीतकाल इस यौवनकाल में स्नान से शरीर के रस-रसायनों में यौवनकाल जैसा तेज प्राप्त होता है, जो शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक स्वास्थ्य को उत्तम बनाता है। सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होते हैं। मेडिकल साइंस की दृष्टि से इस अवधि में सूर्य की किरणों का सेवन अति लाभकारी है। ब्रह्मपुराण में स्नान के काल की अवधि अरुणोदय से आरंभ कर प्रात: काल कही है। प्रयाग के संगम में स्नान गंगासागर स्नान की तरह फलदायी है। इस अवधि में दान की भी महिमा है, जिसमें गर्म वस्त्रों आदि के साथ तिल के दान का विशेष उल्लेख है। गोष्ठी में शोध छात्र रूपा श्रीवास्तव, अंकित हिन्दुस्तानी, साकेत पांडेय, आयुषी अग्रवाल, आयुष सिंह, वृजेश जायसवाल आदि ने विचार व्यक्त किए। धन्यवाद ज्ञापित सावित्री पांडेय ने दिया।
वैज्ञानिक एवं खगोलीय दृष्टि से देखा जाए तो माघ महीने में प्रयाग के संगम पर सूर्य की किरणों का जल पर अद्भुत असर पड़ता है। जल में अमृत-तत्व की उत्पत्ति होती है। माघ महीने का कृष्ण पक्ष हेमंत तो शुक्ल पक्ष शिशिर ऋतु है। शीतकाल इस यौवनकाल में स्नान से शरीर के रस-रसायनों में यौवनकाल जैसा तेज प्राप्त होता है, जो शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक स्वास्थ्य को उत्तम बनाता है। सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होते हैं। मेडिकल साइंस की दृष्टि से इस अवधि में सूर्य की किरणों का सेवन अति लाभकारी है। ब्रह्मपुराण में स्नान के काल की अवधि अरुणोदय से आरंभ कर प्रात: काल कही है। प्रयाग के संगम में स्नान गंगासागर स्नान की तरह फलदायी है। इस अवधि में दान की भी महिमा है, जिसमें गर्म वस्त्रों आदि के साथ तिल के दान का विशेष उल्लेख है। गोष्ठी में शोध छात्र रूपा श्रीवास्तव, अंकित हिन्दुस्तानी, साकेत पांडेय, आयुषी अग्रवाल, आयुष सिंह, वृजेश जायसवाल आदि ने विचार व्यक्त किए। धन्यवाद ज्ञापित सावित्री पांडेय ने दिया।
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