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Mirzapur News: 127 पुस्तकालयों में फर्नीचर नहीं, 53 अधूरे
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डीजीटल लाइब्रेरी वाली खबर में जसोवर पंचायत भवन, स्रोत संवाद
- फोटो : 1
मिर्जापुर। चार लाख रुपये प्रति लाइब्रेरी के हिसाब से सात करोड़ 20 लाख रुपये खर्च कर बनाए गए 127 पुस्तकालय बुनियादी सुविधाओं के अभाव में शुरू नहीं हो सकी हैं।
180 ग्राम पंचायतों में बच्चों और किशोरों में पढ़ने की संस्कृति विकसित करने और डिजिटल संसाधनों तक उनकी पहुंच बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू की गई योजना अव्यवस्थाओं की भेंट चढ़ गई है। 53 पुस्तकालय अभी भी अधूरे हैं।
अधिकांश ग्राम पंचायतों में पुस्तकें तो पहुंच गई हैं, लेकिन फर्नीचर और अन्य संसाधनों के अभाव में लाइब्रेरी बच्चों के लिए उपयोगी नहीं बन पा रही है। जिले की कुल 809 में से 180 ग्राम पंचायतों को लाइब्रेरी के लिए चयनित किया गया है। हर लाइब्रेरी के लिए चार लाख रुपये की धनराशि निर्धारित की गई है। योजना के तहत कंप्यूटर, स्मार्ट एलईडी टीवी, इंटरनेट, कैमरे, डिजिटल सामग्री, पुस्तकों और फर्नीचर की व्यवस्था की जानी थी, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग है।
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जानकारी के अनुसार अधिकांश लाइब्रेरियों में पुस्तकों की खेप तो पहुंच चुकी है, लेकिन बच्चों के बैठने और पढ़ने के लिए आवश्यक फर्नीचर उपलब्ध नहीं है। कई स्थानों पर कुर्सियां पहुंची हैं तो मेज नहीं, जबकि कुछ जगहों पर फर्नीचर के नाम पर केवल प्लास्टिक की कुर्सियां भेज दी गई हैं। उनकी गुणवत्ता के लिए भी सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में पुस्तकालय भवनों में किताबें रखी तो हैं, लेकिन बच्चों के लिए अध्ययन का अनुकूल वातावरण नहीं बन पाया है।
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180 ग्राम पंचायतों में बच्चों और किशोरों में पढ़ने की संस्कृति विकसित करने और डिजिटल संसाधनों तक उनकी पहुंच बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू की गई योजना अव्यवस्थाओं की भेंट चढ़ गई है। 53 पुस्तकालय अभी भी अधूरे हैं।
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अधिकांश ग्राम पंचायतों में पुस्तकें तो पहुंच गई हैं, लेकिन फर्नीचर और अन्य संसाधनों के अभाव में लाइब्रेरी बच्चों के लिए उपयोगी नहीं बन पा रही है। जिले की कुल 809 में से 180 ग्राम पंचायतों को लाइब्रेरी के लिए चयनित किया गया है। हर लाइब्रेरी के लिए चार लाख रुपये की धनराशि निर्धारित की गई है। योजना के तहत कंप्यूटर, स्मार्ट एलईडी टीवी, इंटरनेट, कैमरे, डिजिटल सामग्री, पुस्तकों और फर्नीचर की व्यवस्था की जानी थी, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग है।
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जानकारी के अनुसार अधिकांश लाइब्रेरियों में पुस्तकों की खेप तो पहुंच चुकी है, लेकिन बच्चों के बैठने और पढ़ने के लिए आवश्यक फर्नीचर उपलब्ध नहीं है। कई स्थानों पर कुर्सियां पहुंची हैं तो मेज नहीं, जबकि कुछ जगहों पर फर्नीचर के नाम पर केवल प्लास्टिक की कुर्सियां भेज दी गई हैं। उनकी गुणवत्ता के लिए भी सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में पुस्तकालय भवनों में किताबें रखी तो हैं, लेकिन बच्चों के लिए अध्ययन का अनुकूल वातावरण नहीं बन पाया है।