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धन कुबेरों ने बनाया मिर्जापुर को लक्ष्मी का शहर
Updated Sat, 18 Nov 2017 12:14 AM IST
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धन कुबेरों ने संवारा लक्ष्मी की नगरी को
किसी ने कालोनी तो किसी ने बनाया काटन मिल
मंदिर, कॉलेज, पुलों का निर्माण कराया सेठों ने
पवन तिवारी
मिर्जापुर। लक्ष्मी का शहर कहे जाने वाले मिर्जापुर के विकास में धन कुबेरों का बड़ा योगदान है। किसी ने कालोनी बनवाई तो किसी ने मिल लगा कर शहर को व्यवसाय का केंद्र बना दिया। और तो और पुल तक का निर्माण भी शहर के अमीरों ने खुद करा डाला। गलीचे के लिए व्यावसायिक माहौल बनाने से लेकर नगर सेठों ने शिक्षा केंद्र भी बनवाए।
नगर के व्यवसायियों में महंत जयराम गिरी, सेठ मिश्री लाल रैदानी, वृृंदावन पुरवार, बेनी माधव प्रसाद उर्फ नबालक साहू, बाबू बिहारी साहू ने धन और ख्याति दोनों कमाई। महंत जयराम गिरी महंत परशुराम गिरी के गद्दी के उत्तराधिकारी महंत बने थे। उन्होंने नगर की समृद्धि में महत्वपूूर्ण योगदान दिया था। वे कच्ची रुई तथा मिर्जापुरी गलीचों का निर्यात करते थे। जब क्षेत्र में अकाल पड़ा तो उन्होंने आम जन के लिए अपने गल्ला गोदामों को खुलवा दिए थे। सेठ मिश्री लाल रैदानी ने बरियाघाट पर रैदानी पैलेस का निर्माण कराया, जहां आज रैदानी कालोनी बसी है। बताया जाता है कि जब वे सैकड़ो दलालों के साथ बाजार में निकलते थे बाजार का भाव स्वत: बढ़ जाता था। बेनी माधव प्रसाद साहू अभी नाबालिग ही थे कि उन्हें कारोबार संभालना पड़ा। इस कारण उनका नाम नाबालिग साहू पड़ा। उनके नाम से शहर का मुहल्ला नाबालक का तबेला बसा। शहर में सबसे पहले उन्होंने ही मोटरसाइकल मंगवाई थी। बाबू बिहारी लाल ने काटन मिल की स्थापना की थी। वे सेठ शिरोमणि के नाम से विख्यात थे। उन्होंने 1896 में विंध्याचल मार्ग के मध्य में पुतलीघर इलाके में उन्हों पांच लाख रुपये की लागत से काटन मिल बनवाई थी। यह उत्तर प्रदेश की पहली काटन मिल थी। वर्ष 1928 में इसमें आग लगने के कारण यह बंद हो गई। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी ने इस मिल की बंद चिमनी को सरकार बनने पर फिर से आरंभ कराने की घोषणा की थी। चमड़े के कारोबारी किशुन प्रसाद साहू के नाम से किशुन प्रसाद की गली अभी भी जानी जाती है। वर्ष 1900 में लाला जमुना दास ने बुंदेलखंडी में द्वारिकाधीश मंदिर की स्थापना की जो आज नगर का प्रमुख मंदिर है। इनके वंशजों ने बाद में मिर्जापुर का पहला सिनेमा घर बनवाया। बिनानी और कन्हैया लाल बसंत लाल के परिवार को शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए याद किया जाता है। दोनो परिवारों द्वारा बनवाये गए कॉलेज आज नगर की शान कहे जाते हैं।
इनसेट
एक दिन की आय से बनवाया ओझला पुल
मिर्जापुर। विंध्याचल से पहले पुण्यजला नदी गंगा में मिलती है। इस नदी अब ओझला के नाम से जाना जाता है। इसे अत्यंत पावन नदी माना जाता है। मान्यता है कि इसमें स्नान करने से मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है। इस नदी पर महंत परशुराम गिरी ने एक पुल बनवाया था। वे रूई का निर्यात करते थे। और एक दिन के रुई के कारोबार से हुई आय से उन्होंने इस पुल को बनवाया था। यह पुल वास्तुकला का सुंदर नमूना है। पुल के गर्भ गृह में कई कक्ष बने हुए है जिसमें उस समय यात्री विश्राम करते थे।
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धन कुबेरों ने संवारा लक्ष्मी की नगरी को
किसी ने कालोनी तो किसी ने बनाया काटन मिल
मंदिर, कॉलेज, पुलों का निर्माण कराया सेठों ने
पवन तिवारी
मिर्जापुर। लक्ष्मी का शहर कहे जाने वाले मिर्जापुर के विकास में धन कुबेरों का बड़ा योगदान है। किसी ने कालोनी बनवाई तो किसी ने मिल लगा कर शहर को व्यवसाय का केंद्र बना दिया। और तो और पुल तक का निर्माण भी शहर के अमीरों ने खुद करा डाला। गलीचे के लिए व्यावसायिक माहौल बनाने से लेकर नगर सेठों ने शिक्षा केंद्र भी बनवाए।
नगर के व्यवसायियों में महंत जयराम गिरी, सेठ मिश्री लाल रैदानी, वृृंदावन पुरवार, बेनी माधव प्रसाद उर्फ नबालक साहू, बाबू बिहारी साहू ने धन और ख्याति दोनों कमाई। महंत जयराम गिरी महंत परशुराम गिरी के गद्दी के उत्तराधिकारी महंत बने थे। उन्होंने नगर की समृद्धि में महत्वपूूर्ण योगदान दिया था। वे कच्ची रुई तथा मिर्जापुरी गलीचों का निर्यात करते थे। जब क्षेत्र में अकाल पड़ा तो उन्होंने आम जन के लिए अपने गल्ला गोदामों को खुलवा दिए थे। सेठ मिश्री लाल रैदानी ने बरियाघाट पर रैदानी पैलेस का निर्माण कराया, जहां आज रैदानी कालोनी बसी है। बताया जाता है कि जब वे सैकड़ो दलालों के साथ बाजार में निकलते थे बाजार का भाव स्वत: बढ़ जाता था। बेनी माधव प्रसाद साहू अभी नाबालिग ही थे कि उन्हें कारोबार संभालना पड़ा। इस कारण उनका नाम नाबालिग साहू पड़ा। उनके नाम से शहर का मुहल्ला नाबालक का तबेला बसा। शहर में सबसे पहले उन्होंने ही मोटरसाइकल मंगवाई थी। बाबू बिहारी लाल ने काटन मिल की स्थापना की थी। वे सेठ शिरोमणि के नाम से विख्यात थे। उन्होंने 1896 में विंध्याचल मार्ग के मध्य में पुतलीघर इलाके में उन्हों पांच लाख रुपये की लागत से काटन मिल बनवाई थी। यह उत्तर प्रदेश की पहली काटन मिल थी। वर्ष 1928 में इसमें आग लगने के कारण यह बंद हो गई। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी ने इस मिल की बंद चिमनी को सरकार बनने पर फिर से आरंभ कराने की घोषणा की थी। चमड़े के कारोबारी किशुन प्रसाद साहू के नाम से किशुन प्रसाद की गली अभी भी जानी जाती है। वर्ष 1900 में लाला जमुना दास ने बुंदेलखंडी में द्वारिकाधीश मंदिर की स्थापना की जो आज नगर का प्रमुख मंदिर है। इनके वंशजों ने बाद में मिर्जापुर का पहला सिनेमा घर बनवाया। बिनानी और कन्हैया लाल बसंत लाल के परिवार को शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए याद किया जाता है। दोनो परिवारों द्वारा बनवाये गए कॉलेज आज नगर की शान कहे जाते हैं।
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एक दिन की आय से बनवाया ओझला पुल
मिर्जापुर। विंध्याचल से पहले पुण्यजला नदी गंगा में मिलती है। इस नदी अब ओझला के नाम से जाना जाता है। इसे अत्यंत पावन नदी माना जाता है। मान्यता है कि इसमें स्नान करने से मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है। इस नदी पर महंत परशुराम गिरी ने एक पुल बनवाया था। वे रूई का निर्यात करते थे। और एक दिन के रुई के कारोबार से हुई आय से उन्होंने इस पुल को बनवाया था। यह पुल वास्तुकला का सुंदर नमूना है। पुल के गर्भ गृह में कई कक्ष बने हुए है जिसमें उस समय यात्री विश्राम करते थे।
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