फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Meerut News ›   World Thalassemia Day: Awareness is the cure of this disease, know the symptoms and treatment

विश्व थैलेसीमिया दिवस: इस रोग के खात्मे को जागरूकता जरूरी, जानें इसके लक्षण व उपचार

Wed, 08 May 2019 05:20 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सहारनपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सहारनपुर Published by: Dimple Sirohi Updated Wed, 08 May 2019 05:20 PM IST
विज्ञापन
World Thalassemia Day: Awareness is the cure of this disease, know the symptoms and treatment
विश्व थैलेसीमिया दिवस

थैलेसीमिया एक आनुवंशिक रक्त रोग है, जिसमें मरीज के भीतर खून का ठीक से निर्माण नहीं हो पाता है। इसकी वजह से रोगी को बार-बार खून चढ़ाना पड़ता है। यह रोग न केवल रोगी के लिए कष्टप्रद होता है, बल्कि परिवार खासकर रोगी के माता-पिता को भी झकझोर देता है। भविष्य में और किसी के परिवार को यह दंश न झेलना पड़े। इसके लिए जरूरी है समाज में जागरूकता लाना।

विज्ञापन


आज विश्व थैलेसीमिया दिवस है। ऐसे में अमर उजाला ने सहारनपुर जनपद में रोगियों की संख्या और उनके इलाज की व्यवस्था की पड़ताल की। आगे जानें इस बीमारी के क्या हैं लक्षण और इससे कैसे निपटा जा सकता है: -
विज्ञापन


एसबीडी जिला अस्पताल में वर्तमान में 65 रोगियों का इलाज चल रहा है। बच्चा वार्ड में थैलेसीमिया के लिए 14 बेड का स्पेशल वार्ड बनाया गया है, जो एक साल पहले तैयार किया गया था। प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक डॉक्टर सुनित कुमार वार्ष्णेय का दावा है कि यह प्रदेश का सबसे पहला थैलेसीमिया वार्ड है।

विज्ञापन
विज्ञापन

यहां डॉक्टर एके चौधरी और डॉक्टर विरेंद्र बच्चों का इलाज कर रहे हैं। डॉक्टर एके चौधरी ने बताया कि कुछ समय पहले 73 बच्चे पंजीकृत थे, मगर आठ बच्चे या तो सहारनपुर से बाहर चले गए हैं या फिर नहीं रहे हैं। उन्होंने बताया कि वर्तमान में 65 बच्चों का नियमित रूप से इलाज किया जा रहा है। इन रोगियों के लिए खून की व्यवस्था अलग से रहती है। खास बात यह है कि खून के बदले खून नहीं लिया जाता है, जैसे आम मरीजों के साथ होता है। कुछ दवाएं दी जाती हैं, जो पर्याप्त मात्रा में अस्पताल में उपलब्ध हैं। 

थैलेसीमिया होने के कारण  
थैलेसीमिया एक आनुवंशिक रोग है और माता अथवा पिता या दोनों के जींस में गड़बड़ी के कारण होता है। रक्त में हीमोग्लोबिन दो तरह के प्रोटीन से बनता है। पहला अल्फा और दूसरा बीटा ग्लोबिन। दोनों में से किसी प्रोटीन के निर्माण वाले जींस में गड़बड़ी होने पर थैलेसीमिया रोग होता हैं।

इस रोग में शरीर में लाल रक्त कण/ रेड ब्लड सेल(आरबीसी) नहीं बन पाते हैं और जो थोड़े बन पाते हैं वह केवल थोड़े समय तक ही रहते हैं। थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों को बार-बार खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। ऐसा न करने पर बच्चा जीवित नहीं रह पाता।

थैलेसीमिया के प्रकार 
मेजर थैलेसीमिया: यह बीमारी उन बच्चों को होती है, जिनके माता और पिता दोनों के जींस में गड़बड़ी होती है। यदि माता और पिता दोनों थैलेसीमिया माइनर हों तो होने वाले बच्चे को मेजर थैलेसीमिया होने का खतरा अधिक रहता है।

माइनर थैलेसीमिया: यह बीमारी उन बच्चों को होती है, जिन्हें प्रभावित जींस माता या पिता द्वारा प्राप्त होता है। इस प्रकार से पीड़ित थैलेसीमिया के रोगियों में अक्सर कोई लक्षण नजर नहीं आता है। यह रोगी थैलेसीमिया वाहक होते हैं।

हैड्रोप फीटस: यह एक बेहद खतरनाक थैलेसीमिया का प्रकार है, जिसमें गर्भ के अंदर ही बच्चे की मृत्यु हो जाती है या पैदा होने के कुछ समय बाद ही बच्चा मर जाता है।

थैलेसीमिया के लक्षण 
माइनर थैलेसीमिया:
इसमें अधिकतर मामलों में कोई लक्षण नजर नहीं आता हैं। कुछ रोगियों में रक्त की कमी या एनीमिया हो सकता हैं। 
मेजर थैलेसीमिया: जन्म के तीन महीने बाद कभी भी इस बीमारी के लक्षण नजर आ सकते हैं।  बच्चों के नाखून और जीभ पीली पड़ जाने से पीलिया/जांडिस का भ्रम पैदा हो जाता हैं। बच्चे के जबड़ों और गालों में असमानता आ जाती है। बच्चे का विकास रुक जाता है और वह उम्र से काफी छोटा नजर आता है। सूखता चेहरा, वजन न बढ़ना, हमेशा बीमार नजर आना, कमजोरी, सांस लेने में तकलीफ प्रमुख लक्षण हैं। 

थैलेसीमिया का इलाज 
थैलेसीमिया का इलाज करने के लिए नियमित रूप से खून चढ़ाने की जरूरत होती है। कुछ रोगियों को हर 10 से 15 दिन में रक्त चढ़ाना पड़ता है। ज्यादातर मरीज इसका खर्चा नहीं उठा पाते हैं। सामान्यत: पीड़ित बच्चे की मृत्यु 12 से 15 वर्ष की आयु में हो जाती है। सही उपचार लेने पर 25 वर्ष से ज्यादा समय तक जीवित रह सकते हैं।

थैलेसीमिया से पीड़ित रोगियों में आयु के साथ-साथ रक्त की आवश्यकता भी बढ़ती रहती है। बार-बार रक्त चढ़ाने से और लौह तत्व की गोली लेने से रोगी के खून में लौह तत्व की मात्रा अधिक हो जाती है। लीवर, स्पीलिन तथा ह्रदय में जरूरत से ज्यादा लौह तत्व जमा होने से ये अंग सामान्य तौर पर कार्य करना छोड़ देते हैं। रक्त में जमे इस अधिक लौह तत्व को निकालने के लिए इंजेक्शन और दवा दोनों तरह के इलाज उपलब्ध हैं।

थैलेसीमिया को रोकने के लिए यह करें
हमारे समाज में खासकर हिन्दू धर्म में शादी से पहले लड़का और लड़की की कुंडली मिलाई जाती है। मगर यदि हमें बच्चों को थैलेसीमिया होने से बचाना है तो लड़का और लड़की की स्वास्थ्य कुंडली मिलाया जाना बेहद जरूरी है। जिससे पता चल सके की उनका स्वास्थ्य एक दूसरे के अनुकूल है या नहीं।

स्वास्थ्य कुंडली में थैलेसीमिया, एड्स, हैपेटाइटिस-बी और सी, आरएच फैक्टर आदि जांचें शामिल हैं। आज वैद्यकीय विज्ञान इतना आगे बढ़ चुका है कि जागरूक रहकर हम थैलेसीमिया जैसी कई जानलेवा बीमारियों से बच सकते हैं।  

नोट- इन खबरों के बारे अपकी क्या राय है। हमें फेसबुक पर कमेंट बॉक्स में लिखकर बताएं।

शहर से लेकर देश तक की ताजा खबरें व वीडियो देखने लिए हमारे इस फेसबुक पेज को लाइक करें


https://www.facebook.com/AuNewsMeerut/

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed