यूपी: तस्करों के निशाने पर वन्य जीवों के आशियाने, आबादी की ओर बढ़े खतरनाक रसैल वाइपर
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हस्तिनापुर को वन्य जीवों का सुरक्षित अभ्यारण्य क्षेत्र घोषित किया गया है। जिसके तहत यहां पर शिकार तो पूरी तरह प्रतिबंधित है ही, साथ ही इस क्षेत्र में पेड़ तो दूर घास तक काटना भी प्रतिबंधित है। बावजूद इसके सारे प्रतिबंधों और कानूनों का यहां खुलकर उल्लंघन हो रहा है। हाल ये है कि जंगली जानवरों और जीवों केरहने का ठिकाना छिनता जा रहा है। गंगा खादर के इस अभ्यारण्य में वन्य जीवों केरहने और छिपने के लिए पेड़ों का जंगल नहीं बड़ी जंगली घास के मैदान हैं। इन्हीं घास के मैदान में वह सुरक्षित जीवन जीने के साथ ही प्रजनन आदि भी करते हैं।
पूरा मिलता है संरक्षण
टाटा घास की तस्करी से जुड़े लोगों की स्थानीय थाना पुलिस के साथ ही क्षेत्रीय वनकर्मियों से भी सांठगांठ होती है। जिसके चलते इन्हें पूरा संरक्षण मिलता है और सर्दियां शुरू होते ही घास का कटान शुरू हो जाता है। टाटा घास का अवैध कटान होने के कारण ही वन्य जीव लगातार खादर से निकलकर आबादी की तरफ आ रहे हैं। क्योंकि घास के कट जाने सेइन जानवरों को सुरक्षित रहने का स्थान नहीं मिलता और ये खुले मैदान से भागते हुए यह आबादी की तरफ बढ़ आते हैं।
यही नहीं छिपने का स्थान छिन जाने से शिकारी भी आसानी से इन्हें अपना शिकार बना लेते हैं। यह समय बारहसिंगा के प्रजनन का होता है। टाटा घास के बीच यह जानवर छिपकर आसानी से प्रजनन प्रक्रिया करते हैं। लेकिन इस घास के लगातार कम होने से इन जानवरों के जीवन पर संकट खड़ा हो रहा है।
पेपर मिल में जाती है बड़े पैमाने पर घास
महंगे हैं दाम
कहने को तो यह घास है, लेकिन इसके दाम बहुत ऊंचे हैं। गंगा किनारे से कटान होने पर ही उठने वाली घास 50 रुपये कुंतल बिकती है, तो बाहर सड़क पर लाने के बाद इसके दाम 62 रुपये प्रति कुंतल होते हैं। लेकिन तस्कर इसे आगे पेपर मिल या हैंड़ीक्राफ्ट वालों को 100 से 125 रुपये प्रति कुंतल तक बेचते हैं।
बरसात के बाद तेजी से बढ़ती है घास
बारिश में गंगा का पानी उफान पर होता है, जो बढ़कर खादर में फैल जाता है। लेकिन जैसे ही गंगा का पानी कम होता है, यह घास तेजी से बढ़ना शुरू हो जाती है और अक्तूबर-नवंबर माह से इसका कटान शुरू हो जाता है। अभ्यारण्य क्षेत्र की इस घास का कटान सिर्फ तस्कर ही नहीं करतेे, बल्कि बड़े पैमाने पर गंगा मेला तैयारी में इसका कटान हो जाता है। मेले के आयोजन स्थल के लिए तो घास की कटाई तो होती ही है इसके साथ ही यहां मेला स्थल तक पहुंचने के लिए भी घास को नीचे बिछाकर उसके ऊपर रेत डालकर रास्ता तैयार किया जाता है।
अभ्यारण्य छोड़ आबादी में घुसे रसैल वाइपर
यूं तो सांपों का आबादी और घरों में घूमना आम बात है, लेकिन कुछ सर्प ऐसे हैं जो आबादी से दूर सिर्फ जंगलों में ही देखे जाते हैं। इनमें रसैल वाइपर भी शामिल हैं। यह रसैल वाइपर पुराने खंडहर, सीलन और गंदगी वाली जगहों पर अपना ठिकाना ज्यादा बनाते हैं। हस्तिनापुर वन अभ्यारण्य क्षेत्र अजगर, रसैल वाइपर आदि सांपों का ठिकाना माना जाता है, लेकिन अब इन सांपों का विचरण आबादी की तरफ होने लगा है।
अजगर तो पिछले कई सालों से आबादी के बीच आते रहे हैं पर अभी तक रसैल वाइपर को नहीं देखा गया था, लेकिन अब इनका गांवों के भीतर पहुंचना चौंका रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार पिछले दिनों आयी बाढ़ के कारण सांपों के रहने के ठिकाने भी बदल गये। जिससे रसैल वाइपर ने भी अपना ठिकाना बदला तो वह गांवों में पहुंच गये हैं।
ग्राम दुर्वेशपुर में अभी तक तीन रसैल वाइपर नजर आ चुके हैं। ग्रामीण रणबीर सिंह के घर में में तो दो रसैल वाइपर एक साथ मिले। जबकि इसी गांव के इश्त्यिाक के यहां भी एक रसैल वाइपर मिला। जबकि ग्राम हरिपुर, नदल्लीपुर, पूठी, जयसिंहपुर आदि में भी ग्रामीणों ने रसैल वाइपर देखे जाने का दावा किया है।
क्या है रसैल वाइपर
रसैल वाइपर किसी छोटे अजगर जैसा, लेकिन फुर्तिला सांप होता है। जब यह कुंडली मारकर बैठता है तो अपना मुुंह पूरी तरह छिपा लेता है। इसका मुंह अन्य सांपों के मुंह की तुलना में कुछ चपटा होता है। यह बहुत ही आक्रामक सांप माना जाता है। जरा सी आहट पर यह हमला कर देता है। इस सांप की सबसे बड़ी खूबी ये है कि इसकी मादा अपने पेट में ही अंडे रखती है और पेट में ही उनका प्रजनन करके बच्चे पैदा करती है। रसैल वाइपर के बच्चे तेजी से बढ़ते हैं। इस सांप का जहर बहुत ही खतरनाक होता है, जो शरीर में जाते ही खून को जमा देता है। इसके काटे जाने पर बचने की उम्मीद बेहद कम जाती है।
वन विभाग को सूचना दें
मेरे पास रसैल वाइपर के देखे जाने की सूचना आयी है। यह बहुत ही खतरनाक होता है। ऐसे में ग्रामीण इस सांप को देखें तो तुरंत वन विभाग की टीम को सूचना दें और इसके आसपास न जायें। इसके साथ ही बच्चों को इसके पास भी न फटकने दें। -अदिति शर्मा, डीएफओ
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