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Meerut News: विश्व में बढ़ा हिंदी का मान, हर कोई कर रहा सम्मान
Sat, 26 Nov 2022 09:00 AM IST
मेरठ ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
Published by: मेरठ ब्यूरो
Updated Sat, 26 Nov 2022 09:00 AM IST
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CCSU
- फोटो : Amar Ujala Meerut
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के बृहस्पति भवन में हिंदी विभाग और क्रांतिधरा साहित्य अकादमी द्वारा मेरठ लिट्रेसी फेस्टिवल का शुभारंभ किया गया। तीन दिवसीय कार्यक्रम के पहले दिन हिंदी साहित्य से जुड़े नेपाल, ब्रिटेन, जापान, ऑस्ट्रिया और रूस से आए लोगों ने अपने अनुभव साझा किए। शुभारंभ कवियत्री सुषमा सवेरा ने किया।
मुख्य अतिथि जापान की वरिष्ठ हिंदी सेवी डॉ. रमा पूर्णिमा शर्मा ने बताया कि वह 32 साल पहले भारत से जापान गई। उन्होंने बताया कि उनके पौत्र और पौत्री जापान के स्कूल में पढ़ते हैं, लेकिन वह हिंदी ही बोलते हैं। जापान में विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाई जाती है, लेकिन ज्यादा लोग इससे जुड़ नहीं पाते। हिंदी पढ़ाना शुरू किया और हिंदी पत्रिका गूंज भी निकाली है। टोकियो में हिंदी कल्चर सेंटर के माध्यम से भारतीयों के साथ जापानियों को हिंदी का महत्व बताती हैं। इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक ज्ञान प्रकाश की पुस्तक यादें, श्रीपाल सिंह मुदकर की पुस्तक छायाभ गीत आदि पुस्तकों का विमोचन किया गया।
हिंदी से जुड़ने के बाद नहीं आता निराशा का भाव
ब्रिटेन से आईं जया वर्मा ने कहा कि जब इंग्लैंड से भारत आती हूं तब अहसास होता है कि यह साहित्य का समय है। इंग्लैंड के नॉटिंघम और मेरठ में काफी समानताएं हैं। दोनों ही साहित्य और क्रांति के शहर हैं। वह 51 वर्षों से इंग्लैंड में रह रही हैं और 15 वर्षों से वहां हिंदी पढ़ा रही हैं। मुख्य वक्ता आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री ने बताया कि हिंदी भाषा से जुड़ने के बाद हमारे मन में निराशा का भाव बिल्कुल नहीं आता है। गूगल जैसी कंपनी को भी हिंदी में आना पड़ा है। आज हिंदी भाषा की सबसे अधिक मांग है।
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हिंदी में रोता है विश्वभर में जन्मा बच्चा
हिंदी के विद्वान गोपाल नारसन ने कहा कि हिंदी हमारे जन्म की भाषा है। यही रुदन की भी भाषा है। दुनिया में कहीं भी बच्चा जन्म लेता है तो वह रोता हिंदी में ही है। हम कितने भी विद्वान हो जाएं और अंग्रेजी सीख लें, लेकिन उसे बोलने से पहले मन में विचार हिंदी का ही आएगा। अध्यक्षता करते हुए सीसीएसयू के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. नवीन चंद्र लोहनी ने कहा कि हिंदी को रोजगार की भाषा बनाना आवश्यक है। आने वाली पीढ़ी को भी हिंदी से जोड़ना चाहिए।
डिजिटल क्रांति में पुस्तकों से बढ़ रही दूरी
दूसरे सत्र में हिंदी की वैश्विक स्थिति पर परिचर्चा हुई। डॉ. विदुषी शर्मा, प्रदीप देवीशरण भट्ट, डॉ. अशोक मैत्रेय, डॉ. ईश्वर चंद गंभीर ने विचार प्रस्तुत किए। डिजिटल क्रांति में पुस्तकों से हो रही दूरी पर चर्चा की गई। संचालन राम गोपाल भारतीय और डॉ. अंजू सिंह ने किया। चौथे सत्र में आलमी मुशायरा आयोजित किया गया। मुख्य अतिथि ऑस्ट्रिया से आईं सुनीता चावला रहीं। वरिष्ठ शायर किशन स्वरूप, अनुराग मिश्र गैर, केके भसीन, सुंदर लाल मेहरानियां, दिलदार देहलवी, डॉ. एजाज पापुलर मेरठी, अनिमेष शर्मा, मनोज फगवाड़वी ने शिरकत की।
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मुख्य अतिथि जापान की वरिष्ठ हिंदी सेवी डॉ. रमा पूर्णिमा शर्मा ने बताया कि वह 32 साल पहले भारत से जापान गई। उन्होंने बताया कि उनके पौत्र और पौत्री जापान के स्कूल में पढ़ते हैं, लेकिन वह हिंदी ही बोलते हैं। जापान में विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाई जाती है, लेकिन ज्यादा लोग इससे जुड़ नहीं पाते। हिंदी पढ़ाना शुरू किया और हिंदी पत्रिका गूंज भी निकाली है। टोकियो में हिंदी कल्चर सेंटर के माध्यम से भारतीयों के साथ जापानियों को हिंदी का महत्व बताती हैं। इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक ज्ञान प्रकाश की पुस्तक यादें, श्रीपाल सिंह मुदकर की पुस्तक छायाभ गीत आदि पुस्तकों का विमोचन किया गया।
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हिंदी से जुड़ने के बाद नहीं आता निराशा का भाव
ब्रिटेन से आईं जया वर्मा ने कहा कि जब इंग्लैंड से भारत आती हूं तब अहसास होता है कि यह साहित्य का समय है। इंग्लैंड के नॉटिंघम और मेरठ में काफी समानताएं हैं। दोनों ही साहित्य और क्रांति के शहर हैं। वह 51 वर्षों से इंग्लैंड में रह रही हैं और 15 वर्षों से वहां हिंदी पढ़ा रही हैं। मुख्य वक्ता आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री ने बताया कि हिंदी भाषा से जुड़ने के बाद हमारे मन में निराशा का भाव बिल्कुल नहीं आता है। गूगल जैसी कंपनी को भी हिंदी में आना पड़ा है। आज हिंदी भाषा की सबसे अधिक मांग है।
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हिंदी में रोता है विश्वभर में जन्मा बच्चा
हिंदी के विद्वान गोपाल नारसन ने कहा कि हिंदी हमारे जन्म की भाषा है। यही रुदन की भी भाषा है। दुनिया में कहीं भी बच्चा जन्म लेता है तो वह रोता हिंदी में ही है। हम कितने भी विद्वान हो जाएं और अंग्रेजी सीख लें, लेकिन उसे बोलने से पहले मन में विचार हिंदी का ही आएगा। अध्यक्षता करते हुए सीसीएसयू के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. नवीन चंद्र लोहनी ने कहा कि हिंदी को रोजगार की भाषा बनाना आवश्यक है। आने वाली पीढ़ी को भी हिंदी से जोड़ना चाहिए।
डिजिटल क्रांति में पुस्तकों से बढ़ रही दूरी
दूसरे सत्र में हिंदी की वैश्विक स्थिति पर परिचर्चा हुई। डॉ. विदुषी शर्मा, प्रदीप देवीशरण भट्ट, डॉ. अशोक मैत्रेय, डॉ. ईश्वर चंद गंभीर ने विचार प्रस्तुत किए। डिजिटल क्रांति में पुस्तकों से हो रही दूरी पर चर्चा की गई। संचालन राम गोपाल भारतीय और डॉ. अंजू सिंह ने किया। चौथे सत्र में आलमी मुशायरा आयोजित किया गया। मुख्य अतिथि ऑस्ट्रिया से आईं सुनीता चावला रहीं। वरिष्ठ शायर किशन स्वरूप, अनुराग मिश्र गैर, केके भसीन, सुंदर लाल मेहरानियां, दिलदार देहलवी, डॉ. एजाज पापुलर मेरठी, अनिमेष शर्मा, मनोज फगवाड़वी ने शिरकत की।