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विधान परिषद चुनाव: पश्चिमी यूपी में एक बार फिर बेफिक्र हो गई भाजपा

Sat, 05 Dec 2020 03:03 PM IST
Dimple Sirohi प्रदीप मिश्र, अमर उजाला, मेरठ
प्रदीप मिश्र, अमर उजाला, मेरठ Published by: Dimple Sirohi Updated Sat, 05 Dec 2020 03:03 PM IST
सार

  • हाथरस कांड के बाद किसान आंदोलन का विधान परिषद चुनाव पर नहीं दिखा असर 

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UP MLC elections: BJP once again becomes careless in Western UP
भाजपा प्रत्याशी श्रीचंद शर्मा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पंजाब से लेकर दिल्ली तक किसानों के आंदोलन के बीच हुए विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक सीटों के नतीजों ने 2022 की तैयारी में जुटी भाजपा के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अच्छा संकेत दिया है। यहां का सामुदायिक ध्रुवीकरण फिलहाल भाजपा के पक्ष में बना हुआ है।
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ध्रुवीकरण, बूथ प्रबंधन और पन्ना प्रभारी की योजना के जरिए भाजपा ने मेरठ-सहारनपुर मंडल में माध्यमिक शिक्षक संघ के आधी सदी में बनाए गए किले को ध्वस्त कर दिया है। इस सीट के अलावा बरेली-मुरादाबाद के परिणाम/ रुझान के आधार पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा निश्चिंत हो सकती है। हालांकि बसपा के चुनाव मैदान से अलग रहने का भी भाजपा को लाभ मिला है।
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नवंबर में छह विधानसभा की छह सीटों के लिए हुए उपचुनाव में इसी ध्रुवीकरण ने उसे जीत दिलाई थी। हाथरस कांड के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश को लेकर लगाई जा रही अटकलें तब धरी की धरी रह गईं, जब सहानुभूति लहर के बीच बुलंदशहर में बसपा दूसरे नंबर पर आ गई। फिरोजाबाद की टूंडला और अमरोहा की नौगावां सादात सीट पर सपा प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहे थे।
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किसान आंदोलन से इससे पहले हाथरस कांड को लेकर भी सियासत गर्माई थी और विपक्ष भी एकजुट था। मौके पर पहुंचे रालोद उपाध्यक्ष जयंत चौधरी के साथ पुलिस की बदसुलूकी की घटना के बाद मुजफ्फरनगर और मथुरा में महापंचायत हुई थी। 

इसमें जुटे नेताओं और भीड़ से एकबारगी लगा था कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश से सरकार को इसका जवाब मिलेगा लेकिन यह केवल जाट स्वाभिमान का आंदोलन का प्रतीक भर बनकर रह गया। बुलंदशहर सीट पर रालोद-सपा गठबंधन के प्रत्याशी प्रवीण कुमार से ज्यादा वोट तो कांग्रेस के सुशील चौधरी ने हासिल किए थे। इन नतीजों से ही साफ हो गया था कि भाजपा के समीकरण प्रभावित नहीं हुए हैं। 

अब भाजपा ने 2020 के अंत में जो इबारत लिखी है, वह 2022 की शुरुआत में 2017 की ही तरह दोहराए जाने के आसार बढ़ गए हैं। जानकार मानते हैं कि सपा-रालोद के बीच पहले जैसी केमिस्ट्री नहीं रह गई है। मजबूत विपक्ष न होने के कारण पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा अपनी ताकत और चुनावी प्रबंधन के कौशल का जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल कर सकेगी। 

आसपा के असर पर भाजपा-बसपा की नजर
बुलंदशहर उपचुनाव में आजाद समाज पार्टी (आसपा) को मिले वोटों से तय हो गया है कि 2022 में चंद्रशेखर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फोकस करेंगे। कहा जा रहा है कि आसपा ने कुछ सीटें चिह्नित करने के साथ ही मुस्लिम प्रत्याशी भी तय कर लिए हैं। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण रोकने के लिए भाजपा और बसपा ने अंदरूनी रणनीति बनाई है। मुनकाद अली को बसपा के प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाना इसी का हिस्सा है। 

मजबूती से नहीं उठ पाएंगे कर्मचारियों के मुद्दे
उच्च सदन में जिस तरह से माध्यमिक शिक्षक संघ के शर्मा गुट की संख्या कम हुई है, उससे जाहिर है कि शिक्षकों के साथ-साथ कर्मचारियों के मुद्दे भी मजबूती के साथ नहीं उठ सकेंगे। अभी तक शर्मा गुट कर्मचारियों की ढाल बनकर सरकार से मोर्चा लेता था। संभावना यह भी है कि प्रदेश में शिक्षा सुधार या सुविधाओं में कटौती के लंबित मामले पारित कराने के लिए सरकार को ज्यादा जद्दोजहद नहीं करनी पड़ेगी।

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