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किसानों के असली चौधरी: सत्ता नहीं गांव के सबसे बड़े हिमायती; चौधरी चरण सिंह से जुड़े अनसुने किस्से
Tue, 23 Dec 2025 12:49 PM IST
शाहरुख खान
डॉ रवींद्र प्रताप राणा, स्वतंत्र पत्रकार
डॉ रवींद्र प्रताप राणा, स्वतंत्र पत्रकार
Published by: शाहरुख खान
Updated Tue, 23 Dec 2025 12:49 PM IST
सार
चौधरी चरण सिंह का मूल्यांकन उनके पदों से नहीं किया जा सकता। वे पहले नेता थे जिन्होंने किसानों के बेटों के लिए नौकरियों में 60 प्रतिशत आरक्षण की वकालत की। उनका मानना था भारत में असली संघर्ष शहर और गांव के बीच है।
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पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
17 दिसंबर 2025 की सर्द सुबह। बागपत जिले के गांवों से किसानों के जत्थे ट्रैक्टरों पर सवार होकर किशनपुर–बराल की ओर बढ़ रहे थे। मौका था पूर्व प्रधानमंत्री, भारत रत्न चौधरी चरण सिंह की जयंती के उपलक्ष्य में कार्यक्रम का। मंच पर उनके पोते और केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी बोलने वाले थे, लेकिन असली उपस्थिति उन किसानों की थी जिनके लिए चौधरी साहब आज भी एक जीवित स्मृति हैं।
धोती-कुर्ता, गांधी टोपी और लाठी थामे अस्सी-नब्बे साल के बुजुर्ग ठंड की परवाह किए बिना आगे बढ़ रहे थे। 'कहां जा रहे हैं?' सवाल के जवाब में सिर्फ इतना कहा, 'चौधरी का जन्मदिन है।' वेस्ट यूपी में चौधरी चरण सिंह का नाम आज भी किसानों को ऐसे खींच लाता है जैसे कोई पुकार हो, अपनी, आत्मीय। इसी सभा में शिक्षक अश्वनी तोमर मिले। चौधरी साहब का नाम लेते ही उनके चेहरे पर चमक आ गई। उन्होंने बताया, शायद 1980 के आसपास की बात होगी।
बागपत के ठाकुरद्वारा मोहल्ले में उनके पिता सूबेदार अनंगपाल सिंह के घर चौधरी चरण सिंह आए थे। गली इतनी संकरी थी कि गाड़ी नहीं जा सकती थी। खुफिया रिपोर्ट में यह दर्ज था, फिर भी पूर्व प्रधानमंत्री 200 मीटर से अधिक पैदल चलकर उनके घर पहुंचे। घर नहीं, सीधे गायों के छप्पर में चले गए। यही था चौधरी चरण सिंह का 'प्रोटोकॉल'। बूढ़पुर गांव निवासी, जनता वैदिक इंटर कॉलेज बड़ौत के पूर्व प्रधानाचार्य चौधरी रणवीर सिंह (90 वर्ष) आज भी 1955 की वह तस्वीर याद करते हैं, जब चौधरी चरण सिंह पंडित गोविंद वल्लभ पंत के साथ गांव आए थे।
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धोती-कुर्ता, गांधी टोपी और लाठी थामे अस्सी-नब्बे साल के बुजुर्ग ठंड की परवाह किए बिना आगे बढ़ रहे थे। 'कहां जा रहे हैं?' सवाल के जवाब में सिर्फ इतना कहा, 'चौधरी का जन्मदिन है।' वेस्ट यूपी में चौधरी चरण सिंह का नाम आज भी किसानों को ऐसे खींच लाता है जैसे कोई पुकार हो, अपनी, आत्मीय। इसी सभा में शिक्षक अश्वनी तोमर मिले। चौधरी साहब का नाम लेते ही उनके चेहरे पर चमक आ गई। उन्होंने बताया, शायद 1980 के आसपास की बात होगी।
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बागपत के ठाकुरद्वारा मोहल्ले में उनके पिता सूबेदार अनंगपाल सिंह के घर चौधरी चरण सिंह आए थे। गली इतनी संकरी थी कि गाड़ी नहीं जा सकती थी। खुफिया रिपोर्ट में यह दर्ज था, फिर भी पूर्व प्रधानमंत्री 200 मीटर से अधिक पैदल चलकर उनके घर पहुंचे। घर नहीं, सीधे गायों के छप्पर में चले गए। यही था चौधरी चरण सिंह का 'प्रोटोकॉल'। बूढ़पुर गांव निवासी, जनता वैदिक इंटर कॉलेज बड़ौत के पूर्व प्रधानाचार्य चौधरी रणवीर सिंह (90 वर्ष) आज भी 1955 की वह तस्वीर याद करते हैं, जब चौधरी चरण सिंह पंडित गोविंद वल्लभ पंत के साथ गांव आए थे।
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कांधला से ढाई रुपये में हाथी लाया गया, बड़ौत से बैंडबाजा। दोनों नेता हाथी पर सवार होकर गांव में प्रवेश करते हैं, यह सत्ता का प्रदर्शन नहीं, गांव के सम्मान की राजनीति थी। 'हमें कपड़े भी चौधरी साहब ने दिए' छपरौली की एक गैलरी में हुक्का गुड़गुड़ाते किसानों से जब चौधरी चरण सिंह का जिक्र छेड़ा गया तो जवाब बिना लाग-लपेट आया, 'हमें पैंट, पजामा, जूते, नेकर, सब चौधरी साहब ने दिया'। पहले तो नंगे पांव घूमते थे। शादी-ब्याह में एक-दूसरे के कपड़े मांगकर पहनते थे।” यह बयान केवल भावुकता नहीं, सामाजिक इतिहास है। जमींदारी उन्मूलन, चकबंदी, सिंचाई और भूमि अधिकार, इन फैसलों ने किसान को पहली बार सम्मान और आत्मविश्वास दिया।
पटवारी राज और किसान की मुक्ति छपरौली से पांच बार विधायक रहे चौधरी नरेंद्र सिंह एडवोकेट (94) बताते हैं, सीलिंग एक्ट से पहले पटवारी का रौब कलेक्टर से ज्यादा था। जमीन इधर-उधर कर देना आम बात थी। “मेरे पिताजी चार बीघा जमीन पटवारी के लिए रखते थे। जो वह कहता, वही बोया जाता और पूरी फसल वही ले जाता।”सीलिंग कानून ने सिर्फ जमीन नहीं बदली, सत्ता का संतुलन बदला।
ऐसा ही एक किस्सा मुझे मवीकलां गांव के महाशय रणवीर सिंह आर्य ने बताया था, गांव की ट्यूबवेल मंजूर होकर निरस्त हो गई। कुछ किसान लखनऊ चौधरी साहब से मिलने पहुंचे। डांट पड़ी, “यहां क्यों चले आए?” कहानी सुनी, बोले “अब ट्यूबवेल भी मैं ही लगवाऊंगा।” गांव लौटे तो काम शुरू हो चुका था। मेरठ सर्किट हाउस के केयरटेकर रहे सुरेश बताते हैं कि चौधरी चरण सिंह खुले में सोते थे। सादा खाना खाते। खर्च खुद चुकाते। आम के शौकीन थे।
चौधरी चरण सिंह का मूल्यांकन उनके पदों से नहीं किया जा सकता। वे पहले नेता थे जिन्होंने किसानों के बेटों के लिए नौकरियों में 60 प्रतिशत आरक्षण की वकालत की। उनका मानना था भारत में असली संघर्ष शहर और गांव के बीच है। शहरी प्रभुत्वशाली वर्ग किसानों को उसी तरह “गंवार” समझता है, जैसे अंग्रेज भारतीयों को देखते थे।उनके दस्तावेज़, उनकी किताबें और उनकी बहसें, यह सब एक लोकवादी, वर्ग-सचेत राजनीति का प्रमाण हैं।
कहते हैं, आज भी जब चुनावों का मौसम आता है, तो बागपत के कई बुजुर्गों के सपनों में चौधरी चरण सिंह लौट आते हैं। धोती-कुर्ता, गांधी टोपी, कंधे पर हाथ रखे, जैसे पूछ रहे हों कि सत्ता की इस दौड़ में कहीं जमीन और जमीर तो नहीं छूट रही। यह कोई राजनीतिक लोककथा भर नहीं, बल्कि उस भरोसे की स्मृति है जो चौधरी साहब ने किसानों के दिलों में बोया था।
लेकिन राजनीति में स्मृतियां सिर्फ भाव नहीं होतीं, वे विरासत भी बनती हैं! और वही विरासत आगे चलकर टकराव, गठबंधन और सत्ता-संघर्ष का रूप ले लेती है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुलायम सिंह यादव और चौधरी अजित सिंह की पांच दशक पुरानी तकरार इसी विरासत का सबसे बड़ा उदाहरण है, जिसने न सिर्फ नेताओं के रिश्ते बदले, बल्कि प्रदेश की राजनीति की दिशा और जातीय गणित को भी नए सिरे से गढ़ा।
सपनों से सत्ता तक
चौधरी चरण सिंह के सपनों में लौट आने की कहानी यहीं पूरी होती है। वह सपना केवल भावुक स्मृति नहीं, बल्कि एक राजनीतिक चेतावनी है कि सत्ता चाहे जिस हाथ में जाए, किसान, गांव और सामाजिक न्याय अगर हाशिये पर चले गए तो राजनीति अपनी आत्मा खो देगी। उत्तर प्रदेश की राजनीति आज भी उसी सवाल से जूझ रही है, जिसे चौधरी चरण सिंह ने दशकों पहले पूछा था, क्या सत्ता का केंद्र गांव है, या सिर्फ लखनऊ और दिल्ली? यही सवाल चौधरी साहब को आज उनके 123 वें जन्म दिवस पर देश के किसानों के लिए प्रासंगिक बनाता है।
चौधरी चरण सिंह के सपनों में लौट आने की कहानी यहीं पूरी होती है। वह सपना केवल भावुक स्मृति नहीं, बल्कि एक राजनीतिक चेतावनी है कि सत्ता चाहे जिस हाथ में जाए, किसान, गांव और सामाजिक न्याय अगर हाशिये पर चले गए तो राजनीति अपनी आत्मा खो देगी। उत्तर प्रदेश की राजनीति आज भी उसी सवाल से जूझ रही है, जिसे चौधरी चरण सिंह ने दशकों पहले पूछा था, क्या सत्ता का केंद्र गांव है, या सिर्फ लखनऊ और दिल्ली? यही सवाल चौधरी साहब को आज उनके 123 वें जन्म दिवस पर देश के किसानों के लिए प्रासंगिक बनाता है।
चौधरी चरण सिंह से जुड़े अनसुने किस्से
चौधरी चरण सिंह की जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय लोकदल के वरिष्ठ नेता एवं कृषि वैज्ञानिक चौधरी सत्येन्द्र सिंह तोमर ने अपने दादा स्वर्गीय चौधरी सूरजमल सिंह नंबरदार के हवाले से उनसे जुड़े कई संस्मरण साझा किए। उन्होंने बताया कि चौधरी चरण सिंह के उनके दादा से पारिवारिक संबंध थे। चौधरी साहब जब भी बागपत लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत छपरौली विधानसभा में आते थे, तो वे सीधे गांवों की चौपाल पर पहुंचते थे।
चौधरी चरण सिंह की जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय लोकदल के वरिष्ठ नेता एवं कृषि वैज्ञानिक चौधरी सत्येन्द्र सिंह तोमर ने अपने दादा स्वर्गीय चौधरी सूरजमल सिंह नंबरदार के हवाले से उनसे जुड़े कई संस्मरण साझा किए। उन्होंने बताया कि चौधरी चरण सिंह के उनके दादा से पारिवारिक संबंध थे। चौधरी साहब जब भी बागपत लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत छपरौली विधानसभा में आते थे, तो वे सीधे गांवों की चौपाल पर पहुंचते थे।
किशनपुर बराल में ओमप्रकाश सरपंच, बूढ़पुर में चौधरी प्रताप सिंह एवं रणबीर सिंह चौधरी, तथा लूम्ब, तुगाना, सूप और छपरौली में सहदेव सिंह के यहां रुकते थे। सभी की समस्याएं सुनते और समाधान सुझाते थे। चौधरी साहब फिजूलखर्ची के विरोधी थे और वर्षों तक एक ही शेरवानी पहनते रहे। 1977 में मेरठ सर्किट हाउस में भुट्टा खाने का उनका किस्सा आज भी उनके सहज स्वभाव की मिसाल माना जाता है। उनके निधन के समय बैंक खाते में मात्र 470 रुपये थे।