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हरियाणा से लाई जा रही पराली
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हरियाणा से ट्रैक्टर ट्रौली में लाई जा रही पराली।
- फोटो : SARDANA
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जानीखुर्द। उत्तर भारत में किसानों द्वारा पराली जलाने से हो रहे प्रदूषण को लेकर प्रशासन सख्त है। किसानों पर मुकदमें किए जा रहे हैं। वहीं, दूसरी ओर सिवालखास क्षेत्र के लोग पराली का प्रयोग पशुओं के चारे के रूप में कर रहे हैं। यहीं नहीं, करीब 500 से अधिक लोग हरियाणा से पराली खरीदकर ला रहे हैं और यहां क्षेत्र में पशु पालकों को बेच रहे हैं। सस्ता चारा मिलने के कारण पशुपालक भी उसे अपना रहे हैं। पराली को सिवाल खास के अलवा सरधना, हर्रा, खिवाई आदि जगहों पर बेचा जा रहा है।
200 ट्रॉली रोजाना
लोगों का मानना है कि पराली की कुट्टी खाने से पशुओं में दूध ज्यादा देने की क्षमता बढ़ जाती है। कस्बा सिवाल खास निवासी पूर्व नगर पंचायत सदस्य दीन मोहम्मद के अनुसार पराली को पशु पालक खरीद कर एक जगह पर स्टाक कर लेते है। इस के बाद वह साल भर इस पराली को कुट्टी काट कर पशु पालक दुधारू पशुओं को खिलाते है। इसे खाने से पशुओं का दुध भी बढ़ता है।
पराली की कुट्टी काटने की मशीन से भी कमा रहे ग्रामीण
कस्बा सिवाल खास निवासी अनवार कुुरैशी के अनुसार पराली की कुट्टी को सामान्य कुट्टी काटने की मशीन पर नहीं काटा जाता है। इसके लिये राजस्थान से मशीन लाई गई है। एक मशीन के लागत करीब दो लाख रुपये आती है। इससे ट्रैक्टर से चलाया जाता है। इस समय कस्बें में पांच मशीनें है। यह मशीन डेढ़ हजार रुपये प्रति घंटा किराये पर मिलती है। जानी स्थित सरकारी पशु चिकित्सा केन्द्र प्रभारी संदीप महेश्वरी के अनुसार पराली खिलाने से पशु ज्यादा दूध देता है। लेकिन इसके खिलाने से पशुओं में बांझपन होने की संभावना भी बढ़ जाती है।
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200 ट्रॉली रोजाना
लोगों का मानना है कि पराली की कुट्टी खाने से पशुओं में दूध ज्यादा देने की क्षमता बढ़ जाती है। कस्बा सिवाल खास निवासी पूर्व नगर पंचायत सदस्य दीन मोहम्मद के अनुसार पराली को पशु पालक खरीद कर एक जगह पर स्टाक कर लेते है। इस के बाद वह साल भर इस पराली को कुट्टी काट कर पशु पालक दुधारू पशुओं को खिलाते है। इसे खाने से पशुओं का दुध भी बढ़ता है।
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पराली की कुट्टी काटने की मशीन से भी कमा रहे ग्रामीण
कस्बा सिवाल खास निवासी अनवार कुुरैशी के अनुसार पराली की कुट्टी को सामान्य कुट्टी काटने की मशीन पर नहीं काटा जाता है। इसके लिये राजस्थान से मशीन लाई गई है। एक मशीन के लागत करीब दो लाख रुपये आती है। इससे ट्रैक्टर से चलाया जाता है। इस समय कस्बें में पांच मशीनें है। यह मशीन डेढ़ हजार रुपये प्रति घंटा किराये पर मिलती है। जानी स्थित सरकारी पशु चिकित्सा केन्द्र प्रभारी संदीप महेश्वरी के अनुसार पराली खिलाने से पशु ज्यादा दूध देता है। लेकिन इसके खिलाने से पशुओं में बांझपन होने की संभावना भी बढ़ जाती है।
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