मौलाना महमूद मदनी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, लगाई हाईकोर्ट के आदेश पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने फतवों पर प्रतिबंध से संबंधित उत्तराखंड हाईकोर्ट के फैसले को स्थगित कर दिया है। दो सदस्यीय बेंच ने यह स्थगन आदेश जमीयत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना महमूद मदनी की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है, जिस पर तर्क दिया गया था कि भारतीय संविधान के मूल से हटकर कोई भी कोर्ट फैसला नहीं सुना सकती है। 30 अगस्त को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक पंचायत के फरमान को फतवा मानते हुए इन्हें जारी करने पर रोक लगा दी थी।
चार सितंबर को मौलाना महमूद मदनी ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में याचिका के माध्यम से चुनौती दी थी। उन्होंने बताया कि शुक्रवार को जमीयत की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन, शकील अहमद सैयद, नियाज अहमद फारुकी, तैय्यब खां, मुजीबुद्दीन खान, उजमी जीमल हुसैन और मोहम्मद परवेज पेश हुए।
रामचंद्रन ने अदालत से कहा कि हाईकोर्ट का यह फैसला भारतीय संविधान के अनुच्छेद 26 और विश्वालोचन मदान केस बनाम भारत सरकार में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के विपरीत है। अनुच्छेद 26 बी में सभी को अपनी धार्मिक समस्याओं में स्वयं के प्रबंध का अधिकार दिया गया है।
इसलिए इसे कोई भी अदालत खत्म नहीं कर सकती है। हाईकोर्ट के निर्णय को संविधान की धारा 141 के भी विपरीत बताते हुए तर्क दिया गया कि किसी भी अदालत को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ फैसला देने का हक नहीं दिया गया है।
मौलाना मदनी ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष स्पष्ट किया गया कि उत्तराखंड हाईकोर्ट ने लक्सर (हरिद्वार) की किसी पंचायत के फरमान को फतवा समझने की गलती की है और सिर्फ हिंदी के एक अखबार में प्रकाशित समाचार को आधार बनाकर फैसला दे दिया। जबकि खबर के अध्ययन से भी यह प्रकट होता है कि वह सिर्फ पंचायती फरमान है और इसका फतवे से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है।
मौलाना मदनी ने कहा कि फतवा किसी पंचायत से नहीं, बल्कि दारुल इफ्ता (फतवा विभाग) या किसी विद्वान मुफ्ती के माध्यम से ही दिया जाता है और इसकी हैसियत सिर्फ पूछने वाले के लिए शरई मसले पर मशविरा और मार्गदर्शन है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से मामले में स्टे मिलने पर संतुष्टि जताते हुए कहा कि देश के कोने कोने में दारुल इफ्ता धार्मिक मार्गदर्शन का कर्तव्य अंजाम दे रहे हैं।
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