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82 करोड़ खर्च, फिर भी शहर गंदा

Wed, 17 Feb 2016 02:05 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला मेरठ
ब्यूरो/अमर उजाला मेरठ Updated Wed, 17 Feb 2016 02:05 AM IST
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Spending 82 crore, but dirty city
शहर भले ही साफ न हो, लेकिन निगम के खजाने से प्रति वर्ष 82 करोड़ रुपये जरूर साफ हो रहे हैं। बावजूद शहर में हर तरफ कूड़े के ढेर लगे हैं। नाले और नालियां उफन रही हैं।
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गंदगी के कारण शहर की स्थिति बद से बदतर हो चुकी है। मेरठ शहर कितना साफ है उसका खुलासा राष्ट्रीय स्तर पर क्वालिटी ऑफ इंडिया कर ही चुका है। इस सब के लिए नगर निगम की व्यवस्था और अधिकारियों की लापरवाही सामने आ रही है।
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नालों पर कट गए महापौर के तीन साल
शहर
के नालों की सफाई व्यवस्था को जांचते हुए महापौर हरिकांत अहलूवालिया का तीन साल से अधिक समय पूरा हो गया। लेकिन देश के अन्य शहरों की नजरों में मेरठ का नाम साफ शहरों में दर्ज नहीं करा पाए।
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कमी भले ही निगम प्रशासन की हो या फिर सफाई कर्मचारियों की। लेकिन जनता के बीच जवाबदेही महापौर की ही बनती है।

सदन में उठी आवाजें भी दब गईं
शहर
की सफाई को लेकर पार्षदों ने कई बार सदन में आवाज बुलंद की। सफाई की आवाज उठाना पार्षदों को भारी भी पड़ा।

सफाई कर्मियों ने पार्षदों के घरों पर कूड़ा भी डाला। विरोध इतना हुआ कि शहर में सफाई की मांग निगम की फाइल और टाउन हॉल की चारदीवारी में कैद होकर रह गई।

शहर में नहीं होती दो टाइम सफाई
शासनादेश
के मुताबिक शहर में दो टाइम सफाई होनी चाहिए। तहसील मवाना में शासनादेश का पालन हो रहा है। यानी दो टाइम सफाई होती है, लेकिन मेरठ में नहीं।

अगर सही मायने में सफाई व्यवस्था को देखा जाए तो एक टाइम होने वाली सफाई में भी औपचारिकता ही पूरी होती है। शहर के कुछ इलाके ऐसे हैं जहां पर माह में दो दिन भी सफाई कर्मी नहीं पहुंचते हैं। यही कारण है कि सड़कों पर पड़ा कूड़ा सड़ता रहता है।

जनसंख्या के अनुपात में सफाईकर्मी भर्ती की मांग
जनसंख्या
के साथ साथ शहर का भी विस्तार हो रहा है। हाल में शहर की जनसंख्या 18 लाख मानी जा रही है। जबकि नगर निगम में स्थाई सफाई कर्मचारी 967 और अस्थाई 2215 हैं।

सफाई कर्मचारी नेता जनसंख्या के अनुपात में सफाई कर्मचारियों की भर्ती करने की आवाज उठाते रहे हैं। निगम में सफाई से संबंधित मशीनरी तो बढ़ती चली गई, लेकिन सफाई कर्मचारियों की संख्या कम होती जा रही है।

तत्कालीन नगरायुक्त एसके दूबे ने शासन को पत्र भेजकर कम से कम 5600 सफाई कर्मियों की जरूरत बताई थी, जिस पर न तो शासन ने कोई कदम उठाया है और न ही सांसद, विधायक, और महापौर ही गंभीर दिखे।

मेयर की पुरानी रट
महापौर
हरिकांत अहलूवालिया ने शहर की खराब सफाई व्यवस्था का दोष निगम में भ्रष्टाचार और प्रदेश सरकार के सिर मढ़ दिया है। महापौर का कहना है कि अगर सरकार 74वां संशोधन संविधान लागू कर दे तो एक साल के भीतर शहर को सफाई ही नहीं बल्कि विकास में भी अन्य शहरों में प्रथम स्थान पर खड़ा करके दिखा देंगे। बता दें कि जब भी शहर में सफाई व्यवस्था को लेकर बात होती है तो मेयर हमेशा 74वां संशोधन संविधान लागू करने की मांग कर देते हैं।

बेदम आजम की ताकत, फेल भाजपा के दिग्गज
इस
शहर के पास ताकत की कोई कमी नहीं है। सपा के दिग्गज मंत्री आजम खां प्रभारी हैं तो केंद्र में आसीन भाजपा के नेताओं का शहर की राजनीति पर कब्जा है।

प्रधानमंत्री स्वच्छ भारत अभियान में सांसद राजेंद्र अग्रवाल सहित भाजपा के तीनों विधायकों ने झाड़ू थामी थी। वह भी जब शहर की निगम का मुखिया भाजपा से हो।

मेयर ने सफाई के नाम पर हमेशा हवाई बयान दिए हैं और अब आलम यह है कि इतनी ताकत के बाद मेरठ देश के सबसे गंदे शहरों की लिस्ट में शामिल हुआ है।
हवाई साबित हुई भाजपा की फौज
प्रधानमंत्री
ने गांधी जयंती के अवसर पर दो अक्तूबर 2014 को स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत की थी। पूरे देश में स्वच्छ भारत अभियान के प्रति जनता को जगाने के लिए भाजपा के सांसद, विधायक, महापौर और सभी बड़े नेता झाडू हाथ में लेकर सड़कों पर दिखाई दिए थे।

तीनों विधायक चाहे सत्यप्रकाश अग्रवाल हों या लक्ष्मीकांत वाजपेयी और उनके साथ रविंद्र भड़ाना एक दूसरे से आगे दिखना चाह रहे थे।

इससे बदतर हालात क्या हो सकते हैं कि जब मेयर की झाड़ू साफ जगहों पर लगी हो और शहर में गंदगी के आलम हो। बात यहीं तक नहीं है। मोदी के सांसदों में शुमार राजेंद्र अग्रवाल भी शहर को साफ करने में कोई खास योगदान नहीं दे सके।

आजम की ताकत सफाई में नहीं
सपा
के दिग्गज मंत्री आजम खां नगर विकास मंत्री भी हैं और मेरठ के प्रभारी मंत्री हैं। कई बार वे मेरठ आ चुके हैं लेकिन मेरठ शहर की सफाई का ब्लू प्रिंट उनकी ओर से भी तैयार नहीं कराया गया।


इसके अलावा सपा के मंत्री शाहिद मंजूर सहित कई निगमों और मंत्रालयों के सलाहकार नेता भी मेरठ में ही रहते हैं। इसके बावजूद शहर की सुध लेने की किसी ने जरूरत नहीं समझी।
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