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इस शिवलिंग पर न छत न दीवार, दूर-दूर से दर्शन करने आते हैं श्रद्धालु, होती है हर मनोकामना पूरी

Sat, 20 Apr 2019 07:31 PM IST
कपिल kapil न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Published by: कपिल kapil Updated Sat, 20 Apr 2019 07:31 PM IST
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Shiv temple is located in Asifabad Narangpur village of Meerut and every wish is completed here
आसिफाबाद नारंगपुर गांव स्थित मंदिर में है शिवलिंग - फोटो : अमर उजाला

मेरठ में परीक्षितगढ़ क्षेत्र के नारंगपुर आसिफाबाद स्थित झाड़खंडी शिव मंदिर की मान्यता दूर-दूर तक है। यह भगवान शिव का एक ऐसा मंदिर है जहां पर खुले में शिवलिंग विराजमान है। इस मंदिर के बारे में प्रचलित है कि स्थापना के समय जब शिवलिंग के चारों तरफ दीवार बनाई गई तो वह एक रात में ही गिर गई। छत बनाने के लिए पिलर खड़े करने के बाद टीन डाली गई तो वह भी नहीं रुक पाई। यहां तपस्या करने वाले जटल गुरु महाराज ने बताया कि झाड़ के बीच से निकले इस शिवलिंग को कोई ढक नहीं सकता है। इसके बाद शिवलिंग को खुले में रखते हुए मंदिर की स्थापना की जा सकी। आज इस मंदिर में दर्शन करने के लिए दूर-दराज से श्रद्धालुओं के अलावा तपस्या करने के लिए साधु-महाराज बड़ी संख्या में आते हैं।

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झाड़खंडी शिव मंदिर मध्य गंगनहर के पश्चिमी किनारे पर ग्राम आसिफाबाद से एक किलोमीटर उत्तर में है। यहां विराजमान शिवलिंग प्राकृतिक हैं। मंदिर का इतिहास है कि आज से सैकड़ों साल पहले मंदिर से पूरब में एक खोली नामक कुटी पर जटल गुरु महाराज तपस्या कर रहे थे। तपस्या के दौरान महाराज को एक अदृश्य शक्ति की आवाज सुनाई दी। आवाज आ रही थी कि तुमने अपनी तपस्या से मुझे प्रसन्न किया। मैं तुम्हारी कुटिया के पश्चिम में उगे झाड़ों के नीचे हूं। उस स्थान को साफ कराओ तुम्हारी तपस्या सार्थक होगी। इस आकाशवाणी के बाद महाराज की खोली के पास ग्वालों की गाय चरते हुए एक स्थान पर आ गई। झाड़ में जहां पर शिवलिंग था वहां पर गाय का दूध स्वयं जमीन पर गिरने लगा। दूसरे दिन भी ऐसा ही हुआ तो ग्वाले चकित रह गए। उन्होंने जटल गुरु महाराज को इसकी जानकारी दी तो वह तपस्या से उठकर उस स्थान पर पहुंचे। इसके बाद यहीं से शिवलिंग की प्राप्ति हुई। 
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तपस्या करने का बना महत्वपूर्ण स्थान 
सैकड़ों सालों से झाडंखंडी शिव मंदिर में तपस्या करने के लिए साधू संत आते रहे। मंदिर के इतिहास के मुताबिक यहां पर भगवान परशुराम ने भी तपस्या की थी। एक बार संत महाराज विवेकानंद खलारे वाले के नाम से यहां आए। इस स्थान को देखकर वे अभिभूत हो गए। उन्होंने यहां पर तपस्या की। उनको जटल गुरु महाराज के दर्शन भी हुए। इसके बाद उन्होंने यहां पर बगीचा बनाया।

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चार बार मेले का आयोजन 
24 मार्च 1985 को महाराज खीमगिर महाराज ने क्षेत्र की जनता को एकत्र कर मंदिर की देखभाल के लिए समिति का गठन किया। समिति ने मंदिर के निर्माण को आगे बढ़ाया। मंदिर समिति की तरफ से साल में चार बार शिवरात्रि और नवरात्रि पर मेले का आयोजन किया जाता है। सोमवार को यहां पर भक्तों की भीड़ रहती है। 

प्राचीन नीम, बरगद और कुआं भी 
शिव मंदिर में प्राचीन यादगार के रूप में जटल गुरु द्वारा बनाई गई एक तिदरी, टूटे हुए थमले, एक बरगद का वृक्ष, एक नीम का वृक्ष और प्राचीन कुंआ मौजूद है।

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