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यूपी: कलेक्ट्रेट भवन निर्माण मामले में फंसे शामली के पूर्व डीएम ने तोड़ी चुप्पी, दिया ये तर्क
इंद्रपाल सिंह पांचाल, अमर उजाला, शामली
Updated Thu, 15 Nov 2018 10:50 AM IST
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निर्माणाधीन इमारत
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पूर्वी यमुना नहर के किनारे कलक्ट्रेट के अनावासीय भवनों का डिजाइन में मनमाने तरीके से बदलाव करने और खर्च बढ़ाने के मामले में अनुशासनात्मक कार्रवाई में फंसे पूर्व डीएम ओपी वर्मा ने अपने बचाव में तर्क दिए हैं। कहा है कि सुरक्षा कारणों से भवनों का डिजाइन बदला गया था। सवाल उठाया कि परिवर्तित नक्शा शासन ने स्वीकृत क्यों किया? डिजाइन पंसद नहीं था तो निर्माण के लिए धनराशि जारी क्यों की?
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इस नवसृजित जिले को कलेक्ट्रेट के लिए गोहरनी गांव के जंगल में एक मंजिला भवन के निर्माण की स्वीकृति शासन से मिली थी। नियमानुसार एक मंजिला भवन में आरसीसी कालम नहीं होते हैं। इसमें वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और कंप्यूटर रूम का प्राविधान भी नहीं था। भूमि के पास पूर्वी यमुना नहर की ऊंचाई भी भैंसवाल से लेकर मुंडेट कलां गांव तक ढ़ाई मीटर है।
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अधिकारियों का तर्क है कि पूर्वी यमुना नहर का तटबंध टूटने की स्थिति में एक मंजिला भवन को डूबने और राजस्व रिकार्ड को नष्ट होने से नहीं बचाया जा सकता था। तब खनन पर शासन से प्रतिबंध होने के कारण भूमि पर भराव के लिए मिट्टी उपलब्ध होना कठिन था।
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ऐसे में कलक्ट्रेट भवन निर्माण के लिए जिला स्तरीय समिति का गठन और सुरक्षा के लिए डिजाइन बदलने का निर्णय लिया गया। शासन ने इसके लिए राजकीय निर्माण निगम को कार्यदायी संस्था नामित किया था और नया डिजाइन तैयार हुआ।
निर्माण एजेंसी ने ही इसे शासन को स्वीकृति के लिए भेजा था। अधिकारियों के अनुसार भवन निर्माण के लिए 2011 की लागत के अनुसार इस्टीमेट तैयार किया गया। बाद में राजकीय निर्माण निगम द्वारा ही संशोधित इस्टीमेट शासन को भेजा गया था। इससे अनुमानित लागत दस करोड रुपये से बढ़कर पहले 29 करोड़ रुपये और बाद में 33 करोड़ 63 लाख रुपये हुई। ये सभी प्रस्ताव निर्माण एजेंसी ने ही शासन को भेजे।
वहीं, 2002 बैच के आईएएस तत्कालीन डीएम वर्मा इसी साल जुलाई में रिटायर हो चुके हैं। वर्मा का कहना है कि कलक्ट्रेट का स्ट्रक्चर डिजाइन मौके की जरूरत के अनुसार बदला गया था, जिसकी समिति ने स्वीकृति दी थी। अगर डिजाइन स्वीकृत नहीं करना था तो कार्यालय भवन के लिए धनराशि क्यों जारी की गई? उनके स्तर से इसमें कोई भी लापरवाही नहीं बरती गई है।
उधर, वर्मा पर शासन द्वारा अनुशासनात्मक कार्रवाई को लेकर प्रभारी डीएम/ एडीएम (वित्त) केबी सिंह और सीडीओ विवेक त्रिपाठी का कहना है कि उन्हें इस संबंध में शासन स्तर से अभी कोई पत्र नहीं मिला है।
निर्माण एजेंसी ने ही इसे शासन को स्वीकृति के लिए भेजा था। अधिकारियों के अनुसार भवन निर्माण के लिए 2011 की लागत के अनुसार इस्टीमेट तैयार किया गया। बाद में राजकीय निर्माण निगम द्वारा ही संशोधित इस्टीमेट शासन को भेजा गया था। इससे अनुमानित लागत दस करोड रुपये से बढ़कर पहले 29 करोड़ रुपये और बाद में 33 करोड़ 63 लाख रुपये हुई। ये सभी प्रस्ताव निर्माण एजेंसी ने ही शासन को भेजे।
वहीं, 2002 बैच के आईएएस तत्कालीन डीएम वर्मा इसी साल जुलाई में रिटायर हो चुके हैं। वर्मा का कहना है कि कलक्ट्रेट का स्ट्रक्चर डिजाइन मौके की जरूरत के अनुसार बदला गया था, जिसकी समिति ने स्वीकृति दी थी। अगर डिजाइन स्वीकृत नहीं करना था तो कार्यालय भवन के लिए धनराशि क्यों जारी की गई? उनके स्तर से इसमें कोई भी लापरवाही नहीं बरती गई है।
उधर, वर्मा पर शासन द्वारा अनुशासनात्मक कार्रवाई को लेकर प्रभारी डीएम/ एडीएम (वित्त) केबी सिंह और सीडीओ विवेक त्रिपाठी का कहना है कि उन्हें इस संबंध में शासन स्तर से अभी कोई पत्र नहीं मिला है।