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ये है आपके बच्चे की स्कूल बस  

Thu, 14 Sep 2017 12:17 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो Updated Thu, 14 Sep 2017 12:17 PM IST
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school bus of your ward
फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
गुरुग्राम के रेयान इंटरनेशनल स्कूल में मासूम प्रद्युम्न की कत्ल की घटना से पूरे देश में अभिभावकों में जबरदस्त आक्रोश है। स्कूली बसों से लेकर स्कूल की सुरक्षा पर अब सवाल खड़े हो रहे हैं। अभिभावकों की चिंताओं को देखते हुए अमर उजाला ने मेरठ में स्कूल की बसों और ऑटो का जायजा लिया। लेकिन हालात बदतर ही नजर आए। शहर में भी स्कूली बसों के हालात संतोषजनक भी नहीं है। कुछ दिन पहले शहर के एक नामचीन पब्लिक स्कूल के बस कंडक्टर की लापरवाही से बच्चे का बस स्टॉप से ही अपहरण हो गया। ऐसी तमाम छिटपुट घटनाएं, लेकिन इन घटनाओं के बावजूद स्कूल बसों में सुधार के आसार नजर नहीं आ रहे हैं। 
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घिसे टायर, टायरों की उम्र छिपाने को चढ़ी छुर्रीदार रबड़, सुरक्षा संकेत गायब, न फर्स्टएड बॉक्स, न फायर सेफ्टी, बदरंग ढांचा। ये आपके बच्चे की स्कूल बस है। आपके बच्चे की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने वाली यह वो बस है, जिसे बिना वर्दी वाला ड्राइवर चलाता है। यही ड्राइवर बच्चों को घर से स्कूल और स्कूल से घर तक का सफर हर रोज तय कराता है। अधिकांश बसें सिर्फ ड्राइवरों के भरोसे ही हैं। ऑटो तो भगवान भरोसे ही चल रहे हैं। स्कूल की छुट्टी के बाद आप कभी भी सड़क पर ऑटो पर लटके हुए बच्चों को देख सकते हैं।   
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गाइड लाइन का खुलकर उल्लंघन
स्कूल बसों में सीबीएसई के आदेशों का खुलकर उल्लंघन हो रहा है। बसों पर स्कूल का फोन नंबर, नाम नहीं है। चालक , कंडक्टर का फोन नंबर, स्पीड नियंत्रण संदेश, बच्चों के उतरने का संदेश नहीं हैं। बच्चों को बस धीमी करके उतार देते हैं। कई बसों में हेल्पर, कंडक्टर भी नहीं, जो बच्चे को स्टॉप तक छोड़े। ट्रंासपोर्टेशन फीस में बच्चे को घर से लाने-ले जाने की बात होती है, लेकिन बस चालक बच्चों को सड़क पर ही छोड़ आगे बढ़ जाते हैं। 
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ठेके  पर चल रहा स्कूल ट्रांसपोर्टेशन 
शहर के कई स्कूलों के पास निजी ट्रांसपोर्टेशन की सुविधा नहीं हैं। निजी बसें या ठेकेदार की बसें चल रहीं हैं। कई बसों का ये हाल है कि ठेकदार दूसरे शहर में है और बसें मेरठ में चल रही हैं। अगर मेरठ में किसी बस से दुर्घटना हो जाए तो उसके मालिक को आने में कम से कम चार से पांच घंटे का समय लगेगा। दूसरे शहरों की खटारा, आउटडेटेड बसों पर पीला कलर पुतवाकर स्कूल बस में काम ले रहे हैं। निजी बस सेवा होने के कारण अधिकांश स्कूलों की बसें टूटी हैं। उनमें सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं है। स्कूल प्रबंधन निजी बस होने के कारण बसों की सुरक्षा को गंभीरता से नहीं लेता। बसों में सुरक्षा इंतजाम कभी परखे नहीं जाते। 


ये है गाइडलाइन
. बस की पहली सीढ़ी की ऊंचाई 325 मिलीमीटर से अधिक न हो
. बस लो-फ्लोर हो, खिड़की और रेलिंग भी हो
. बस में बैग रखने की जगह हो, हर साल उसकी जांच हो
. ठेके की बस है तो स्कूल के साथ कांट्रेक्ट की प्रति भी बस में हो
. बस में ड्राइवर के साथ कंडक्टर और हेल्पर मौजूद हो
. कंडक्टर बच्चों को बस से उतारने, चढ़ाने के अलावा सड़क भी पार कराएगा
. बस स्टाफ वैध सिक्योरिटी एजेंसी से मान्यता प्राप्त हो, यूनिफार्म में होना अति आवश्यक
. बसें पीले रंग की हों, जिस पर स्कूल का नाम, फोन नंबर अवश्य लिखा जाए
. बस पर कंडक्टर, चालक का नाम, फोन नंबर, सुरक्षा के निर्देश व सुरक्षा पहचान चिह्न होना आवश्यक
. बस में प्राथमिक उपचार की व्यवस्था हो
. बस चालक के पास ड्राइविंग लाइसेंस हो
. बस चालक के स्वास्थ्य का परीक्षण हर छह माह में किया जाए
. बस चालक व कंडक्टर शराब पीकर बस न चलाए
. बस खटारा एवं उसके खिड़की दरवाजे टूटे न हों, रजिस्ट्रेशन नंबर लिखा हो

ऐसे चले स्कूल बस
. बस की रफ्तार 40 किमी प्रति घंटा से अधिक न हो
. रांग साइड में बस न रोकी जाए
. बच्चा बस से सुरक्षित न उतरे तब तक बस आगे न बढ़ाएं
. क्षमता से अधिक बच्चे न बैठाएं
. बच्चों को घर से लाने और छोड़ने की जिम्मेदारी निभाएं। 
 
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