महबूबा मुफ्ती परिवार से सतपाल मलिक का सियासी नाता, एक क्लिक में पढ़ें 30 साल की यादें
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जम्मू कश्मीर से राज्यपाल सतपाल मलिक का जुड़ाव नया नहीं है। जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद और मलिक एक साथ जनता दल में रह चुके हैं। साल 1989 में मुफ्ती मोहम्मद सईद ने मुजफ्फरनगर से चुनाव लड़ा और केंद्र सरकार में गृहमंत्री बनाए गए थे, जबकि सतपाल मलिक अलीगढ़ से सांसद चुने गए थे। एक ही दल में रहने के दौरान दोनों का जुड़ाव रहा।
मलिक के राजनीतिक जीवन में खूब उतार चढ़ाव होते रहे। सितंबर 2017 में बिहार का राज्यपाल बनने के बाद उन्हें अब जम्मू-कश्मीर के गवर्नर की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई है। जम्मू कश्मीर के वर्तमान हालात में उनके पुराने अनुभव कारगर हो सकते हैं। घाटी की राजनीति में मुफ्ती मोहम्मद परिवार का दखल है और इस परिवार से सतपाल मलिक का सियासी जुड़ाव 1987-88 के दौरान ही शुरू हो गया था। मलिक जनमोर्चा को छोड़कर जनता दल में शामिल हुए और मुफ्ती मोहम्मद सईद कांग्रेस को छोड़कर जनता दल में शामिल हो गए थे। दोनों ही सांसद बने और अलग-अलग दायित्व पर रहे। लेकिन कुछ ही साल बाद सईद कांग्रेस में लौट गए और सतपाल मलिक ने साल 2004 में भाजपा का दामन थाम लिया। बगैर मुख्यमंत्री वाले जम्मू कश्मीर के वर्तमान हालात में मलिक के पुराने सियासी अनुभव काम आ सकते हैं।
चौधरी चरण सिंह के सियासी वारिस बनते-बनते रहे गए थे मलिक
सतपाल मलिक के सियासी कॅरियर में कईं यादें और खट्टे-मीठे अनुभव छिपे हैं। छात्र राजनीति के बाद वह पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह के बेहद करीबी लोगों में शामिल हो गए थे। चरण सिंह ने ही उन्हें बीकेडी से टिकट देकर विधायक बनवाया। लोकदल के गठन के बाद उन्हें संगठन में जिम्मेदारी दी और राज्यसभा भेजा। चौधरी चरण सिंह की पत्नी गायत्री देवी सत्यपाल मलिक को बेटा मानती थी। रालोद के वर्तमान अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह तब राजनीति में सक्रिय नहीं थे। सियासी गलियारों में चर्चा थी कि चौधरी चरण सिंह का राजनीतिक वारिस सतपाल मलिक या मुलायम सिंह यादव को ही बनाया जाएगा। लेकिन इस बीच लोकदल में खेमाबंदी शुरू हुई। मलिक और बड़े चौधरी के बीच के संबंध बिगड़ने लगे और मलिक को लोकदल से बाहर निकाल दिया गया। 1984 में मलिक कांग्रेस के सदस्य बने। इसके बाद चौधरी चरण सिंह बीमार पड़ गए। इस तरह मलिक चौधरी चरण सिंह के सियासी वारिस बनते-बनते रह गए थे।
दंगे के बाद मुजफ्फरनगर-बागपत से थे टिकट के दावेदार
1991 से 2003 तक सतपाल मलिक सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय रहे। लोकसभा चुनाव 2004 से पहले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मुलाकात के बाद वह भाजपा में शामिल हुए। वाजपेयी ने उन्हें बागपत से टिकट दिया, लेकिन जीत नहीं सके। लेकिन इसके बाद मलिक भाजपा में संगठन का काम देखते रहे और सक्रिय रहे। मुजफ्फरनगर में 2013 में दंगा हुआ। इसके बाद साल 2014 के चुनाव में वह मुजफ्फरनगर और बागपत से टिकट के दावेदारों में शामिल थे, लेकिन टिकट नहीं मिला। दोबारा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए गए और पिछले वर्ष उन्हें बिहार राज्य का राज्यपाल बना दिया था।
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