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संस्कृत केवल भाषा नहीं, बल्कि भारतीय जीवन दर्शन
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डायट में समर कैंप में अतिथियों का स्वागत करते हुए। (स्त्रोत डायट) मवाना।
मवाना। डायट के तत्वावधान में आयोजित भारतीय भाषा समर कैंप के पांचवें दिन बताया गया कि संस्कृत केवल भाषा नहीं, बल्कि भारतीय जीवन दर्शन, सांस्कृतिक चेतना और आत्मिक अनुशासन की मूल आधारशिला है।
डाइट मेरठ के तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय भारतीय भाषा समर कैंप के पांचवें दिन का आयोजन महात्मा गांधी प्रेक्षागृह में संपन्न हुआ। संस्कृत भाषा ही नहीं, अपितु जीवन का आधार विषय पर व्याख्यान माला आयोजित हुई, जिसमें विद्वानों ने उद्बोधन से श्रोताओं को संस्कृत की व्यापकता और महत्व से अभिभूत किया।
मुख्य वक्ता आचार्य इंद्रेश कुमार पराशर, नीलकमल शर्मा, अजय पेन्यूली और रंगराजन रहे। अध्यक्षता डाइट प्रवक्ता नरेश कुमार ने की। डाइट प्राचार्य मनोज कुमार आर्य ने उद्घाटन भाषण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल भाषा नहीं, बल्कि भारतीय जीवन दर्शन, सांस्कृतिक चेतना और आत्मिक अनुशासन की मूल आधारशिला है। उन्होंने कहा कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली को तभी सार्थक माना जाएगा, जब उसमें अपनी मातृसंस्कृति, जड़ों और पारंपरिक भाषाओं का समावेश हो।
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मुख्य वक्ता आचार्य इंद्रेश कुमार पराशर ने संस्कृत को न केवल जीवन का आधार, बल्कि चरित्र निर्माण और विवेक के जागरण की भाषा बताया। उन्होंने कहा कि संस्कृत में केवल ज्ञान ही नहीं, जीवन की संपूर्णता समाहित है। संस्कृत के वर्ण, वाक्य रचना, प्रयोग और सहजता को समझाते हुए उन्होंने विद्यार्थियों को प्रेरित किया कि वे इस भाषा को जीवन का हिस्सा बनाएं।
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डाइट मेरठ के तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय भारतीय भाषा समर कैंप के पांचवें दिन का आयोजन महात्मा गांधी प्रेक्षागृह में संपन्न हुआ। संस्कृत भाषा ही नहीं, अपितु जीवन का आधार विषय पर व्याख्यान माला आयोजित हुई, जिसमें विद्वानों ने उद्बोधन से श्रोताओं को संस्कृत की व्यापकता और महत्व से अभिभूत किया।
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मुख्य वक्ता आचार्य इंद्रेश कुमार पराशर, नीलकमल शर्मा, अजय पेन्यूली और रंगराजन रहे। अध्यक्षता डाइट प्रवक्ता नरेश कुमार ने की। डाइट प्राचार्य मनोज कुमार आर्य ने उद्घाटन भाषण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल भाषा नहीं, बल्कि भारतीय जीवन दर्शन, सांस्कृतिक चेतना और आत्मिक अनुशासन की मूल आधारशिला है। उन्होंने कहा कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली को तभी सार्थक माना जाएगा, जब उसमें अपनी मातृसंस्कृति, जड़ों और पारंपरिक भाषाओं का समावेश हो।
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मुख्य वक्ता आचार्य इंद्रेश कुमार पराशर ने संस्कृत को न केवल जीवन का आधार, बल्कि चरित्र निर्माण और विवेक के जागरण की भाषा बताया। उन्होंने कहा कि संस्कृत में केवल ज्ञान ही नहीं, जीवन की संपूर्णता समाहित है। संस्कृत के वर्ण, वाक्य रचना, प्रयोग और सहजता को समझाते हुए उन्होंने विद्यार्थियों को प्रेरित किया कि वे इस भाषा को जीवन का हिस्सा बनाएं।