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यूपी: दलित राजनीति का केंद्र रहा है सहारनपुर, कांशीराम और मायावती लड़ चुके हैं चुनाव 

Tue, 18 Sep 2018 10:47 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Updated Tue, 18 Sep 2018 10:47 AM IST
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Saharanpur has been the center of Dalit politics Kanshiram and Mayawati also contested in election
भीम आर्मी

यूपी का सहारनपुर जिला बरसों से दलित राजनीति का गढ़ रहा है। जिले में करीब सात लाख अनुसूचित जाति के मतदाता है, जिनका झुकाव चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की ताकत रखता है। भीम आर्मी अब इस जिले से एक नई ताकत के रूप में उभर कर आ रही है जो लोकसभा चुनाव 2019 के लिए एक मजबूत संगठन के रूप में सामने आ सकती है:-

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बसपा प्रमुख रहे कांशीराम और मायावती भी यहां से चुनाव लड़ चुकी हैं। बहन जी यहां से जीत कर ही पहली बार प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थी। बसपा के बाद अब भीम आर्मी नई ताकत के रूप में सामने आई है। भीम आर्मी प्रमुख अनुसूचित जाति के मतदाताओं के अलावा मुस्लिम और ओबीसी की गोलबंदी में लग गए हैं, ताकि 2019 के चुनाव में अपनी राजनीतिक शक्ति का लोहा मनवा सके। 

करीब 38 लाख की आबादी वाले जिले से सहारनपुर और कैराना लोकसभा से जुड़ी हैं, जबकि सात विधानसभाएं है। इनमें नकुड़ और गंगोह कैराना संसदीय क्षेत्र में है। फिलहाल 26 लाख मतदाता है, मगर नए वोटरों के जुड़ने के कारण यह संख्या आगामी लोकसभा चुनाव में बढ़ने की उम्मीद हैं। जिले में बरसों से दलित राजनीति प्रभावी रही है। बसपा प्रमुख कांशीराम ने 1999 में सहारनपुर लोकसभा से चुनाव लड़ा था, लेकिन भाजपा के नकली सिंह ने उन्हें हरा दिया था। इसके बाद बसपा प्रमुख बनी मायावती 1996 में हरौड़ा विधानसभा से चुनाव जीतकर पहली बार प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थी। 

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साल 2002 में मायावती फिर यहां से चुनाव जीत कर गई  थीं। इस सीट पर बिमला राकेश भी यहां छह बार सबसे अधिक विधायक निर्वाचित हुई। 1993 में केवल एक बार भाजपा के मोहर सिंह ने जीत दर्ज की थी। इसके अलावा मंसूर अली खां और जगदीश राणा भी बसपा से सांसद रहे हैँ। बसपा के बाद भीम आर्मी को अराजनैतिक संगठन के रूप में नई पहचान मिली। भीम आर्मी युवाओं को जोड़ने में कामयाब रही है। जेल से रिहाई के बाद भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद द्वारा 2019 में भाजपा को हराने के लिए विपक्ष के गठबंधन को साथ देने के बयान के बाद से हलचल है। 

 कांग्रेस के पूर्व विधायक इमरान मसूद के साथ बसपा से निष्कासित नेताओं और जेएनयू के छात्र उमर खालिद ने भी नई रणनीति को मंत्रणा की है। भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर भी लगातार अपनी रणनीति बदल रहे है। तीन दिन पहले दलित और मुस्लिम एकता पर जोर था। सोमवार को लाइव संबोधन में ओबीसी को जोड़कर संगठन की धार को और तेज करने की कवायद शुरू कर दी है। 


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