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चौधरी जयंत सिंह का बड़ा फैसला: रालोद के सभी क्षेत्रीय, जिला और फ्रंटल संगठन तत्काल प्रभाव से किए भंग

Mon, 14 Mar 2022 11:51 AM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला नेटवर्क, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला नेटवर्क, मेरठ Published by: Dimple Sirohi Updated Mon, 14 Mar 2022 11:51 AM IST
सार

राष्ट्रीय लोकदल उत्तर प्रदेश के प्रदेश, क्षेत्रीय, जिला और सभी फ्रंटल संगठनों को आरएलडी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी जयंत सिंह ने भंग किया। सोमवार को रालोद के ऑफिशियल ट्विटर हैंडलर से ये बड़ी सूचना जारी की गई। 

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Rashtriya Lok Dal of Uttar Pradesh state, regional, district and all frontal organizations were dissolved by RLD national president Jayant Choudhar
जयंत चौधरी। - फोटो : ANI

विस्तार

राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष चौधरी जयंत सिंह ने विधानसभा चुनाव समाप्त होते ही बड़ा फैसला लिया है। चौधरी जयंत सिंह ने विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद बड़ा निर्णय लेते हुए उत्तर प्रदेश के प्रदेश, क्षेत्रीय, जिला और सभी फ्रंटल संगठनों को भंग कर दिया है। सोमवार को रालोद के ऑफिशियल ट्विटर हैंडलर से ये बड़ी सूचना जारी की गई। 

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रालोद प्रमुख चौधरी जयंत सिंह ने तत्काल प्रभाव से पार्टी का प्रदेश, क्षेत्रीय, जिला संगठन के साथ ही सभी फ्रंटल संगठनों को भंग कर दिया है। जाहिर है कि इस निर्णय के बाद जल्द ही नए सिरे से चरणवार संगठन का पुनर्गठन होगा।
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विधानसभा चुनाव में संगठन की निष्क्रियता और पार्टी प्रत्ययाशियों के चयन को लेकर हुई हार पर उंगली उठ रही थी। अब असंतुष्ट नेताओं को संगठन में प्रमुख पद देकर संतुष्ट किया जाएगा। खराब प्रदर्शन करने वालों को संगठन में जगह नहीं मिलेगी।
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 यह भी पढ़ें: मेरठ: विधानसभा चुनाव हारने के बाद जनता से रुबरू हुए भाजपा विधायक संगीत सोम, बोले-गलतफहमी न पालें

चुनाव में मिली हार लेकिन अपना गढ़ बचाने में कामयाब रहा रालोद
बागपत जनपद की शहर बागपत और बड़ौत विधानसभा सीटों पर दोबारा से कमल खिल गया है जबकि रालोद अपने गढ़ छपरौली को बचाने में कामयाब रहा। बागपत सीट से भाजपा के योगेश धामा ने 6733 वोट से रालोद के अहमद हमीद को हराया। बड़ौत पर काफी करीबी मुकाबला रहा। यहां भाजपा के केपी मलिक ने 315 वोट से रालोद के जयवीर सिंह तोमर को हराकर जीत दर्ज की। छपरौली सीट से रालोद के अजय कुमार ने 29508 वोट से भाजपा के सहेंद्र रमाला को हराकर जीत दर्ज की। बागपत विधानसभा सीट पर शुरूआत में काफी करीबी मुकाबला रहा। मतगणना में कई बार उतार-चढ़ाव आता रहा। आखिर में भाजपा के योगेश धामा ने जीत दर्ज की और वह दोबारा विधायक बने।

जाटों में बिखराव और दलितों के बदले रुख ने खिलाया कमल 
भाजपा आखिर जाटों में बिखराव करने के साथ ही दलितों को अपने साथ जोड़ने में कामयाब रही। यही कारण रहा कि बागपत व बड़ौत विधानसभा सीट पर दोबारा से कमल खिल गया। भाजपा ने विकास योजनाओं के साथ ही सुरक्षा के मुद्दे पर हर वर्ग को अपने साथ जोड़ा तो पिछड़ी जातियों के लिए राशन वितरण योजना ने असर दिखाया। छपरौली में जरूर भाजपा की उम्मीद के अनुसार बसपा व कांग्रेस वोट नहीं बटोर सके। यही वजह रही कि रालोद अपने किले को बचाने में कामयाब रहा। 

बागपत विधानसभा सीट पर मुस्लिम मतदाताओं ने रालोद का पूरा साथ दिया। जहां भी मुस्लिमों के कस्बे व गांव थे, वहां रालोद को एकतरफा वोट मिला। जाटों व यादवों से जिस तरह की उम्मीद रालोद ने जताई थी, ऐसा नहीं हो सका। जाटों में बिखराव हुआ तो दलित, गुर्जर, कश्यप, ठाकुर, ब्राह्मण, त्यागी ने भाजपा का पूरा साथ दिया। बसपा व कांग्रेेस के साथ भी यह वोटर नहीं आए। बागपत सीट पर भाजपा के लिए सबसे बड़ा यही जीत का आधार बना।  

बड़ौत विधानसभा सीट पर यह माना जा रहा था कि ठाकुर व रवां राजपूत के अलावा ब्राह्मण, त्यागी सभी भाजपा के साथ है। साथ ही इस सीट पर जाटों में बिखराव और दलितों के रुख पर भी चुनाव टिका था। इस सीट पर बसपा पूरी मजबूती के साथ चुनाव लड़ रही थी। बसपा व कांग्रेस को ज्यादा वोट मिलने पर सीधा नुकसान भाजपा को होना था। मगर, बड़ौत सीट पर जाटों ने जहां रालोद का साथ दिया तो भाजपा भी उनकी पसंद रही। दलित व कश्यप भी भाजपा के साथ आ गए। ऐसे में समीकरण पूरी तरह से भाजपा की तरफ हो गए। 

छपरौली सीट पर जरूर परिस्थितियां भाजपा के अनुकूल नहीं रही। भाजपा जिस तरह से बसपा व कांग्रेस के प्रत्याशी मुस्लिम होने के कारण वोट काटने की उम्मीद जता रही थी, ऐसा नहीं हो सका। बसपा व कांग्रेस इतनी वोट नहीं काट सकी, जिससे रालोद को बड़ा नुकसान हो सकता। इसलिए ही रालोद अपने छपरौली के किले को बचाने में कामयाब रही। 

योजनाओं व कानून व्यवस्था का दिखा बड़ा असर
बागपत और बड़ौत सीटों पर कमल खिलाने के लिए जिस तरह से दलितों व अन्य कई बिरादरियों के मतदाताओं का साथ मिला है। इसका कारण यह भी माना जा रहा है कि भाजपा सरकार की विकास योजनाओं का काफी लाभ गरीब तबके को मिला तो कानून व्यवस्था का असर भी दिखाई दिया। इसे देखते हुए ही सबसे ज्यादा दलितों ने अपना रुख बदला, जबकि रालोद उनमें बिखराव देखता रहा। 

फिलहाल रालोद अध्यक्ष के इस बड़े फैसले से यह साफ है कि पूरे चुनाव की समीक्षा के बाद रालोद अध्यक्ष चौधरी जयंत ने नए ढंग से संगठनों के पुनर्गठन की तैयारी कर ली है। 

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