राम मंदिर भूमि पूजन: ...जब पैदल ही अयोध्या पहुंच गए थे कार सेवक, सुनाई तीन दशक पुरानी दास्तां
- पैदल ही अयोध्या पहुंच गए थे कार सेवक
- हर दो घंटे बाद लोकेशन बदलते थे हिंदू संगठनों के लोग
- ट्रेनों और बसों पर रहती थी पुलिस की निगरानी
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राम मंदिर आंदोलन की अलख सहारनपुर जिले के लोगों में भी खूब जली थी। पुलिस कारसेवकों को जगह-जगह गिरफ्तार कर रही थी। इसके बावजूद वे छिपकर और रास्ते बदलकर निकलने में कामयाब रहे थे। कोई पैदल ही अयोध्या पहुंच गया तो कोई ट्रेन से मुरादाबाद और लखनऊ होते हुए अयोध्या गया।
उस दौर में अहम जिम्मेदारी संभालने वाले राजेंद्र अटल बताते हैं कि विहिप ने 30 अक्तूबर 1990 कार सेवा की घोषणा की थी। कारसेवक हर दो घंटे में अपनी लोकेशन बदलते थे। श्रीराम ज्योति रथयात्रा चल रही थी। वहीं मारे गए कारसेवकों की श्रद्धांजलि सभा अग्रवाल धर्मशाला में होनी थी, जिसमें बड़ी संख्या में लोग वेश बदलकर पहुंचे थे। अग्रवाल धर्मशाला से जुलूस निकालने के बाद गिरफ्तारी दी गई। फिर भी सैकड़ों कारसेवक अयोध्या रवाना हुए।
वाया लखनऊ होकर पहुंचे थे अयोध्या
आरएसएस के पूर्व तहसील सेवा प्रमुख सुभाष सिंह बताते हैं कि बड़गांव से प्रतिदिन 11 कारसेवक शिव मंदिर में इकट्ठा होते थे और थाने में गिरफ्तारी देने जाते थे। जेल में उनकी मुलाकात दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना से हुई थी। बड़गांव के विनोद सिंह, दल्हेड़ी के सुखपाल मौरा के पवन पुलिस को चकमा देकर देहरादून-मुम्बई ट्रेन से मेरठ स्टेशन तक पहुंचे। वहां से दूसरी ट्रेन से मुरादाबाद गए, ट्रेन में सत्संग सेवा से जुड़ी कुछ महिलाएं उनके साथ बैठी थीं, जिन्होंने पुलिस को बताया कि वे लोग उनके साथ हैं, अगले दिन लखनऊ पहुंचे जो पूरी तरह सील होने पर वाया गोरखपुर के रास्ते, मल्होर स्टेशन पर पहुंचे, वहां अमृतसर के जत्थे ने जय श्रीराम के नारे लगा दिए, तब पुलिस ने 70 कारसेवकों की गिरफ्तारी की।
गिरफ्तार कर जेल में रखा
वरिष्ठ भाजपा नेता सरस गोयल ने बताया कि विष्णुदत्त शर्मा, पवन सिंह रावल, ऋषिपाल चौधरी, शिवचरण शर्मा और राजन धनगर समेत करीब 15 लोग 24 अक्टूबर 1990 की सुबह जंगल के रास्ते अयोध्या के लिए चल दिए, लेकिन सहारनपुर से कुछ दूर ही उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और मेरठ जेल में बंद कर दिया।
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नदी और जंगलों के रास्ते गए
आरएसएस के नगर बौद्धिक प्रमुख राजीव अग्रवाल बताते हैं कि देवबंद से वह नरेंद्र कश्यप और नारायण कश्यप के साथ ट्रेन द्वारा लखनऊ गए। गोंडा होते हुए मकनपुर पहुंचे, जहां से पैदल जंगल और नदियां पार करते हुए अयोध्या में सरयू नदी पर पहुंच गए। उनके साथ नरेश त्यागी, राजेश शर्मा, हेमंत कोहली और राकेश कुमार भी थे। तीन दिसंबर 1992 को वह ट्रेन द्वारा अयोध्या पहुंचे। चार दिसंबर को अयोध्या में घूमे, जबकि पांच दिसंबर को लालकृष्ण आडवाणी से उनकी मुलाकात हुई।
कारसेवकों में था भारी उत्साह
आरएसएस के खंड कार्यवाहक रहे और गांव अलीपुरा नौगांवा निवासी योगेंद्र शर्मा ने बताया कि उनके क्षेत्र के निवासी भगत, छोटा सिंह चौहान, नरेंद्र बंसल, अतर सिंह, भोपाल सिंह हरिपुर, श्याम लाल गाबा ने मिलकर थाना बेहट पहुंचकर गिरफ्तारी दी थी। उन्हें मेरठ जेल में रखा गया।
बुर्का पहनकर करते थे जनसंपर्क
भाजपा नेता विजेंद्र वर्मा ने बताया कि आंदोलन को सफल बनाने को समाजसेवी राजकिशोर गुप्ता बुर्का पहनकर लोगों से संपर्क करते थे। ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को अयोध्या भेजा जाए।
लेकर आए थे ईंटें
चापरचीड़ी गांव निवासी बिजेंद्र सैनी, सोमप्रकाश, जगपाल सिंह ने बताया कि वे लोग हिंदू जागरण मंच के तत्कालीन प्रांतीय महामंत्री राजेंद्र अटल के नेतृत्व में अयोध्या जा रहे थे, लेकिन शहर के घंटाघर पर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। फिर विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद अंबेहटा से ललित आर्य, प्रेम चंद सैनी, पवन सैनी, विनोद कुमार मित्तल, सतीश कश्यप, ईलम सिंह कश्यप सहित करीब 40 लोगों का जत्था रामलला के दर्शन करने गया था। जहां से यह लोग विवादित ढांचे की ईंट भी लाए थे, लेकिन अब ईंट उनके पास नहीं है।
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