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यूपी का एक ऐसा गांव जहां नहीं मनाया जाता रक्षाबंधन का त्योहार

Mon, 31 Jul 2017 12:50 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ मेरठ
अमर उजाला ब्यूरो/ मेरठ Updated Mon, 31 Jul 2017 12:50 PM IST
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Raksha Bandhan will be celebrated, then it will be sad
रतन सिंह। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो

पूरे देश में रक्षा बंधन का पर्व मनाया जाता है, लेकिन एक गांव ऐसा भी है, जहां यह पर्व नहीं मनाया जाता है। इस गांव के लोग जहां भी रहते हैं वहीं पर रक्षा बंधन नहीं मनाते हैं। इनका मानना है कि रक्षा बंधन मनाया तो बड़ा अपशकुन होगा। 

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सिर्फ एक महिला और उसके बच्चे बचे थे
मुरादनगर के सुराना गांव के मूल निवासियों के अनुसार 12वीं सदी में मोहम्मद गौरी ने रक्षा बंधन के दिन इस गांव पर आक्रमण कर कत्लेआम मचाया था। इस हमले में गौरी ने एक महिला और उसके बच्चे को छोड़कर पूरे गांव वालों को मार डाला था। यह महिला और बच्चा भी इसलिए बच गये थे, क्योंकि हमले के समय वो गांव में नहीं थे।
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वर्षों बाद त्योहार मनाया तो हुई घटना
गौरी के हमले के बाद गांव फिर से आबाद हुआ और फिर से रक्षाबंधन का त्योहार मनाया गया। लेकिन उसी समय गांव का एक बच्चा विकलांग हो गया। इसके बाद से ही रक्षाबंधन को शापित मानकर गांववालों ने इस त्योहार को मनाना बंद कर दिया।
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कहीं भी रहें, लेकिन नहीं मनाते त्योहार
इस गांव के लोग अपने मूल गांव को छोड़कर रोजगार के लिए कई शहरों में बस चुके हैं। लेकिन आज भी कोई रक्षा बंधन नहीं मनाता है। सुराना के मूल निवासी कुछ लोग अब मेरठ के जागृति विहार, शास्त्रीनगर आदि क्षेत्रों में आकर रहने लगे हैं। इनमें से ही देवराज, रतन सिंह, विजय यादव, अजय यादव और अक्षय यादव ने बताया कि उनके परिवारों में रक्षा बंधन नहीं होता है। गांव के लोग दिल्ली, नोएडा, मेरठ, मुरादाबाद के साथ ही देश के अन्य शहरों में जाकर अपना कारोबार या नौकरी कर रहे हैं। कुछ तो उच्च पदों पर भी हैं, लेकिन अपशकुन के डर से कोई रक्षा बंधन नहीं मनाता है। इस दिन घर में चूल्हा तो जलता है लेकिन खाने के नाम पर सिर्फ नमक की रोटी ही बनती है। 


राजपूतों ने 8वीं सदी में बसाया था ये गांव
यहां के रहने वालों के अनुसार सुराना गांव को राजूपतों ने 8वीं सदी में बसाया था, तब इस गांव का नाम सोहनगढ़ था। 12वीं शाताब्दी में मोहम्मद गोरी यहां से गुजरा तो सब कुछ तबाह करता गया। इस हमले में छबिया गोत्र की एक महिला उस समय बच गई थी, क्योंकि वह गांव में नहीं थी। बाद में उसके बेटे लखन और चूड़ा वापस आए और उन्होंने गांव को फिर से बसाया। वर्तमान में इस गांव की कुल जनसंख्या में 50 फीसदी छबिया यादव ही हैं।

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