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निगम की छांव मांगतीं 150 कॉलोनियां
अमर उजाला ब्यूरो/मेरठ
Updated Mon, 02 May 2016 02:04 AM IST
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फाइल फोटो।
- फोटो : फाइल फोटो।
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अरमान थे एक सुंदर सा सपनों का घर हो। सरकारी योजनाओं की लेटलतीफी देखकर निजी टाउनशिप का रुख किया। सोच यह भी रही कि कॉलोनी फिलहाल बेहतर डेवलप हुई है और भविष्य में भी सड़क-पानी जैसी जरूरतों का बेहतर इंतजाम रहेगा। आशियाने का सपना तो साकार हुआ, लेकिन बुनियादी सुविधाएं सपना ही रह गईं। शहर में ऐसी करीब 150 निजी कॉलोनियां हैं, जो अब तक नगर निगम को हैंडओवर नहीं हो सकी हैं।
अब बिल्डरों ने इनके रखरखाव से हाथ खड़े कर दिये हैं तो एमडीए और नगर निगम को भी इनसे कोई सरोकार नहीं नजर आ रहा। मेरठ में लगातार कॉलोनियों का जाल फैलता जा रहा है। अनाधिकृत कॉलोनियों के साथ एमडीए अप्रूव्ड कॉलोनियां भी यहां कम नहीं हैं। लोग ऐसी कॉलोनियों में अपना घर तलाशते हैं, जो एमडीए से अप्रूव्ड हों और उन्हें बिजली, पानी, सड़क, सुरक्षा जैसी सभी मूलभूत सुविधाएं मिलें।
कॉलोनियां जब डेवलप होती हैं तो बिल्डर ये सारी सुविधाएं आवंटियों को उपलब्ध कराते हैं। नियमानुसार जब कॉलोनी पूर्ण विकसित हो जाती है तो एमडीए उसे पूर्णता प्रमाणपत्र जारी करता है। इसके बाद वह नगर निगम को हैंडओवर हो जाती है। यह प्रक्रिया पूरी होने पर ही नगर निगम संबंधित कॉलोनियों में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराता है। लेकिन, कई कॉलोनियां आज भी इसके इंतजार में हैं।
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फंसे हैं लोग, कहां लगाएं गुहार
शुरू में तो खरीददारों को सुविधाएं मिलती हैं पर समय बीतते-बीतते सब खत्म होने लगती हैं। बिल्डर अधिकतर आवास या प्लॉट बेचकर चले गए और कॉलोनियां राम भरोसे रह गईं। शहर में 150 से ज्यादा कॉलोनियां ऐसी ही हैं। वे अप्रूव्ड तो हैं पर सड़क, पानी, बिजली, सीवर के लिए यहां के लोग किससे लड़ें, उनकी समझ में नहीं आ रहा है। चूंकि कॉलोनियों में यह सब काम नगर निगम के हैं, लेकिन उसने इन्हें टेक ओवर ही नहीं किया है।
एमडीए की शह पर भाग गए बिल्डर
नियमानुसार इन कॉलोनियाें में बिल्डरों की बैंक गारंटी और प्लॉट बंधक रखे जाते हैं। ऐसा इसलिये, ताकि बिल्डर आंतरिक और वाह्य विकास न कराए तो उसके प्लॉट बेचकर काम कराया जा सके। एमडीए की शह पर बिल्डरों ने वो प्लॉट भी बेच डाले हैं। बैंक गारंटी रिन्यू नहीं हुई हैं। ऐेसे में बिल्डर वहां विकास नहीं कराते, क्योंकि उन पर किसी का दबाव नहीं रहता।
हैंड ओवर में निगम के नखरे हजार
नगर निगम अधिकारी एमडीए अधिकारियों से कहते हैं कि पहले विकास कार्य पूरे कराओ, तब कॉलोनी टेकओवर करेंगे। सवाल यह उठता है कि बिल्डर है नहीं तो विकास कार्य कैसे पूरे हों। वहीं जो कॉलोनियां विकसित हैं, उन्हें लेने में भी निगम के हजार नखरे हैं। गढ़ रोड स्थित टाउनशिप मोती प्रयाग कॉलोनी शहर की अच्छी कॉलोनियों में शुमार है, पर अभी हैंडओवर नहीं हुई है। यहां की रेजीडेंट वेलफेयर सोसाइटी लड़ रही है। कृष्णा गार्डन, सर्वोदय विहार, दामोदर कॉलोनी, कृष्णा लोक जैसी कॉलोनियों के लोग भी बार-बार आवाज उठ रहे हैं, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है। निगम कहता है कि एमडीए पहले पूर्णता प्रमाणपत्र कॉलोनियों को दे। हकीकत तो यह है कि एमडीए 10 फीसदी कॉलोनियों को प्रमाणपत्र दे चुका है, फिर भी निगम उन्हें टेकओवर नहीं कर रहा है।
कहां कितनी कॉलोनियां
स्थान कॉलोनी
मवाना रोड - 25
दिल्ली रोड - 20
बाईपास - 06
रुड़की रोड - 20
रोहटा रोड - 10
बागपत रोड - 11
गढ़ रोड -18
हापुड़ रोड - 05
किला रोड - 10
नोट : इन स्थानों के अलावा शहर में और भी ऐसी कई कालोनियां हैं।
ये हैं तथ्य
150 से ज्यादा कालोनियां नहीं हुई हैं हैंडओवर।
1.8 लाख से ज्यादा आवास हैं इन कॉलोनियाें में।
10 लाख से ज्यादा लोग रहते हैं इनमें
90 फीसदी कॉलोनियों को नहीं मिले पूर्णता प्रमाणपत्र।
हमारी कोशिश है कि कुछ कॉलोनियां नगर निगम को हैंडओवर कर दी जाएं। हालांकि, निगम बार-बार इसमें अड़ंगे लगाता है। नए सिरे से मुहिम शुरू की जाएगी। -राजेश कुमार, वीसी एमडीए
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अब बिल्डरों ने इनके रखरखाव से हाथ खड़े कर दिये हैं तो एमडीए और नगर निगम को भी इनसे कोई सरोकार नहीं नजर आ रहा। मेरठ में लगातार कॉलोनियों का जाल फैलता जा रहा है। अनाधिकृत कॉलोनियों के साथ एमडीए अप्रूव्ड कॉलोनियां भी यहां कम नहीं हैं। लोग ऐसी कॉलोनियों में अपना घर तलाशते हैं, जो एमडीए से अप्रूव्ड हों और उन्हें बिजली, पानी, सड़क, सुरक्षा जैसी सभी मूलभूत सुविधाएं मिलें।
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कॉलोनियां जब डेवलप होती हैं तो बिल्डर ये सारी सुविधाएं आवंटियों को उपलब्ध कराते हैं। नियमानुसार जब कॉलोनी पूर्ण विकसित हो जाती है तो एमडीए उसे पूर्णता प्रमाणपत्र जारी करता है। इसके बाद वह नगर निगम को हैंडओवर हो जाती है। यह प्रक्रिया पूरी होने पर ही नगर निगम संबंधित कॉलोनियों में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराता है। लेकिन, कई कॉलोनियां आज भी इसके इंतजार में हैं।
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फंसे हैं लोग, कहां लगाएं गुहार
शुरू में तो खरीददारों को सुविधाएं मिलती हैं पर समय बीतते-बीतते सब खत्म होने लगती हैं। बिल्डर अधिकतर आवास या प्लॉट बेचकर चले गए और कॉलोनियां राम भरोसे रह गईं। शहर में 150 से ज्यादा कॉलोनियां ऐसी ही हैं। वे अप्रूव्ड तो हैं पर सड़क, पानी, बिजली, सीवर के लिए यहां के लोग किससे लड़ें, उनकी समझ में नहीं आ रहा है। चूंकि कॉलोनियों में यह सब काम नगर निगम के हैं, लेकिन उसने इन्हें टेक ओवर ही नहीं किया है।
एमडीए की शह पर भाग गए बिल्डर
नियमानुसार इन कॉलोनियाें में बिल्डरों की बैंक गारंटी और प्लॉट बंधक रखे जाते हैं। ऐसा इसलिये, ताकि बिल्डर आंतरिक और वाह्य विकास न कराए तो उसके प्लॉट बेचकर काम कराया जा सके। एमडीए की शह पर बिल्डरों ने वो प्लॉट भी बेच डाले हैं। बैंक गारंटी रिन्यू नहीं हुई हैं। ऐेसे में बिल्डर वहां विकास नहीं कराते, क्योंकि उन पर किसी का दबाव नहीं रहता।
हैंड ओवर में निगम के नखरे हजार
नगर निगम अधिकारी एमडीए अधिकारियों से कहते हैं कि पहले विकास कार्य पूरे कराओ, तब कॉलोनी टेकओवर करेंगे। सवाल यह उठता है कि बिल्डर है नहीं तो विकास कार्य कैसे पूरे हों। वहीं जो कॉलोनियां विकसित हैं, उन्हें लेने में भी निगम के हजार नखरे हैं। गढ़ रोड स्थित टाउनशिप मोती प्रयाग कॉलोनी शहर की अच्छी कॉलोनियों में शुमार है, पर अभी हैंडओवर नहीं हुई है। यहां की रेजीडेंट वेलफेयर सोसाइटी लड़ रही है। कृष्णा गार्डन, सर्वोदय विहार, दामोदर कॉलोनी, कृष्णा लोक जैसी कॉलोनियों के लोग भी बार-बार आवाज उठ रहे हैं, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है। निगम कहता है कि एमडीए पहले पूर्णता प्रमाणपत्र कॉलोनियों को दे। हकीकत तो यह है कि एमडीए 10 फीसदी कॉलोनियों को प्रमाणपत्र दे चुका है, फिर भी निगम उन्हें टेकओवर नहीं कर रहा है।
कहां कितनी कॉलोनियां
स्थान कॉलोनी
मवाना रोड - 25
दिल्ली रोड - 20
बाईपास - 06
रुड़की रोड - 20
रोहटा रोड - 10
बागपत रोड - 11
गढ़ रोड -18
हापुड़ रोड - 05
किला रोड - 10
नोट : इन स्थानों के अलावा शहर में और भी ऐसी कई कालोनियां हैं।
ये हैं तथ्य
150 से ज्यादा कालोनियां नहीं हुई हैं हैंडओवर।
1.8 लाख से ज्यादा आवास हैं इन कॉलोनियाें में।
10 लाख से ज्यादा लोग रहते हैं इनमें
90 फीसदी कॉलोनियों को नहीं मिले पूर्णता प्रमाणपत्र।
हमारी कोशिश है कि कुछ कॉलोनियां नगर निगम को हैंडओवर कर दी जाएं। हालांकि, निगम बार-बार इसमें अड़ंगे लगाता है। नए सिरे से मुहिम शुरू की जाएगी। -राजेश कुमार, वीसी एमडीए