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जैविक खेती से पूरा हो सकता है दोगुना आय का सपना: रमेश तंवर
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खतौली। खेती करने के सपना संजोये एक व्यक्ति ने गांव में आकर जमीन खरीदी। उसके बाद देसी खाद तैयार कर उससे जैविक खेती को अपनाकर खेती से दुगनी आय प्राप्त की। उन्होंने सभी अपने परिचितों को भी इसी पैटर्न पर खेती करने की सलाह दी। उनकी सलाह और खेती के तरीके को देखकर कई किसानों ने इस खेती को अपना लिया।
दिल्ली के मूलत: निवासी रमेश चंद तंवर वेल्डिंग का काम करते थे। दिल्ली में प्रदूषण को लेकर जब फैक्ट्रियां बंद की गई थी, तब उन्होंने खेती का मन बना लिया। वैसे उन्होंने नजफगढ़ में भी खेती की थी। सन 2012 में रतनपुरी थाना क्षेत्र के गांव कैलाशनगर में आकर बस गए। उन्होंने वहीं पर लगभग 125 बीघा जमीन खेती करने के लिए खरीदी। उन्होंने खेती के माध्यम से अपनी आए दुगनी करने के लिए जैविक खेती को अपना लिया। 75 वर्षीय रमेश चंद्र तंवर ने बताया कि जैविक खेती से किसानों की आय दोगुनी हो सकती है। वह अपने खेत में बैंगन, गोभी, गाजर, धनिया के साथ साथ गन्ना, चावल और गेहूं की भी फसल बोते हैं। जिसमें वह केवल जैविक खाद इस्तेमाल करते है।
जैविक खाद के लिए उन्होंने एक अलग से घेर बनाया हुआ है। जैविक खेती के लिए जैविक खाद स्वयं बनाते हैं, जिसके लिए उन्होंने अपने गाय रखी हुई हैं। उन्होंने बताया कि गाय का देशी घी किसी औषधि से कम नहीं है। उत्तर प्रदेश राज्य जैविक प्रमाणीकरण संस्था द्वारा 2020 में प्रमाण पत्र भी दिया गया था। उनका कहना है कि जिसके पास लगन, जनून, विश्वास है वह हर मंजिल को आसानी से प्राप्त कर सकता है। खेतों में कभी भी वह फसल कटने के बाद आग नहीं लगाते और न ही घास को समाप्त करने के लिए किसी दवाई का इस्तेमाल करते है। उन्होंने कहा कि जब खेत ठीक हो जाएंगे तब बीमारी स्वत: ही समाप्त हो जाएगी।
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दिल्ली के मूलत: निवासी रमेश चंद तंवर वेल्डिंग का काम करते थे। दिल्ली में प्रदूषण को लेकर जब फैक्ट्रियां बंद की गई थी, तब उन्होंने खेती का मन बना लिया। वैसे उन्होंने नजफगढ़ में भी खेती की थी। सन 2012 में रतनपुरी थाना क्षेत्र के गांव कैलाशनगर में आकर बस गए। उन्होंने वहीं पर लगभग 125 बीघा जमीन खेती करने के लिए खरीदी। उन्होंने खेती के माध्यम से अपनी आए दुगनी करने के लिए जैविक खेती को अपना लिया। 75 वर्षीय रमेश चंद्र तंवर ने बताया कि जैविक खेती से किसानों की आय दोगुनी हो सकती है। वह अपने खेत में बैंगन, गोभी, गाजर, धनिया के साथ साथ गन्ना, चावल और गेहूं की भी फसल बोते हैं। जिसमें वह केवल जैविक खाद इस्तेमाल करते है।
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जैविक खाद के लिए उन्होंने एक अलग से घेर बनाया हुआ है। जैविक खेती के लिए जैविक खाद स्वयं बनाते हैं, जिसके लिए उन्होंने अपने गाय रखी हुई हैं। उन्होंने बताया कि गाय का देशी घी किसी औषधि से कम नहीं है। उत्तर प्रदेश राज्य जैविक प्रमाणीकरण संस्था द्वारा 2020 में प्रमाण पत्र भी दिया गया था। उनका कहना है कि जिसके पास लगन, जनून, विश्वास है वह हर मंजिल को आसानी से प्राप्त कर सकता है। खेतों में कभी भी वह फसल कटने के बाद आग नहीं लगाते और न ही घास को समाप्त करने के लिए किसी दवाई का इस्तेमाल करते है। उन्होंने कहा कि जब खेत ठीक हो जाएंगे तब बीमारी स्वत: ही समाप्त हो जाएगी।
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