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Meerut News: सीने में दर्द के हर रोगी को एंजियोप्लास्टी की जरूरत नहीं
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मेरठ। हार्ट अटैक के दौरान एंजियोप्लास्टी और सर्जरी आमतौर पर अहम इलाज माना जाता है, जबकि नए शोध बताते हैं कि ऐसा कमोबेश नहीं है। हाल ही में लंदन में आयोजित अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला में हृदय रोग विज्ञानियों ने गहन मंथन के बाद लब्बोलुआब यह निकाला कि हर स्टेबल एंजाइना (सीने में दर्द) में एंजियोप्लास्टी (अवरुद्ध धमनियों को खोलने के लिए स्टेंट डालना) या सर्जरी की आवश्यकता नहीं होती। कई अवस्था में इसे दवाओं से भी नियंत्रित किया जा सकता है। खास सलाह यह भी दी कि हृदय रोग विशेषज्ञों को अपने मरीज के साथ अधिक से अधिक संवाद करना चाहिए।
हाल के वर्षों में प्रसिद्ध खिलाड़ियों, बॉडी बिल्डरों और कई बच्चों की हार्ट अटैक से हुई मौत ने सबको हतप्रभ कर दिया। दुनिया के तमाम चिकित्सक इसकी वजह और बेहतर उपचार के लिए शोधरत हैं। इसके मद्देनजर बीते दिनों लंदन में यूरोपियन सोसाइटी ऑफ कार्डियोलॉजी के सौजन्य से हृदय रोग पर आधारित अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इसमें मेरठ के डा. राजीव अग्रवाल समेत दुनिया के तमाम हृदय रोग विज्ञानी जुटे। इन्होंने 12 देशों के मरीजों पर शोध किया। कई चरणों में हुए सर्वे के बाद शोधकर्ता चिकित्सकों ने अपने व्याख्यान में बताया कि क्रॉनिक स्टेबल एंजाइना एक मेटाबॉलिक (चयापचय) बीमारी है। बड़ी संख्या में ऐसे रोगियों को एंजियोप्लास्टी या सर्जरी की आवश्यकता नहीं होती।
वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. राजीव अग्रवाल ने बताया कि ट्राइमेटाजिडिन जैसी मेटाबॉलिक दवाओं का उपयोग ऐसे रोगियों में चरण एक दवा के रूप में किया जाना चाहिए। गौरतलब है कि एंजियोप्लास्टी के बाद भी कुछ मरीजों में एंजाइना की शिकायत बनी रहती है, इसलिए मेटाबॉलिक दवाओं को चरण एक दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाना बेहतर रहता है।
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क्या है क्रॉनिक स्टेबल एंजाइना
हृदय को रक्त की आपूर्ति करने वाली कोरोनरी धमनियों में धीरे-धीरे होने वाले अवरोध को क्रॉनिक स्टेबल एंजाइना कहते हैं। दिल के दौरे के विपरीत, क्रॉनिक स्टेबल एंजाइना एक ऐसा दुश्मन है जो दबे पांव आता है और रफ्ता-रफ्ता नुकसान पहुंचाता है। मसलन, हृदय की कोरोनरी धमनियों की आंतरिक परत को नष्ट कर देता है, जिससे उनमें सफेद थ्रोम्बस पदार्थ जमा होने लगता है। यह धमनियों में रक्त प्रवाह को बाधित करता है। यहां तक कि हृदय की मांसपेशियों को होने वाली रक्त आपूर्ति से वंचित कर देता है।
आराम में थकान हो तो सतर्क हो जाइए
क्रॉनिक स्टेबल एंजाइना के प्रमुख लक्षण हैं, आराम करते वक्त भी थकान, सांस फूलना या चक्कर आना। सतर्क रहें कि आराम करते समय दर्द हो रहा और यह लगभग 15 मिनट तक रहता है तो यह चेतावनी का संकेत है। इस बीमारी की वजह प्रथम दृष्टया अनियमित जीवन शैली और मेटाबॉलिक विकार माना जाता है।
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हाल के वर्षों में प्रसिद्ध खिलाड़ियों, बॉडी बिल्डरों और कई बच्चों की हार्ट अटैक से हुई मौत ने सबको हतप्रभ कर दिया। दुनिया के तमाम चिकित्सक इसकी वजह और बेहतर उपचार के लिए शोधरत हैं। इसके मद्देनजर बीते दिनों लंदन में यूरोपियन सोसाइटी ऑफ कार्डियोलॉजी के सौजन्य से हृदय रोग पर आधारित अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इसमें मेरठ के डा. राजीव अग्रवाल समेत दुनिया के तमाम हृदय रोग विज्ञानी जुटे। इन्होंने 12 देशों के मरीजों पर शोध किया। कई चरणों में हुए सर्वे के बाद शोधकर्ता चिकित्सकों ने अपने व्याख्यान में बताया कि क्रॉनिक स्टेबल एंजाइना एक मेटाबॉलिक (चयापचय) बीमारी है। बड़ी संख्या में ऐसे रोगियों को एंजियोप्लास्टी या सर्जरी की आवश्यकता नहीं होती।
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वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. राजीव अग्रवाल ने बताया कि ट्राइमेटाजिडिन जैसी मेटाबॉलिक दवाओं का उपयोग ऐसे रोगियों में चरण एक दवा के रूप में किया जाना चाहिए। गौरतलब है कि एंजियोप्लास्टी के बाद भी कुछ मरीजों में एंजाइना की शिकायत बनी रहती है, इसलिए मेटाबॉलिक दवाओं को चरण एक दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाना बेहतर रहता है।
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क्या है क्रॉनिक स्टेबल एंजाइना
हृदय को रक्त की आपूर्ति करने वाली कोरोनरी धमनियों में धीरे-धीरे होने वाले अवरोध को क्रॉनिक स्टेबल एंजाइना कहते हैं। दिल के दौरे के विपरीत, क्रॉनिक स्टेबल एंजाइना एक ऐसा दुश्मन है जो दबे पांव आता है और रफ्ता-रफ्ता नुकसान पहुंचाता है। मसलन, हृदय की कोरोनरी धमनियों की आंतरिक परत को नष्ट कर देता है, जिससे उनमें सफेद थ्रोम्बस पदार्थ जमा होने लगता है। यह धमनियों में रक्त प्रवाह को बाधित करता है। यहां तक कि हृदय की मांसपेशियों को होने वाली रक्त आपूर्ति से वंचित कर देता है।
आराम में थकान हो तो सतर्क हो जाइए
क्रॉनिक स्टेबल एंजाइना के प्रमुख लक्षण हैं, आराम करते वक्त भी थकान, सांस फूलना या चक्कर आना। सतर्क रहें कि आराम करते समय दर्द हो रहा और यह लगभग 15 मिनट तक रहता है तो यह चेतावनी का संकेत है। इस बीमारी की वजह प्रथम दृष्टया अनियमित जीवन शैली और मेटाबॉलिक विकार माना जाता है।