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UP: दो दशक से नहीं खुला कांग्रेस का खाता, इस बार गठबंधन से संजीवनी की आस; बेहद रोचक है इन सीटों का इतिहास
Thu, 21 Mar 2024 10:00 AM IST
शाहरुख खान
विनीत तोमर, अमर उजाला, सहारनपुर
विनीत तोमर, अमर उजाला, सहारनपुर
Published by: शाहरुख खान
Updated Thu, 21 Mar 2024 10:00 AM IST
सार
पश्चिमी यूपी में दो दशक से कांग्रेस का खाता नहीं खुला है। इस बार कांग्रेस को गठबंधन से संजीवनी की आस है। सहारनपुर सीट से आखिरी बार 1984 में कांग्रेस के सांसद बने थे। मुजफ्फरनगर में 1999 में आखिरी बार कांग्रेस को जीत मिली थी।
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Punjab Lok Sabha Election
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
लोकसभा चुनाव की घोषणा होते ही सियासत गरमा गई है। पश्चिमी यूपी की मेरठ, बागपत, कैराना, सहारनपुर, बिजनौर, नगीना और मुजफ्फरनगर सीट पर एक समय ऐसा भी था जब कांग्रेस का दबदबा हुआ करता था। इन सीटों पर 1952 से लेकर 2019 के चुनाव तक कांग्रेस के 30 प्रत्याशी संसद तक पहुंचे।
कई सीटों पर लगातार कांग्रेस के प्रत्याशियों ने जीत हासिल की, लेकिन इमरजेंसी के बाद ऐसा समीकरण बदला कि कुछ सीटों पर कांग्रेस हाशिये पर आती चली गई। किसी सीट पर कांग्रेस का खाता 40 साल से नहीं खुला है तो किसी पर 25 साल से जीत की दरकार है।
मौजूदा समीकरण पर नजर डालें तो इस बार सपा से गठबंधन कांग्रेस के लिए संजीवनी बन सकता है। गठबंधन में सहारनपुर, गाजियाबाद, बुलंदशहर और अमरोहा सीट कांग्रेस को मिल चुकी है।
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यह बन रहा समीकरण
सहारनपुर लोकसभा सीट पर करीब चार माह पहले कांग्रेस में दोबारा एंट्री करने वाले पूर्व विधायक इमरान मसूद पश्चिमी यूपी के कद्दावर नेता माने जाते हैं। सहारनपुर लोकसभा सीट में करीब सात लाख मुस्लिम वोटर है। इमरान खुलकर टिकट की दावेदारी कर रहे हैं, जबकि पूर्व एमएलसी गजे सिंह भी टिकट के मजबूत दावेदार है। इमरान तीन बार लोकसभा चुनाव लड़ चुके हैं।
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कई सीटों पर लगातार कांग्रेस के प्रत्याशियों ने जीत हासिल की, लेकिन इमरजेंसी के बाद ऐसा समीकरण बदला कि कुछ सीटों पर कांग्रेस हाशिये पर आती चली गई। किसी सीट पर कांग्रेस का खाता 40 साल से नहीं खुला है तो किसी पर 25 साल से जीत की दरकार है।
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मौजूदा समीकरण पर नजर डालें तो इस बार सपा से गठबंधन कांग्रेस के लिए संजीवनी बन सकता है। गठबंधन में सहारनपुर, गाजियाबाद, बुलंदशहर और अमरोहा सीट कांग्रेस को मिल चुकी है।
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यह बन रहा समीकरण
सहारनपुर लोकसभा सीट पर करीब चार माह पहले कांग्रेस में दोबारा एंट्री करने वाले पूर्व विधायक इमरान मसूद पश्चिमी यूपी के कद्दावर नेता माने जाते हैं। सहारनपुर लोकसभा सीट में करीब सात लाख मुस्लिम वोटर है। इमरान खुलकर टिकट की दावेदारी कर रहे हैं, जबकि पूर्व एमएलसी गजे सिंह भी टिकट के मजबूत दावेदार है। इमरान तीन बार लोकसभा चुनाव लड़ चुके हैं।
2014 के चुनाव में वह भाजपा के राघव लखनपाल से करीब 65 हजार वोटों से हारे थे। उस समय इमरान ने प्रधानमंत्री को लेकर बोटी-बोटी वाला बयान दिया था, जिससे चुनाव हिंदू-मुस्लिम हो गया था और उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। बकौल इमरान, इस बार सहारनपुर सीट पर जीत पक्की है। मुस्लिम और दलित उनके साथ-साथ हैं। इसके अलावा अन्य बिरादरी का वोट भी मिलता है। भाजपा को कम से कम एक लाख वोटों से हराया जाएगा।
सहारनपुर : आठ बार जीते कांग्रेस प्रत्याशी
सहारनपुर लोकसभा सीट पर पहला चुनाव 1952 में लड़ा गया था। 1952 से 1971 तक यहां पर कांग्रेस के सात बार सांसद चुने गए। इमरजेंसी का खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ा और यह सीट उसके हाथ से चली गई। 1977 से 1980 तक जनता पार्टी के काजी रशीद मसूद सांसद रहे। 1984 के चुनाव में कांग्रेस के चौधरी यशपाल सिंह ने जीत हासिल की थी। इसके बाद इस सीट पर कांग्रेस को जीत नहीं मिली।
सहारनपुर लोकसभा सीट पर पहला चुनाव 1952 में लड़ा गया था। 1952 से 1971 तक यहां पर कांग्रेस के सात बार सांसद चुने गए। इमरजेंसी का खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ा और यह सीट उसके हाथ से चली गई। 1977 से 1980 तक जनता पार्टी के काजी रशीद मसूद सांसद रहे। 1984 के चुनाव में कांग्रेस के चौधरी यशपाल सिंह ने जीत हासिल की थी। इसके बाद इस सीट पर कांग्रेस को जीत नहीं मिली।
बिजनौर : सात बार मिली कांग्रेस को जीत
बिजनौर लोकसभा सीट पर 1951 में कांग्रेस के नेमीशरण जैन सांसद बने थे। इसके बाद 1957 में अब्दुल लतीफ, 1967 और 1971 में स्वामी रामानंद शास्त्री, 1974 में रामदयाल जीत हासिल हुई थी। इसके बाद 1984 में कांग्रेस के गिरधारीलाल और 1985 में कांग्रेस से ही मीरा कुमार संसद तक पहुंचे थे। 1989 के चुनाव में बसपा से मायावती ने कांग्रेस का विजयी रथ रोक दिया था। तब से लेकर 2019 तक कोई भी कांग्रेस प्रत्याशी जीत नहीं सका।
बिजनौर लोकसभा सीट पर 1951 में कांग्रेस के नेमीशरण जैन सांसद बने थे। इसके बाद 1957 में अब्दुल लतीफ, 1967 और 1971 में स्वामी रामानंद शास्त्री, 1974 में रामदयाल जीत हासिल हुई थी। इसके बाद 1984 में कांग्रेस के गिरधारीलाल और 1985 में कांग्रेस से ही मीरा कुमार संसद तक पहुंचे थे। 1989 के चुनाव में बसपा से मायावती ने कांग्रेस का विजयी रथ रोक दिया था। तब से लेकर 2019 तक कोई भी कांग्रेस प्रत्याशी जीत नहीं सका।
मेरठ : छह बार चुना गया कांग्रेस का सांसद
मेरठ-हापुड लोकसभा सीट पर 1952 से 1962 तक कांग्रेस के शाहनवाज खान सांसद रहें। 1971, 1980 और 1989 में भी कांग्रेस प्रत्याशी ने ही जीत हासिल की।
मेरठ-हापुड लोकसभा सीट पर 1952 से 1962 तक कांग्रेस के शाहनवाज खान सांसद रहें। 1971, 1980 और 1989 में भी कांग्रेस प्रत्याशी ने ही जीत हासिल की।
मुजफ्फरनगर : पांच बार मिली कांग्रेस को जीत
मुजफ्फरनगर सीट पर 1952 से लेकर 1962 तक कांग्रेस के तीन सांसद बनें। इसके बाद 1984 में धर्मवीर सिंह त्यागी और 1999 में आखिरी बार कांग्रेस के सईदुज्जमां ने कांग्रेस के टिकट पर जीत हासिल की थी। तब से लेकर 2019 तक कांग्रेस का कोई सांसद नहीं रहा।
मुजफ्फरनगर सीट पर 1952 से लेकर 1962 तक कांग्रेस के तीन सांसद बनें। इसके बाद 1984 में धर्मवीर सिंह त्यागी और 1999 में आखिरी बार कांग्रेस के सईदुज्जमां ने कांग्रेस के टिकट पर जीत हासिल की थी। तब से लेकर 2019 तक कांग्रेस का कोई सांसद नहीं रहा।
कैराना : दो बार संसद तक पहुंचा कांग्रेस प्रत्याशी
कैराना लोकसभा सीट पर नजर डालें तो यहां पर 1971 में कांग्रेस के शफाकत जंग और 1984 में चौधरी अख्तर हसन ने जीत हासिल की थी। 1984 के बाद इस सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी जीत दर्ज नहीं करा सका।
कैराना लोकसभा सीट पर नजर डालें तो यहां पर 1971 में कांग्रेस के शफाकत जंग और 1984 में चौधरी अख्तर हसन ने जीत हासिल की थी। 1984 के बाद इस सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी जीत दर्ज नहीं करा सका।
बागपत : दो बार जीत सका कांग्रेस प्रत्याशी
बागपत लोकसभा सीट पर 1971 में कांग्रेस के रामचंद्र विकल और 1996 में कांग्रेस से चौधरी अजित सिंह संसद तक पहुंचे थे। इस सीट पर सबसे ज्यादा सात बार चौधरी अजित सिंह सांसद रहें। भाजपा का रिकॉर्ड देखें तो पहली बार 1998 में सोमपाल शास्त्री ने जीत हासिल की थी। इसके बाद 2014 और 2019 के चुनाव में सत्यपाल सिंह विजेता रहे थें।
बागपत लोकसभा सीट पर 1971 में कांग्रेस के रामचंद्र विकल और 1996 में कांग्रेस से चौधरी अजित सिंह संसद तक पहुंचे थे। इस सीट पर सबसे ज्यादा सात बार चौधरी अजित सिंह सांसद रहें। भाजपा का रिकॉर्ड देखें तो पहली बार 1998 में सोमपाल शास्त्री ने जीत हासिल की थी। इसके बाद 2014 और 2019 के चुनाव में सत्यपाल सिंह विजेता रहे थें।
नगीना लोकसभा सीट
नगीना लोकसभा सीट 2009 में अस्तिव में आई थी। इस सीट पर अभी तक कांग्रेस का खाता नहीं खुला। यहां पहली बार सपा, बसपा और भाजपा ने जीत हासिल की।
नगीना लोकसभा सीट 2009 में अस्तिव में आई थी। इस सीट पर अभी तक कांग्रेस का खाता नहीं खुला। यहां पहली बार सपा, बसपा और भाजपा ने जीत हासिल की।
कांशीराम को हराकर सुर्खियो में आए थे भाजपा के नकली सिंह
सहारनपुर लोकसभा सीट का इतिहास बेहद रोचक है। एक समय ऐसा भी आया था जब बसपा के संस्थापक कांशीराम को भी हार का सामना करना पड़ा था। 1998 के चुनाव में भाजपा के नकली सिंह ने जीत हासिल कर कांशीराम को हराया था। उस समय नकली सिंह चर्चा में आ गए थे।
सहारनपुर लोकसभा सीट का इतिहास बेहद रोचक है। एक समय ऐसा भी आया था जब बसपा के संस्थापक कांशीराम को भी हार का सामना करना पड़ा था। 1998 के चुनाव में भाजपा के नकली सिंह ने जीत हासिल कर कांशीराम को हराया था। उस समय नकली सिंह चर्चा में आ गए थे।