किसानों व्यापारियों की बढ़ी चिंता: मंडियों को रास नहीं आए नए कृषि कानून, 50 प्रतिशत तक गिर गई आवक

राजकुमार सैनी, अमर उजाला, मेरठ Published by: Dimple Sirohi Updated Thu, 23 Sep 2021 12:09 PM IST

सार

नए कानूनों का डर और आंदोलन के असर के साथ ही मौजूदा परिस्थितियों में कृषि उत्पादों की आवक और आय पर बड़ा असर पड़ रहा है। मेरठ मंडल की मंडियों में कृषि उत्पाद और मंडी शुल्क में 50 प्रतिशत से भी अधिक गिरावट आई है।
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meerut mandi - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

नए कृषि कानून लागू होने के बाद से प्रदेश की मंडियों में कृषि उत्पाद और मंडी शुल्क में 50 प्रतिशत से भी अधिक गिरावट आई है। इसके चलते मध्यमवर्गीय व्यापारियों से लेकर किसानों तक की चिंता बढ़ गई है। मंडी समिति के कर्मचारियों को भी वेतन न मिलने का भय सताने लगा है।
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वहीं, मंडी से बाहर कृषि उत्पाद बेचने वाले किसानों को फसल का उचित दाम न मिलने की शिकायतें तो पहले से ही हैं। वहीं कुछ किसान और व्यापारी इसे नए कृषि कानूनों से जोड़ रहे हैं। उनका मानना है कि नए नियम कायदे मंडियों से जुड़े किसानों और व्यापार के अनुकूल नहीं हैं।


नए कृषि कानूनों में सरकार ने व्यापारियों को अधिक भंडारण की छूट दी है, वहीं किसानों को अपनी फसल मंडियों से बाहर कहीं पर भी बेचने का अधिकार दिया है। मंडी से जुड़े सूत्रों के अनुसार नए कानूनों का डर और आंदोलन के असर के साथ ही मौजूदा परिस्थितियों में कृषि उत्पादों की आवक और आय पर बड़ा असर पड़ रहा है। 

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सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक पहले के मुकाबले मंडी में माल की आवक और शुल्क प्राप्ति में 50 प्रतिशत की गिरावट आ गई। वर्ष 2019-20 में प्रदेश की समस्त मंडी समितियों से सरकार को 1359 करोड़ रुपये मंडी शुल्क के रूप में मिले था। वित्तीय वर्ष 2020-21 में यह घटकर 620 करोड़ रुपये रह गए। 

मंडी समिति के सचिव विजिन बालियान ने बताया कि मंडी में आवक गिरी है। मंडी शुल्क भी कम हुआ है। कई व्यापारी मंडी से बाहर व्यापार करने लगे हैं। कुछ व्यापारियों ने अपने लाइसेंस सरेंडर करने के लिए आवेदन किए हैं।

मेरठ सहित पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पड़ा असर
पश्चिमी यूपी के मेरठ मंडल की मेरठ मंडी समिति सहित 22 मंडियों से सरकार को वर्ष 2019-20 में लगभग 96 करोड़ रुपये मंडी शुल्क के रूप में मिले थे। जो अब अब वित्तीय वर्ष 2020-21 में घटकर 46 करोड़ रह गए हैं। कुछ व्यापारियों ने तो यहां तक आशंका जताई है कि इन हालात में मंडियों पर ताला लटक जाएगा। क्योंकि जिनता खर्च मंडी समितियों में स्टाफ के वेतन पर किया जा रहा है, मंडी शुल्क से उतनी आय नहीं हो रही है।

मंडियों के अंदर भी चल रहा खेल समिति की आय पर भी असर
सूत्रों के अनुसार मंडी के कुछ व्यापारी मंडी के अंदर अपनी दुकान पर आने वाले कृषि उत्पाद की खरीद फरोख्त करने के बाद भी इस कारोबार को मंडी से बाहर दिखा रहे हैं। इसका सीधा असर मंडी समिति की आय पर पड़ रहा है। इस खेल पर अंकुश लगाना भी जरूरी है।

मंडी में माल बेचने के ये होते रहे हैं फायदे
-मंडी समिति की ओर से भी किसान की उपज का निर्धारित किया जाता था रेट
-निर्धारित रेट से कम में किसान की कृषि उपज को नहीं बेचते थे व्यापारी
-आपसी प्रतिस्पर्धा का लाभ भी मंडी में आए किसानों को मिलता था
-मनमानी करने पर मंडी समिति अधिकारियों से शिकायत का विकल्प
-किसान की शिकायत पर मंडी समिति अधिकारी संबंधित व्यापारी का कर सकते थे लाइसेंस निरस्त,
-मंडी में किसान के ठहरने, पेयजल, शौचालय और सुरक्षा की मिलती रही है सुविधा
 
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मंडी से बाहर ये हैं दिक्कतें
-मंडियों से बाहर पहले भी किसान अपनी कृषि उपज गेहूं, धान, दलहनी फसलें बेचता था, लेकिन माल बेचते समय केवल एक ही व्यापारी के भाव पर माल बेचना पड़ता था। वही स्थिति अब भी है।
-किसानों में आशंका है कि बाहर माल बेचने पर व्यापारी पूल बना सकते हैं और मनमानी कर सकते हैं।

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सिमट रहा कारोबार
नए कृषि कानूनों ने मंडी में कारोबार को समेट दिया है। ये कानून न किसान के हित में हैं और न व्यापारी के। किसान अपने हित की ही नहीं बल्कि व्यापारी हित की भी लड़ाई लड़ रहे हैं। इन कानूनों से सरकारी कर्मचारियों की जेब भरने का काम आसान हुआ है। - नवीन गुप्ता, अध्यक्ष, व्यापार संघ मेरठ

चल रही मनमानी
उत्तर प्रदेश सहित कई भाजपा शासित प्रदेशों में इन कृषि कानूनों पर दिए गए सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अनुपालन नहीं किया जा रहा है। बड़े व्यापारी मनमाने दाम में कृषि उपज खरीद रहे हैं। किसान सहित आम जनता को लुटने से बचाने की लड़ाई हम लड़ रहे हैं। - नरेश टिकैत, अध्यक्ष, भारतीय किसान यूनियन
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